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शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

सेवा बर उफनाई



-  विद्याभूषण मिश्र -

दूसर के गुन ल अनदेखना
का सहराये पाही ?
निंदाचारी मा गुंगुवावत
बइठे समय बिताहीं।
घुघुवा ला अंधियार सुहाथे
सुरुज - किरन नइ भावै।
टेटका पूछी ल सहरावत
मुड़ ल निचट हलावै।
जाँगर - चोर नि_ला जेहें
अपने छाँव जुड़ाहीं।
दूसर के गुन ल अनदेखना
का सहराये पाही ?
बहँगर बेटा अपन पसीना
ले मोती उपजाथे
सुख - फर लदे सांस के डारी
लहस - लहस जरूआथे
जेमन काँटा के दुख सहही
ओमन ही ममहाही
दूसर के गुन ल अनदेखना
का सहराये पाही ?
दुख के गेंरवा ल छटका के
आलस दूर भगावौ
नवा अँजोरी बगराये बर
दुख - अंधियार मिटावौ
मिहनत के अमरित ला पी के
सपना मन हरियाही
दूसर के गुन ल अनदेखना
का सहराये पाही ?
तप के गंगा ला उतार के
भुइयाँ ला लहराई
महानदी -  शिवनाथ बन हम
सेवा बर उफनाई
थूंक म लड़ुवा जे बांधत हें
मुँह ला अपन सिलाही
दूसर के गुन ल अनदेखना
का सहराये पाही
  • पता - पुरानी बस्ती, ब्राहा्रण पारा, जांजगीर (छग.)  - 495 668

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