इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

सेवा बर उफनाई



-  विद्याभूषण मिश्र -

दूसर के गुन ल अनदेखना
का सहराये पाही ?
निंदाचारी मा गुंगुवावत
बइठे समय बिताहीं।
घुघुवा ला अंधियार सुहाथे
सुरुज - किरन नइ भावै।
टेटका पूछी ल सहरावत
मुड़ ल निचट हलावै।
जाँगर - चोर नि_ला जेहें
अपने छाँव जुड़ाहीं।
दूसर के गुन ल अनदेखना
का सहराये पाही ?
बहँगर बेटा अपन पसीना
ले मोती उपजाथे
सुख - फर लदे सांस के डारी
लहस - लहस जरूआथे
जेमन काँटा के दुख सहही
ओमन ही ममहाही
दूसर के गुन ल अनदेखना
का सहराये पाही ?
दुख के गेंरवा ल छटका के
आलस दूर भगावौ
नवा अँजोरी बगराये बर
दुख - अंधियार मिटावौ
मिहनत के अमरित ला पी के
सपना मन हरियाही
दूसर के गुन ल अनदेखना
का सहराये पाही ?
तप के गंगा ला उतार के
भुइयाँ ला लहराई
महानदी -  शिवनाथ बन हम
सेवा बर उफनाई
थूंक म लड़ुवा जे बांधत हें
मुँह ला अपन सिलाही
दूसर के गुन ल अनदेखना
का सहराये पाही
  • पता - पुरानी बस्ती, ब्राहा्रण पारा, जांजगीर (छग.)  - 495 668

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