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इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

सोमवार, 1 जुलाई 2013

बड़े आदमी

  • -  सुशील भोले  -
गाँव म जब कोनो काम - बुता के सुरुवात होवय त बड़े आदमी के हाथ ले होवय। डोली म गोदी कोड़वाय के काम होवय, चाहे संगसी - कोलकी म मुरमी पटकाय के। बड़े आदमी आतीस, हूम - धूप देके नरियर फोरतीस तब जा के बूता करइया मन बुता धरयं। ए रिवाज ह तइहा - तइहा ले चले आवत हे। एकरे सेती आजो बड़े आदमी के अगोरा होवत हे। फेर आज बेरा बुलके ले धर लिए हे। सुरुज नरायन के कोंवर घाम ह चरमराए ले धर लिए हे, तभो ले कइसे बड़े आदमी के डोला ह मसान घाट म आबेच नइ करत हे।
मजूरी करइया मन आपस म फुसफुसावयं - कइसे महतरु, आज गौंटिया ल का हो गे ... आन बखत तो ठउका बेरा मा आ जावत रिहिसे। आज कइसे बेरा ल बुलका डारिस ?
- हौ भाई, मंहू उही ल गुनत हौं जी। झपकन आतीस त हमरो मन के रोजी पक जातीस, नइते जानत तो हस ठेकादार ल, एको घंटा बुलकिस ते आधा दिन के रोजी ल काट दिही।
- ठउका केहेस भइया, गौंटिया के बेरा - बखत म अवई - जवई म हमार मन के कोनेा हाथ बात नइए, तभो ले रोजी हमरेच मनके कटही न काहत बुधारु ह सलूखा के खीसा ले चोंगी हेर के मेहतरु करा माचिस मांगीस। तहां ले दूनों झन पेंड़ के छांव म बइठ के चोंगी चुहके लागिन।
गाँव के मरघट्टी म पक्का ईटा - सिरमिट के चौंरा बनइया रिहिसे तेमा बादर - पानी के दिन म घलोक लास ल जालये म सोहलियत होवय। कोतवाल बतावत रिहिसे सरकारी खजाना ले पइसा आए हे का मुक्तिधाम कहिथें तइसने योजना म तेकर नेंव कोड़े अउ तहां ले ईंटा रचे के काम के आज सुरुवात होवइया हे। बस बड़े आदमी के एकरे सेती अगोरा होवत हे, काबर ते वो हर गाँव के सरपंच घलोक आय। कोन जनी कइसे ढंग के चुनाव जीतगे रिहिसे ते ? अइसे तो गाँव के एको आदमी ल वोहर भावय नहीं, फेर बताथें के ठउका चुनाव के दू दिन पहिली ले दारु - कुकरा अउ लुगरा - धोती के मोटरा ल वोहर घरों - घर बगरा दे रिहिसे।
जब पइसा कौड़ी अउ पद पदवी के बात चलथे त वोहर अपन छोड़ अउ कोनो ल न तो अपन ले बड़े मानय न अपन के जोड़ के। लोगन ल गारी - गुफ्तार देके वो पद म बइठे के जोंग जमा लेथे, फेर जब वोट बटोरे खातिर लोगन के मुंहाटी म जाये के बेरा आथे, त वोकर ले बड़े समाजवादी अउ गरीब - गुरबा मन के हितु - पिरितु अउ कोनो नइ होवय। अइसन बेरा म कोनो तो कहि लेवय के वोहर दारु - कुकरा के बंटई म ककरो संग ऊंच - नीच के भेदभाव करे हे कहिके, या कोनो बैरी दुसमन के घर म घलोक नइ अमराय होही कहिके। राम राज के साक्षात दरसन होथें अइसन बेरा म।
बड़े आदमी अतेक करथे धरते तभो ले गाँव के एक झन पढ़ंता बाबू ह वोकर लंदी फंदी अउ दांत - खिसोरी के छोड़ अउ कांही गोठ ल नइ करय। वो दिन काहत रिहिसे - इही बड़े आदमी मन के सेती हामन आज तक पिछड़े हावन ग। ए मन ल बड़े  आदमी ये कहिके पूरा समाज के नेतृत्व ल सौंप देथन अउ ए मन सिवाय जोजवा गिरी के अउ कुछु नइ करयं। चाहे इहां  के छोटे सभा म भेज दे चाहे दिल्ली के बड़े सभा म एमन सिवाय दूसर के पाछू किंं जरे अउ हथउट्ठा बरोबर बिना कुछु सोचे - गुने सिरिफ हाथ उठाए अउ कुछू न करय।
अब तो जम्मों समाज के मनखे मनला बड़े आदमी माने अउ बनाए के मापदण्ड ल बदलना परही सिरिफ धन भर के रेहे ले कोनो बड़े नइ हो जाय, ज्ञान कर्म अउ ईमानदारी घलोक होना चाही। अपन अस्मिता के समझ अउ ओकर बढ़तार खातिर समरपन के भाव होना चाही। आज बाहिर ले आए आदमी हमर मन के छाती म चढ़त जावत हे। त वोहर अइसने जोजवा मन  के सेती आय। जे मन ल किंजर - किंजर के पतरी चांटे के छोड़ अउ कुछु नइ आवय। जेकर मन के न कोनो आदर्श होवय, न सिद्धांत, न दरसन, बस सुवारथ अउ सिरिफ सुवारथ होथे अइसन मन के भरोसा न तो हम अपन गौरव के रकछा कर सकन न आगू बढ़ सकन। जनम - जनम तक सिरिफ पिछड़ा के पिछड़ा रहि जाबो।
गाँव के दू - चार झन टूरा मन पढं़ता बाबू के हाँ घलो मिलाथे, वो मन जगा - जगा पढं़तच ल अवइया बेरा म गाँव के सरपंच बनाए के गोठ घलो करयं। फेर जीवन भर बड़े आदमी के गुलामी भोगत बुढ़ुवा मन उंकर मन के बात ल बेलबेली ले जादा अउ कुछु नइ मानयं, उल्टा टूरा मन ला फटकार देवयं - अरे, जावव न परलोखिहा हो सइकिल म किंजर - किंजर के लोगन ल कविता कहिनी सुनावत रहिथे तेला गाँव के सरपंच बनाबो रे ...। जब देखबे तब का - का लिख के कागज ल करियावत रहिथे अउ गजट - सजट म का अंते - तन्ते छपवावत रहिथे। वोकर घर म देखबे त लोग - लइका मन दाना - दाना बर लुलुवावत रिहिथे अउ ए पढ़ंता बाबू ह सिरिफ क्रांति, न्याय अउ धरम युद्ध के बात करथे, अइसने बइहा - भूतहा ल गाँव के सरपंच बनाबो रे ... ?
पढ़ंता बाबू के अइसनहा चारी करइया मन म मेहतरु अउ बुधारु घलो हे, जेमन बड़े आदमी के अगोरा करत आज के अपन रोजी कटे के गोठ गोठियावत हें। दूनो के चोंगी चुहकागे रिहिसे। बर पान के सेंध मनले झांकत घाम ह अब बनेच जनाय बर धर ले रिहिसे। रोजी कमाए बर आए आने मनखे मन घलो घाम के चरमराई ले बांचे बर ऐती - तेती के पेड़ मन के छाँव म जाके बइठ गे रिहिन हें। सबो के चेहरा म आज रोजी चुके के भाव झांकत रिहिसे। फेर कोन जनी बड़े आदमी के संवागा ह अभी ले कइसे नइ पूरे रिहिस ते ?
मेहतरु मन गोठियातेच रिहिन हें। वतके बेर कोतवाल ह बस्ती मुड़ा ले माखुर झर्रावत आवत रिहिसे। खखौरी म एक ठन चार हाथ के लउड़ी ल चपके अल्लर बानी के रेंगत रिहिसे। वोला देखके मेहतरु गोठिया परिस - का बात हे कोतवाल साहेब अकेल्ला आवत हस ... सरपंच कहां गे ?
बुधारु - अरे हां भई, अइसे म तो हमन मन के रोजीच बुलक जाही न ?
कोतवाल - अरे देखना भई,
 मैं तो अबड़ केहेंव गरीब मन के आज के दिन अकारथ हो जाही कहिके फेर घर ले निकलबेच नइ करिस।
मेहतरु - आखिर बात का आय तेमा ?
कोतवाल - कोन जनी, ठेकादार संग का पइसा - पइसा कहिके गोठियावत रिहिसे।
बुधारु - कहूं लेन देन के बात तो नइ होही ?
मेहतरु - हां, पढ़ंता बाबू कहिथे तेने तो सिरतोन नइ होही ?
कोतवाल - का कहिथे पढ़ंता बाबू ह ?
बुधारु - वो तो जगा - जगा एके  ठन बात ल कहिथे ग ... ए बड़े आदमी ह नीयत के एकदम छोटे हे। तुमन आज तक गरीब - गुरबा अउ पिछड़ै हौ तेकर असली कारन इही आय। तुंहर मन जगा तो मोहलो - मोहलो गोठियाथे फेर पेट ल घलोक तुंहर इहीच हर काटथे। तुमन ल कभू बने पढ़न - लिखन नइ दय, कभू पेट भर खावन नई देवय, न बने गतर के कपड़ा - लत्ता ल पहिरन देवय, ये सबके दोसी इही बड़े आदमी आय ?
कोतवाल - अच्छा, अइसे कहिथे।
मेहतरु - अतके भर ... ? अरे अउ अबड़ अकन गोठियाथे।
कोतवाल - अच्छा, का - का गोठियाथे ?
मेहतरु - एक दिन काहत रिहिसे .... सरकारी खजाना ले जतका रुपिया - पइया आथे तेकर आधा हर तो इही बड़े आदमी के खजाना म समा जाथे, ओकर बाद ठेकादार के कोठी म हमाथे अउ जेन थोक - बहुत बांच जाथे, तेमा नेंग छूटे असन अल्लर सटटर काम बुता ल करवा देथें।
कोतवाल - अच्छा, त पइसच के बंटवारा के सेती दूनों के बीच रुपिया - पइसा के गोठ होवत रिहिसे का जी ? ठेकेदार ह अबड़ जोजियावत रिहिसे ... तभो ले बड़े आदमी के घेक्खरई ह देखते बनत रिहिसे ... अब तो तुंहर मन के मनसा भरम ह महूं ल सिरतोन असन लागत हे जी।
पढ़ंता बाबू ह साहित्यकार के संगे - संग पत्रकार घलो हे तेेकर सेती वो हा लोगन ल किस्सा - कहिनी अउ कविता तो सुनाबेच करथे, पेपर मन म गाँव - गंवई के समस्या अउ बड़े आदमी सही मनखे मन के गलत काम के खुलासा ल घलोक करत रहिथे। एकरे सेती भस्टाचार म बूड़े मनखे मन वोकर संग ततेरे असन गोठियावयं। फेर जे मन समझदार के  संगे - संग ईमानदार अउ सिद्धांतवादी राहयं ते मन वोकर संग मया करयं। भले वोहर गरीब घर म जनमे हे फेर वोकर जीवन दरसन ह कोनो योगी पुरुष अउ उच्च कोटि के गियानी - धियानी ले कम नइहे। वो घर - परिवार म रहिके घलो उच्च कोटि के संत मन कस जिनगी जीथे। संझा बिहनिया एकक घंटा पूजा - पाठ करथे। एकदम सादा - सरबदा जीवन जीथे। वोकर हाथ म अतका कला अउ योग्यता हे के वो कहूं लंदी - फंदी करके पइसा कमइया मन संग छिन भर ठाढ़ हो जाय ज लखपति - करोड़पति बने म दू - चार दिन ले जादा नइ लागय। फेर वोला सुवारथ, लालच अउ नीयत खोरी के छइहां तक ह नइ छू सकत रिहिसे। एकरे सेती बड़े आदमी सही लंदी - फंदी मन वोकर खिलाफ म गलत - सलत बात के परचार करयं।
फेर पढंता बाबू ए सबके बिना चिंता फिकर करे अपन ईमान अउ सत धरम के रद्दा म रेंगते राहय। वोकर एके मिसन राहय अपन गाँव ल सरग जइसे बनाना। नीति - नियाव अउ आपसी मेल - जोल के माध्यम ले, सही माने म रामराज के स्थापना करना, अउ अइसन तभे हो सकत रिहिसे जब बड़े आदमी जइसन पााखण्डी समाज सेवक मन के हाथ ले सत्ता ल नंगा के जे मन सही म सेवा- चाकरी करथें तेकर मन के हाथ म सार्वजनिक जीवन के सेवा- कारज ल सौंपना। पढ़ंता बाबू जगा-जगा एके ठन बात ल दुहरावत राहय- जे मन ला सेवा के संस्कार मिले हे, सिरिफ उही मन सेवा कर सकथें, अउ अइसन उही मन हो सकथें जे मन पर के सेवा- चाकरी करत अपन मेहनत अउ इमानदारी ले आगू बढ़े रहिथें, अउ जे मन सिरिफ पद- पइसा अउ पदवी के घमंड म बूड़े दूसर संग हमेशा घेक्खरई अउ अपमान करे कस गोठ करथें ते मन कभू ककरो सेवा नई करे सकयं, अइसन मन सेवा के नांव म सिरिफ पाखण्ड कर सकथें, एकर ले जादा अउ कुछु नहीं। तुमन राजनीति अउ सासन - सत्ता ल सेवा के माध्यम बनाना चाहथौ त सिरिफ उही आदमी मन ला सत्ता म बइठारौ जे मन सेवा - चाकरी करत आगू बढ़े हें।
पढं़ता बाबू गाँव म कोनो किसम के काम - बुता होथे तिहां अवस के जाथे, पत्रकार होए के सेती पेपर म खभर भेजे के बुता ह घलो सिध पर जाय, फेर गाँव वाला मन संग मेल - जोल के कारज घलो पूरा जो जाय। वोला जानबा रिहिसे के आज मसानघाट म मुक्तिधाम के बुता चालु होवइया रिहिसे एकरे सेती बिहनिया ले पूजा - पाठ करे के बाद सइकमा भर बासी झड़किस तहां ले मसानघाट आगे। इहां देखिस त काम बुता - चालू नइ होय राहय। बुता करइया मन ऐती - तेती रुख राई के छाँव म बइठे राहयं। कोतवाल ल देख के वोहा मेहतरु अउ बुधारु खड़े राहय तेने कोती आइस, तहां ले पूछिस - कइसे कोतवाल, मुक्तिधाम के काम अभी ले कइसे चालू नई होए हे, काल तो तैंं हांका पारे रेहे हस आज बिहिनिया ले काम चालू हो जाही कहिके ?
- काला बताबे बाबू, देख ना सरपंच अभी ले आए नईये।
- कइसे आए नईये ... वोला जुड़ी - खांसी धर ले हे का ?
- नहीं, अइसन नोहय।
- त अउ कइसन ये ... सरकारी पइसा के अनपचक धर ले हे का ?
- टार बाबू, तैं अतेक पढ़े लिखे होके कइसे - कइसे गोठियाथस ग ...।
- मैं बने ल गोठियाथौं कोतवाल ... अपन के मेहनत अउ सत ईमान के पइसा ह पचथे ...  एती - तेती के पइसा म अनपचक होबे करथे। चाहे वोमा पेट - पीठ पिरावय चाहे मती छरियावय ... लड़ई - झगरा अउ देखिक - देखा के रस्ता निकली जाथे।
पढं़ता बाबू के गोठ म धंधमंदाया कोतवाल ल आखिर कहना परिस - हां, ठेकेदार संग वइसने उंचहा भाखा म गोठ तो होवत रिहिसे।
- देख मैं केहेव न जरुर चार सौ बीसी के खेल होवत हे... भगवान जानय अइसन मनखे मनला तुमन कब तक मुड़ी म लादे रइहौ ते ... आज देस ल आजाद होए तीन कोरी बच्छर ले जादा होगे हे। सरकार ह साल के साल तुंहरे जइसन गरीब - गुरबा मन के बिकास खातिर सउहंत खजाना ल खोल देथे, फेर आज तक वो खजाना के सुख - समरिधि ह तुंहर मन के घर कुरिया म नइ हमा पाए हे ... आखिर कब चेत चघही तुंहर अरे तुंहर लोग लइका मन के भविस ल तो सोचौ।
रोजी के चुकई अउ घाम के तपई म बुधारु के मति थोकिन तीपे सहीं होगे रिहिसे, वो कहिस - सहीं काहत हस बाबू, अइसने आदमी मन के सेती हमन आज तक पिछड़े अउ गरीब - गुरबा बने हावन, तोर केहे एकक बात ह सत ये। अब अवइया बेरा म तोरे असन मनखे के हाथ म गाँव के मरजाद अउ विकास के रस्ता ल सौपबो।
मेहतरु घलो वोकर संग हां म हां मिलाइस, तहां ले कोतवाल घलो वोकरे कोती संघरगे, फेर मसानघाट म जुरियाए जम्मो मनखे देखते - देखत पढ़
ता बाबू के रंग म रंगगे।

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