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सोमवार, 15 जुलाई 2013

भारतीय आर्य संस्कृति की इमारत पर खड़े



राष्ट्रीय कवि सांसद डॉ.सत्यनारायण जटिया ' सत्यज '


जगन्‍नाथ ' विश्‍व '
राष्‍ट्रीय  कवि डां. सत्‍यनारायण जाटिया

- जगन्नाथ ' विश्व '  -
भारत में विशेषकर मालवा की महिमामयी उर्वरा भूमि एक ओर जहाँ अपने शस्य श्यामला सघन रूप पर गर्वित है वहीं उसे इस बात पर भी गौरव प्राप्त है कि अनेक श्रेष्ठ विलक्षण असाधारण वैज्ञानिक, विजेता वीर, साहित्य उपासक, कवि, लेखक, साहित्यकार, संत ज्ञानी, उत्सर्गशील व्यक्ति इसकी गोद में जन्मे पले-बढ़े और अपनी कीर्ति पताका समय की शिलाओं पर गढ़ते चले गये। होनहार बिरबान के होत चिकने पात वाली कहावत मालवाँचल के कविवर श्री सत्यनारायण जटिया सत्यज में चरितार्थ होती है। महाकाल की नगरी उज्जैन(अवंतिका) में रहते हुए कालीदास की परम्परा का निर्वाह कर रहें हैं। आपका व्यक्तित्व बहुआयामी है।
कवि, लेखक, वक्ता, कर्मयोगी, राजनेता, विधायक, सांसद और पूर्व केन्द्रीय मंत्री इत्यादि आप क्या नहीं हैं। वाह भाई वाह। इतनी विविधाओं के बीच भी अलमस्ती के रंग में सदैव रंगे रहते हैं। जटियाजी को कविता संसार मिला,डॉ.शिवमंगलसिंह सुमन से और उत्साहवर्धन करने में कवि हृदय चिंतक देश के पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटलबिहारी वाजपेयी तथा भूतपूर्व लोकसभा अध्यक्ष श्री शिवराज पाटिल प्रमुख प्रणेता हैं।
जटियाजी ने कहा है-सच तो सर्वदा  सच होता है। जैसा देखा, सुना, समझा  वैसा ही कहा जाता है। सतयुग  का सच हरश्चिन्द्र त्रेता का सच रामचंद्र। द्वापर का सच कृष्णचंद और कलयुग का सच आप और हम हैं। जटियाजी ने जमीन पर बैठकर पढ़ा, लिखा, स्पर्श, ऊँच, नीच की जितनी समझ बनी ईश्वर कृपा से ज्यों की त्यों आपके समक्ष प्रस्तुत है। मनुष्य की चेतना जहाँ तक पहुँचे और जितना समझे उतना अभिव्यक्त होता जाता है। यहीं अभिव्यक्ति हमारे निष्ठावान कवि जटियाजी की इन पंक्तियों में परिलक्षित है।
मृत्यु के द्वार पर पहुँचे/ जब हम कभी/ अथवा स्वंय मृत्यु भी/ द्वारे आ जाये अभी/ भय न मन में हो/ किंचित कि मर जायेंगे/ मृत्यु तो मुक्ति पर्व/ निर्भय अपनाएंगे/
आपके  संघर्षमयी जीवन यात्रा की बड़ी ईमानदार कहानी है। अपने नाम को सार्थक करते हुए जटियाजी का कलम के जरिये शोषण और विसंगति के खिलाफ संघर्ष निरंतर जारी है।
स्वतंत्रता की चाह लिए/ संग्राम सतत जो करता है/धधका करता अंगारों सा/ कभी विराम न करता।
कवि जटियाजी पूरी ईमानदारी  और साहस के साथ लंबी दौड़  लगाते-लगाते अन्याय, शोषण के विरूद्ध संघर्ष करते-करते राजनीति में आये। गाँव-गाँव गरीब किसान और कस्बा, शहर के श्रमिक क्षेत्र में काम करते-करते, संघ के गीत गाते-गाते कवि सम्मेलनों में सुनाते हुए अलख जगाना इनका स्वभाव आज भी बना हुआ है।
एक देश एक रक्त फिर हम हैं विभक्त/ एक शक्तिशाली दूसरा  है क्यों अशक्त?
शोषण के विरूद्ध अब युद्ध चाहिए/ देश को उत्कर्ष का संघर्ष चाहिए/
जटियाजी का संग्राम गरीबी, बेकारी,बेरोजगारी, असमानता, आतंकवाद और सांप्रदायिकता के विरूद्ध कम नहीं है। प्रमाण के लिए कवि की चुनौती देखियें-
किसमें दम हैं जो बाँध सके/ चिंतन की मुक्त उड़ानों को/ किसमें साहस जो कुचल सके/ आजादी के बलिदानों को/ आतंक दमन की दहशत से/ आदर्श नहीं टिक सकते हैं/ दमकते कुबेरी कोषों पर/ सिद्धान्त नहीं बिक सकते हैं/
सच पूछों तो आज सबसे बड़ा संकट हमारे नैतिक मूल्यों का  पतन और सिद्धान्त विहीनता का है। सच यह है कि सच सुनाये कैसे? सच को सच हम बताये कैसे?
कुएँ में बदबू पानी को रोग/ काहे रस्सी बाल्टी बदले लोग? सूरज को कोहरे का लगा पहरा है/ लोकतंत्र को स्वार्थ के अंधेरों ने घेरा है/
जटियाजी ने अपनी कविताओं में इंसान को इंसानियत से विमुख होने पर कहा है-
एकता के भाव का आभाव हो गया/ मेरा देश अपना कहाँ खो गया?इसी प्रकार जटियाजी के काव्य में अवसरवादी स्वार्थपरक तत्वों पर भी रंग में व्यंग्य देखा जा सकता है। देखते ही देखते खजूर बन गये/ चार ही दिनों में हुजूर बन गये/
कवि जटियाजी सत्य के प्रति निष्ठा और कर्मठता, उत्सर्गशीलता इनके सत्यज उपनाम को सार्थक करती है। कवि की इन मार्मिक पंक्तियों में किसान का सच्चा जीवन चरितार्थ है-
किसान के अहसान को/ खेत और खलिहान को/ अथक श्रम मुस्कान को/ भुला दिया किसान को/ बीज ठीक मिला नहीं/ खाद महंगा कर दिया/ दिया उसने देश को/ हमने उसे क्या दिया?
जटियाजी ने एक बार संसद में अपने काव्यात्मक भाषण में भारत के  गाँव और ग्रामीण जीवन का जो  करूण चित्र खींचा वह काबिले-तारीफ है-
एक ओर गाँव है/ जहाँ अभाव ही अभाव है/ पानी, बिजली, शिक्षा का/ स्वास्थ्य और चिकित्सा का/ ध्यान देगा अरे कोई/ जहाँ अभाव ही अभाव है/
संसद भवन में इस  सच्चाई की अभिव्यक्ति से यह आभास होता है कि कवि पूर्व केन्द्रीय मंत्री सत्यज ने अनुभूतियों का साक्षात्कार करते हुए सर्जना के सोपानों को गढ़ने का उपक्रम किया है।आप वर्तमान राजनैतिक जीवन के ऊहापोह में दार्शनिक पक्ष को वाणी देने में सतर्क रहते हैं। वाकई गीत और दीप दोनों प्रकाश के प्रतीक हैं-
गाएँ स्नेह के गीत/ गीतों से जलें दीप/ दीप से दीप जलाएँ/ अंतर से अंतर का अंतर/ नहीं कुछ अंतर रह जाए
कवि ने अंधकार से लड़ने के लिए संकल्प का दीप जलाने और दीप-बोध का बड़ा यथार्थ वर्णन किया है-
माँ, अभी दूर है, दूर सवेरा/ इस पर घोर तिमिर का घेरा/ इसीलिए माँ, जगता हूँ/ तेरी रक्षा हित प्रतिपल जलता हूँ/
कवि मानवतावादी है। मानव के प्रति गहरी निष्ठा आस्था है। किसान, मजदूर, सर्वहारा-वर्ग उसकी सहानुभूति के पात्र हैं, इसलिए उन्हें यह लिखने लिए भी बाध्य होना पड़ा-
ऊँच-नीच जाति-पांति भेदभाव है/ वर्ग-भेद वर्ण-भेद का दुराव है/
जटियाजी की वाणी में बड़ा असर है। भारतीय आर्य संस्कृति उनके विकास की इमारत है।
ये राष्ट्रीय भावना के  पोषक, हिमायती माने जाते हैं। कवि का यह देश-गीत हम सबके  लिए गुनगुनाने लायक है-
कुम-कुम छिड़के  जहाँ पर सवेरा/ महावर रचाये संध्या नवेली/ हवाओं में महके चंदन की खुशबू/ यह देश मेरा प्रियदेश मेरा/ गाँधी, गौतम, महावीर की धरती/ सत्य अहिंसा का उपदेश करती/ प्राणों से प्यारा वतन यह हमारा/ अर्पित है यह तन-मन जीवन सारा/ यह देश मेरा, प्रिय देश मेरा/
देश का कल्याण तभी हो सकता है जब देश की भाषा हिन्दी हो। हिन्दी हमारी संस्कृति आस्था एकता की पहचान है। जन-जन की कल्याणी वाणी हिन्दी को देश के आलोक रूप में स्थापित करने का कवि द्वारा काव्य कौशल अद्भुत है-  इस देश की अभिव्यक्ति शक्ति/ जन-जन की वाणी कल्याणी हिन्दी है/ आओ। हिन्दी से हिन्दस्तान को/ समझे और समझाएं/ देश की
कवि सत्यज की कविताओं के अंतरंग में झांकने से यह तथ्य सामने आता है कि कवि की काव्य यात्रा सर्वथा निजी अनुभव की यात्रा है। अनुभूति की प्रमाणिकता एवं ईमानदारी की बात प्रत्येक पंक्ति में झलकती है। सारा काव्य सात्विक चेतनाशील महिमा मण्डित हैं। जटियाजी यदि राजनीति में नहीं होते तो बहुत बड़े कवि साहित्यकार होते। अपने जीवन में कुछ भी छुपाने की कोशिश नहीं की आप जो हैं, जैसे हैं, उसी रूप में स्वंय को प्रकट किया है।
ज्ञान को विज्ञान से, साहित्य को संस्कार से जोड़ने की क्षमता  रखने वाले इस विराट काव्य पुरूष पूर्व केन्द्रीय मंत्री सत्यनारायण जटिया सत्यज के संग पूर्ण तन्मयता से दीप से दीप जलाते रहें। गहराते  संकट में मुस्कुराते रहे ।  नई चेतना का अखल जगाते रहे। देश प्रेम का शंखनाद गुंजाते रहें। इसी सत्यज संदेश को आत्मसात करते हुए आपके जन्म दिवस पर हार्दिक मंगलकामनाएँ, बधाई। जय हिन्द।  जय भारत।।
एकता को सशक्त बनाएँ/ माँ भरती का सुयश गाएँ/ जय हिन्दी। जय जय हिन्दुस्तान/
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