इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

वह एक लड़की


-  डॉ. तारिक असलम ' तस्नीम '  -
जब उसकी उम्र करीब तेरह - चौदह साल थी। वह सारा दिन घर - आंगन तो कभी छत - मुंडेर पर दौड़ भग किया करती। वह इतनी चंचल और चुलबुली थी कि उसे एक पल के लिए भी कहीं चुप बैठना कठिन लगता। कभी वह चिड़ियों को फंसाने के लिए डंडे के सहारे रंग- बिरंगी तितलियों का पीछा करती भागती दिखती तो कभी छत पर रस्सी कूदती नजर आती। मजे की बात तो यह थी कि जब कभी कोई चिड़िया या तितली उसकी पकड़ में आ जाती, अचानक उसके चेहरे से हंसी - खुशी गायब हो जाती। अब उसके चेहरे की रंगत को देखकर कोई भी यही कहता कि वह अपनी इस करतूत पर पश्चाताप से भर उठी है। चूंकि अब उसे निर्णय करना था कि वह उस बेचारी चिड़िया या तितली का क्या करे ? वह उसे घर में रख नहीं सकती थी क्योंकि उसे इसकी अनुमति हासिल नहीं थी। कभी वह सोचा करती - क्या उसे यों ही जीवन भर सबकी इच्छा और अनिच्छा के सहारे जीवन यापन करनी होगी ? क्या उसे स्वत: कोई निर्णय लेने का अधिकार नहीं है ? ये बातें उसके मन को बहुत कचोटतीं। तब वह आव देखती न ताव पकड़े गए जीव को फूर्र से हवा में उड़ने के लिए उछाल देती। इसके बाद उसके चेहरे पर खुशी की लहर देखते बनती। इन सारी कारगुजारियों को अंजाम देते सुबह से शाम हो जाती और छुट्टियों के दिन यों ही गुजर जाते। उसे खाने - पीने तक की सुध नहीं रहती। माँ उसे पुकारते - पुकारते थक हार कर बैठ जाती, तब वह कहना नहीं भूलती - भगवान जाने यह जिस घर में जाएगी। कोई काम कैसे कर पाएगी। इसके पैर तो कहीं टिकते ही नहीं, जैसे पैरों में चक्कर लगे हैं। कहने को बड़ी हुई जा रही है मगर न कोई काम न धंधा सीखा अब तक। बस स्कूल जाना और घर आकर खेलना - कूदना। इससे भला कोई विवाह करेगा भी तो कितने दिन निभा पाएगा बेचारा ...। बस, अपनी माँ की यही एक बात सुनकर उसके चेहरे से खुशी काफूर हो जाती। उसे माँ की यह बात बिल्कुल अच्छी नहीं लगती।
साल - महीने गुजरते गए और वह स्कूल की शिक्षा पूरी कर कॉलेज में जा पहुंची। जी हां, मोहिनी नाम था उसका। उम्र यही कोई चौबीस साल। लम्बा कद, साफ - सुथरी चेहरे की रंगत। तीखे नयन - नक्श और तिस पर बोलती बड़ी - बड़ी सी आँखें। विचारशील मन - मस्तिष्क। वह एम. ए. मनोविज्ञान की छात्रा थी। जिसे किसी की कोई बात सुन भर लेने से सहज रुप में ग्रहण कर लेना उसकी आदत नहीं थी। गुजरते वक्त के साथ उसके अपनी चारों ओर विचारों एवं भावनाओं की एक ऐसी लक्ष्मण रेखा खींच रखी रखी थी, जहां उसे घर परिवारा और समाज के बहुतेरे फैसले अर्थहीन प्रतीत होते। मोहिनी को अपने घर वालों की ही बहुत सारी बातें और बंदिशें निरर्थक लगतीं। उसके विचार किसी से मेल नहीं खाते। जिसका परिणाम यह निकला कि वह कॉलेज में भी अधिकतर समय खामोशी ओढ़े रहती। उसकी चुप्पी से उसकी सहेलियां भी दूर भागती थी। जो उसकी आँखों की भाषा बिल्कुल ही नहीं समझती थी। क्योंकि उसकी अपनी सोचने - समझने की सीमाएं थीं, जिसमें उसे किसी का हस्तक्षेप कतई पसंद नहीं था।
मोहिनी को बार - बार यह अनुभूति होती कि उसे एक युवती होने के कारण ही बहुत सारे संबंधों से दूर रहने की चेतावनियाँ झेलनी पड़ती है। उसे यह करो, वह मत करो के आदेश दिए जाते हैं। दिलचस्प बात तो यह भी है कि माँ भी पिताजी और भाइयों का ही ऐसे मामलों में साथ देती दिखती है। सब यही न जताना चाहते हैं कि वह पुरुषों के सामने अपने कद को सदैव छोटा मानकर चले, कारण कि उसे जीवन भर घर की चार दीवारी के भीतर में ही कैद रहना है। इसीलिए उसे पुरुषों के बराबर अधिकार नहीं मिल सकते। वह पढ़ - लिखकर चाहे जितनी डिग्रियां अर्जित कर ले ... उसे जीना तो पुरुषों के साये ही में है क्योंकि वह एक पुरुष है और वह एक लड़की ... ये बातें उसे बेतरह कचोटती।
मोहिनी को अपने इस विचार को उस एक घटना से बड़ा बल मिला, जब उसने एक दिन अखबार में यह खबर पढ़ी कि एक पुलिस महानिदेशक ने एक भारतीय प्रशासनिक सेवा की महिला के साथ छेड़खानी की। जिसके विरुद्ध महिला ने कोर्ट में मुकदमा दायर किया है। उसने भी अपने दिल के किसी कोने से यह स्वर उभरता अनुभव किया कि सदियों बाद भी एक पुरुष के नजरियें में महिलाओं के प्रति यदि कोई बदलाव आया है तो वह यही है कि उसे स्वयं को साबित करने का एक अवसर चाहे - अनचाहे दिया है। मगर वे अपने वर्चस्व को छोड़ने को आज भी तैयार नहीं है। ऐसी ढेर सारी बातें थीं जो मोहिनी को अक्सर तनावग्रस्त कर दिया करती। उसकी आँखों के आगे अंधकार पसरने लगता।
शाम के समय अक्सर वह घर के बगीचेनुमा अहाते में पड़ी आराम कुर्सी पर बेपरवाही से पसरी आकाश को निहारा करती। वह सोचती - इतने बड़े आकाश में एक चांद की भला क्या हैसियत हो सकती है ? जब एक सूर्य की रोशनी चांद के नरम - मुलायम स्पर्श सी चांदनी तक को अपनी किरणों में गुम हो जाने के लिए विवश कर देती है। उसके अपने अस्तित्व की स्थिति भी तो ऐसी ही दिखती है। तब क्या वह भी पुरुषों की दुनिया में उनके हाथों का एक मोहरा बनकर रह जाएगी ? उसकी तन्द्रा तब टूटती जब हजारों फीट की ऊंचाई से एक तारे के समान किसी हवाई जहाज को गुजरते या फिर आकाश के किसी कोने से तारे को टूटकर गिरते देखती। यह दृश्य उसे हमेशा रोमांचित करता।
कुछ ऐसा ही रोमांच उसने अपनी किताबों के अलावा नील से मिलने के बाद अनुभव किया था, जब दोनों पहली बार कॉलेज कैंटीन में मिले थे। उसकी सहेलियों ने उसे नील से मिलवाया था। वह फिलासफी की पढ़ाई पूरी कर रहा था। वह भी एक मध्यमवर्गीय परिवार का सदस्य था, जिसे अपने जीवन की नीव स्वयं तैयार करनी थी।
इसके बाद जब भी दोनों मिले। एक दूसरे में कॉमन फैक्टर तलाशते रहे। यही उनके बीच मित्रता की बुनियाद भी थी। मोहिनी ने अनुभव किया कि नील भी उन्हीं परिस्थितियों का शिकार है। जिससे उसकी जिंदगी की तमाम रंगिनियां एक - एक कर छिनती जा रही है। वह सोचा करती आखिर ऐसे जीवन का अर्थ ही क्या है ? जिसमें न कहीं कोई रंग हो न रस। अब वह अपनी बात कहे भी तो किससे ? घर की हालात ऐसी कि पिताजी नजरें चुराये फिरते हैं और माँ चेहरे के भावों को पढ़कर ही चुप्पी साध लेती है। कहने के लिए घर में तीन भाई है किंतु उनको अपनी बीबियों से ही फुर्सत नहीं मिलती जो उसके भविष्य के बारे में सोचें। मोहिनी को अपने परिवार में बस एक ही ऐसा मुद्दा सबको विचारणीय लगता था कि वह पराया धन है, जिसके पढ़ाई पर किया जाने वाला सारा पैसा व्यर्थ जाएगा। किंतु उसके पिताजी बेटों के मंतव्य से संतुष्ट नहीं थे, इसलिए उसके पढ़ने का सिलसिला जारी था और वह भी यही चाहती थी कि वह स्वयं को किताबों में उलझाए रखे। घर की स्थितियों को देखते हुए उसे अपने ही लोगों से जुड़ाव एक नाजुक रिश्ते की डोर से बंधा हुआ प्रतीत होता, जिसे विवाह के बाद एक प्रकार से टूटने जैसा ही कहा जा सकता है। ये बातें उसकी समझ में आ चुकी थी। ये भावनाएं उसे बहुत आहत किया करतीं। इसलिए चाहे - अनचाहे वह एक ऐसे बंधन के बारे में सोचने लगी थी जो उसे भावनात्मक संरक्षण भी दे सकता। जिसके टूटकर बिखरने का भय उसके मन में नहीं समाया रहता। यह किसी प्रताड़ना सा अनुभव करती वह। ऐसे अनुभूतियों के दंश ही व्यक्ति को आत्महत्या के लिए प्रेरित किया करते हैं। मोहिनी मनोविज्ञान की किताबों में अक्सर पढ़ती रही थी।
इस बीच वह नील से कई बार मिल चुकी थी। दोनों साथ - साथ कभी रेस्तरां तो कभी पार्क या फिर महानगर के मॉल में कुछ एक चीजों की खरीदारी के बहाने भी जाते रहे थे और अपनी इच्छा से कुछ न कुछ खरीद कर एक - दूसरे को भेंटस्वरुप देते रहे। उन्हें एक दुजे की कंपनी रास आने लगी थी।
लेकिन मोहिनी ने नील को कभी यह बताने की आवश्यकता नहीं समझी कि उसके लिए घरवाले वर की तलाश में जुटे हैं। वह न जाने कितनी बार दुल्हन की तरह सजी है और वह कभी चाय तो कभी नाश्ते की प्लेटें लिए अतिथि सत्कार में जुटी रही है लेकिन हमेशा यही होता आया है कि उसके व्यक्तित्व और कार्य कुशलता को सराहने और सफल गृहिणी बनने की बड़ी - बड़ी बातों के बाद हमेशा उसे रिजेक्ट कर दिया गया। उसके व्यक्तित्व से जुड़े तमाम गुणों और क्षमताओं को सिरे से नकारते हुए लोग बाग बार - बार मुंह फेर कर चले गए। वे कभी सीधे तौर पर तो कभी फोन से अपनी फरमाइशों की लिस्ट माता - पिता के मुंह पर मार जाते कि वे भरपूर दहेज के बिना अपने लाडले का विवाह यहा करना ठीक नहीं समझते।
आखिरकार मोहिनी के दिलो - दिमाग में यह बात घर कर गई कि यह दुनिया एक बाजार है। जहां उसे अपना भाव बढ़ाने के लिए केवल उच्चस्तरीय शिक्षा ही काफी नहीं है। उसे कुछ और कदम उठाने चाहिए। मगर किस दिशा में ? यह वह समझ नहीं पाती।
कुछ ऐसे ही विचारों में मोहिनी को खोया देखकर नील ने उसकी भावनाओं को कुरेदा था- तुम क्या सोच रही हो ? मैं ठीक - ठीक समझता हूं। मगर यों सोच - सोच कर किसी समस्या का हल तो नहीं निकल सकता है न। बेहतर तो यही होगा कि हम स्वयं को वक्त और हालात के आसरे छोड़ दें और सही समय की प्रतीक्षा करें।
- तुम भी कैसी बातें करते हो नील। कैरियर संवारने के इंतेजार में हम दोनों की उम्र ढलान की तरफ खिसक रही है और हम ब्रहमचर्य का पालन करके पारिवारिक मान - मर्यादा की रक्षा करने में जुटे हैं ... पर क्या यही हमारे जीवन का सत्य है ? या और भी कुछ है ? हमारे जीवन में कामनाओं के लिए तनिक सा भी स्थान नहीं है ? नील तुम्हारी उम्र पैंतीस साल हो चुकी है और मैं तीस पूरी कर रही हूं। क्या सचमुच इस बात का हमारे घरवालों को कोई खबर नहीं है ? मैं तो यह सोचकर आश्चर्यचकित रह जाती हूं कि इसी उम्र में मेरी मां पांच बच्चों की मां बन चुकी थी और मैं उस एक स्पर्श तक से वंचित हूं।
मोहिनी भावनाओं के रौ में बहते हुए और भी बहुत कुछ कहती चली गई। नील खामोशी से सब कुछ सुनता रहा। अब वह किसी नतीजे पर पहुंचना चाहता था। वह देख रहा था कि उसके दिल की भड़ास निकल जाने के बाद उसकी आँखों से कोशी नदी के टूटे बांध की तरह आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा है।
- अच्छा, तुम यह तो स्वीकार करोगी कि अब चालीस बरस पहले की तरह बचपन में विवाह संपन्न नहीं होते ? अब तो अनपढ़ परिवारों के बच्चे भी कैरियर के बाद ही विवाह करने की बात करने लगे हैं ... फिर हमारे यहां तो पहले से ही ऐसा चल रहा है ...।
- तुम कुछ भी कहो नील, हर काम के लिए निर्धारित समय होता है। मैं समझती हूं कि आज के दौर में भी विवाह समय पर ही होना चाहिए। यदि ऐसा परिवार वालों के लिए संभव नहीं लगता तो उन्हें अपना जीवन साथी चुनने का अवसर मिलना चाहिए या फिर अपने अंतरंग क्षणों को जीने की आजादी तो होनी ही चाहिए। सामाजिक एवं पारिवारिक स्तर पर ऐसा नहीं होने के कारण ही आज के युवा रेव पार्टियों में जाते हैं। अपनी मानसिक कुंठाओं से मुक्ति के लिए अनाप - शनाप हरकतें करते हैं। नशे की लत का शिकार बनते हैं। कुछ यंग चैप तो प्लेब्वाय और कॉल गर्ल तक के धंधे में उतर जाती है आखिर वे अपनी जरुरतों के लिए कहां जाएं ? यह यक्ष प्रश्न आज भी समाज की नजर में गोण बना हुआ है जिसे युवा वर्ग की ओर से चुनौती दी जा रही है। मोहिनी ने अपने दिल की बातें नील के सामने रख दी। नील ने अपने दोनों हाथ उसके कांधों पर रख दिया और उसकी झील सी गहरी आँखों में कुछ तलाश करने लगा। उसने किसी स्तर पर एतराज प्रकट नहीं किया।
काफी देर तक चुप्पी साधे रहने के बाद मोहिनी बोली - हम दोनों यदि नहीं मिले होते तो इसका अर्थ यह थोड़े ही निकलता है हम किसी और के करीब नहीं होते ? इस मामले में मैं स्वयं को उन युवतियों से बेहतर पोजीशन में देखती हूं जो न जाने कहां - कहां मुंह मारती फिरती है, दिल फैंक मर्दों की तरह। यह कहते हुए वह हौले से मुस्करायी। उसने नील की आँखों में झांका, फिर धीरे से बोली - यह रिश्ता कोई पाप नहीं है नील, जिसके लिए मैं किसी प्रकार के पश्चाताप से स्वयं को ग्रसित समझूं।
मोहिनी ने नील के कमरे में पलंग पर बिछी सलवटें ठीक की और वह जाने लगी। नील ने हंसते हुए यों ही सवाल किया - तो हमारे संबंधों के बीच कुछ भी अनैतिक नहीं है ? क्यों मेहिनी।
- नहीं, कुछ भी नहीं। यह मैं क्यों स्वीकार करु ? क्या इसलिए कि मैं एक स्त्री हूं। हमें पराया धन समझा जाता है ? हमें किसी और के परिवार में जाना - बसना है। जब तुम लोगों पर यह शर्त लागू नहीं होती तो फिर हम लोगों पर लादने की कोशिश क्यों होती है। इसीलिए न ताकि तुम लोगों का समाज पर वर्चस्व कायम रहे और तुम मनमानी करते रहो। क्यों गलत तो नहीं कहा मैंने? उसने पलटकर पूरी बेबाकी और बेखौफ लहजे में सवाल सा किया। जिसे सुनकर नील मन ही मन मुस्कुराया। अच्छा नील, अब मैं चलती हूं। बहुत देर हो गयी। यह कहते हुए मोहिनी ने दोनों हाथों से खुले बालों की लटों को एक झटके से पीछे किया और बाय - बाय करती कमरे से निकल गयी।
सुबह नौ बजे कालेज जाने के लिए वह घर से निकली थी। अभी शाम के सात बज रहे थे। हमेशा की तरह माँ आँगन में बैठी उसकी राह देख रही थी। उसे आते देखा। वह भी उसके पीछे - पीछे कमरे तक चली आयी। तूने आज फिर देर कर दी ? माँ ने संशकित होकर प्रश्र किया। मोहिनी निर्विकार भाव से माँ की ओर मुड़ती बोली - माँ कामिनी के यहां देर हो गयी। मैंने बहुत कहा किंतु वह छोड़ने को तैया ही नहीं हुई। यह सुनकर माँ चुप हो गयी मगर मोहिनी ने महसूस किया, उसके उत्तर से वह कतई संतुष्ट नहीं है। माँ ने उकस हाथ पकड़ लिया। वह ठिठक सी गयी। दोनों सोफे पर बैठ गयीं। माँ ने ही बात छेड़ी - बेटी, हम विवश है जो तेरा विवाह नहीं कर पा रहे हैं। आखिर कहां से लाएं चार - पांच लाख रुपये ? तेरे पिता को समझ में नहीं आता। इस चिंता में वह घुलते जा रहे हैं ... उन्हें कोई रोग नहीं। बस, एक तेरी चिंता उन्हें घुन की तरह खाए जा रही है। ऐसी स्थिति में तूने कोई गलत कदम उठाया तो हमारी और तेरे भाइयों की क्या इज्जत हर जाएगी समाज में ? यह कहते हुए वह फफक कर रोने लगी। मोहिनी की आँखों में भी आंसू भर आए।
किसी प्रकार स्वयं को संयत कर बोली - माँ, तुम किन भाइयों की बात करती हो ? वही जो अपनी बीबी और बच्चों के अलावा कुछ देख नहीं सकते ? एक बहन तो जैसे मर चुकी है उनके लिए। उनके मान - सम्मान की चिंता तुम कर रही हो माँ ... जो बाबूजी को तिल - तिल कर मरते हुए तमाशाई की तरह देखते रहे हैं। मैं नहीं मानती यह सब माँ। जहां स्त्री को शिक्षित होने की बातें की जाती है किंतु विवाह योग्य तभी समझा जाता है जब उसके परिवार के लोग नोटों की गड्ििडयां घर - द्वार गिरवी रखकर वर पक्ष की झोली में डाल देते हैं ... यही हमारे समाज का असली चरित्र है। जो स्त्रियों को आत्महत्या के लिए उकसाता है। अपने रवैये से प्ररित करता है। वह अपना घर छोड़कर चली जाए। वाह रे समाज, एक स्त्री जन्म से मृत्यु तक घुटती रहे तड़पती रहे तो सती सावित्री कही जाती है और यदि वह प्रतिशोध लेने पर उतर जाए तो समाज के मुंह पर कालिख पुतती दिखाई देती है। लक्ष्मण रेखा केवल स्त्रियों के लिए ही क्यों माँ ? यह कह कर उसने माँ को झिंझोड़ डाला। चूंकि माँ की बातें उसे असहनीय लगीं थीं। वह चुप नहीं रह सकी थी।  मोहिनी ने माँ के हाथों को अपनी हथेलियों के बीच रखते हुए पूछा - माँ, तुम्हारे समाज को मेरी इतनी चिंता है तो फिर मेरी भावनाओं और अनुभूतियों के पंख क्यों कतरे जा रहे हैं। बोलो माँ, चुप क्यों हो ...। अगर तुम कुछ नहीं कहोगी तो मैं कह देती हूं- मेरी चिंता करना छोड़ दे माँ। मैंने अपने जीवनसाथी ढूंढ लिया है। फिलहाल वह भी मेरी तरह कैरियर की तलाश में है। हम में से जिसकी पहले जॉब लगेगी वही एक दूसरे को विवाह के लिए प्रपेज करेगा। हम दोनों का यही कमीटमेंट है, एक दूसरे के प्रति। और हां, हम दोनों पिछले दो सालों से पति - पत्नी की तरह रहते आ रहे हैं। यह बताते हुए मोहिनी चुप सी हो गयी। उसने माँ के चेहरे की ओर देखा।
मोहिनी ने माँ की आँखों में चाँद सी चमक अनुभव की। उसने मोहिनी को गले लगाते हुए इतना भर कहा - तू चिंता मत कर बेटी, मैं तेरे साथ हूं। तेरी परेशानी को समझ सकती हूं। मुझे कोई आपत्ति नहीं है इस रिश्ते पर। मैं तेरे पिताजी को भी समझा दूंगी ... सब ठीक हो जाएगा ... यह सुनकर मोहिनी को तो ऐसा लगा कि जैसे उसे एक पल में सारे जहाँ की खुशियां मिल गयी हो ....।
पता - संपादक कथासागर,6 सेक्टर - 2, हारुन नगर कालोनी,
फुलवारी सरीफ, पटना (पश्चिम)  - 801505

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