इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

क्रिसमस



-  मनीष कुमार सिंह -
ये स्कूल वाले पढ़ाने के लिए नहीं बस लूटने के लिए बैठे हैं। शीला ने चाय देते समय मुझसे अपने मन की गुब्बार को प्रकट किया। क्या हुआ मैंने प्रश्न किया। हालॉकि उसका कथन स्वयं ही इतना पारदर्शी था कि यह समझा जा सकता था कि कोई पैसे की डिमांड वाली बात होगी। अरे होना क्या है। क्रिसमस आने वाला है। कार्निवल के नाम पर सेंटा क्लॉज का ड्रेस पहना कर बच्चों को भेजने को कह रहे हैं। साथ में जेब मे  टॉफी, चॉकलेट डालकर लाने को बोलते हैं। नया साल आते ही पिकनिक पर भेजने के बहाने कुछ ढीला करवाएगें। ये सब उनके रोज - रोज के चोंचलें हैं। मिडिल क्लास का इंसान कितना झेलेगा। उसने थोड़े शब्दों में न केवल अपनी खीझ और परेशानी वरन् सम्पूर्ण मध्यमवर्ग का कष्ट उजागर कर दिया। मैं उसकी सामाजिक समस्या की समझ का लोहा मान गया। 
अपना चार वर्षीय पुत्र अंकित घर से करीब डेढ़ - दो किलोमीटर दूर एक स्कूल में जाता था। हम दोनों कई जगह घूमने के बाद इसी को चुनने को तैयार हुए थे। लोगों ने बताया कि पढ़ाई ठीक होती है। टीचर अच्छे हैं। सबसे बड़ी बात है कि खर्चा ज्यादा नहीं है। एडमीशन फीस और मंथली फीस औरों से कम थी। साथ ही गली के चार - छह बच्चे वहीं जाते थे। बस हमारे घर के सामने से जाती थी। और क्या चाहिए। फिर इतनी छोटी उम्र में ज्यादा तामझाम ठीक नहीं है।
अच्छा किया कि रुचि को सेन्ट्रल स्कूल में भर्त्ती कराया। वहॉ ऐसा कुछ नहीं है। फीस वगैरह का खर्च मामूली। पढ़ाई भी ठीकठाक ही है। दस वर्षीय रुचि पॉचवी क्लास में थी। योजना तो यही थी कि अंकित का भी एकाध साल में वहीं एडमिशन कराना है। वहॉ भी क्या इतनी आसानी से दाखिला होता है। ड्रा में आने पर जगह मिलेगी। ममी मेरे लिए सेंट क्लॉज का ड्रेस ला दो। नन्हा अंकित शीला के पैरों से लिपटता हुआ बोला। बेटा मैं तुम्हें एक अच्छा सा खिलौना ला दॅूगीं। वह कोई कम महॅगा आकर्षण दिखाकर उसका ध्यान बॅटाना चाहती थी। नहीं मुझे सेंटा क्लॉज का ड्रेस चाहिए। सारे बच्चे पहनेगें। छोटा बच्चा कहॉ मानता है। ठीक है चलो शाम में पापा के साथ ले आएगें। उसने फिलहाल पीछा छ़ुड़ाया। रुचि दूसरे कमरे में कुछ पढ़ रही थी। वह इस प्रसंग को सुनकर आ गयी। ममी - पापा मेरे लिए क्रिसमस ट्री खरीद लाना। मैं उसे सजाऊगी। मेरे सभी फ्रेंड्स ऐसा करते हैं। ् अच्छा - अच्छा चल अपना लेसन याद कर। पढ़ाई से कोई मतलब नहीं है। बस इन्हीं सब की धुन सवार रहती है।
जाने दो। बच्चे हैं। मैंने ह्स्तक्षेप किया। ये लोग जिद्द नहीं करेगें तो कौन करेगा। शीला उनको दूसरे कमरे में भेजकर बोली - घर की आमदनी तुमसे छिपी नहीं है। अपने बच्चों को अभी से जिम्मेवार नहीं बनाएगें तो आगे परेशानी होगी। यही पैसा इनके ऊपर खर्च करेगें तो संतोष होगा कि पैसे का सदुपयोग हुआ। मैं कुछ कहना चाहता था। पर खामोश रहा। कहता तो शायद यही कहता कि बचपन पर किया गया खर्च भी सदुपयोग ही है।
एक अपने त्योहार तो निभाएं? नहीं जाते। दूसरों का कहॉ तक निभाएं?। बात खत्म करते - करते शीला का यह आखिरी वक्तव्य था। मुझे बुरा लगा। अपने बचपन की यादें जहन में हमेशा जिन्दा रहती हैं। बड़े उत्साह - उमंग से दशहरा,दीवाली,होली मनाता था। स्कूल की संचालिका ईसाई टीचर थीं। उनके संपर्क में क्रिसमस का ज्ञान हुआ। सारे धर्म के त्योहार सामुदायिक उल्लास और सद्भाव से मनाए जाते हैं। कर्मकाण्ड को छोड़ दे तो प्यार और उमंग ही सभी त्योहारों की समानता है।
अंकित और रुचि बालकनी में अपने खिलौने एकत्र करके खेल रहे थे। रुचि ने गत्ते का घर बनाया था। गुिड़या को सजाकर अन्दर लिटाया। अंकित दौड़ - दौड़ कर अपनी दीदी के निर्देशों के अनुसार घर की सजावट हेतु सामान ला रहा था। मेरा रुमाल शीला का तौलिया और बिस्तर से तकिया लेकर वे लोग अपना काम कर रहे थे। बच्चों की क्रीड़ा देखकर मेरा मन न जाने किस मनस्थिति में लौट गया। दीदी मम्मा -पापा हमाले लिए सेंटा क्लॉज का ड्रेस लायेंगें ना ! अंकित अभी भी तुतलाता था।
- हॉ रे। और मेरे लिए क्रिसमस ट्री। रुचि उमंग से बोली। दीदी सेंटा क्लॉज बच्चों को चॉकलेट देता है। अंकित ने सवाल किया। हॉ। रात में जब बच्चे सो जाते हैं तब लाकर देता है। चुपचाप। उसने जो खुद सुना था वही उसे बता रही थी। तब तो बड़ा मजा आएगा।  वह ताली बजाकर हॅसने लगा। हम दोनों ने उन्हें खेलते देखा तो तय किया कि पास के मार्केट में चलकर घर के लिए कुछ सामान ले आते हैं।
    रिक्शे पर बैठते हुए मैंने कहा -बच्चे हैं। कितने खुश हैं। उनका दिल रखने के लिए ले लेते हैं। थोड़ा पैसा ही जाएगा। क्या हुआ। शीला विचारमग्न हो गयी। चिन्तन - मनन और महीने के गणित से निकलती हुई बोली - मैं क्या जानती नहीं। मुझे क्या इनसे प्यार नहीं है। पर देखो हम दोनों से कुछ छिपा नहीं है। इनको ऐसे बढ़ावा देगें तो आगे के लिए ठीक नहीं रहेगा। बच्चों का क्या दूसरे की देखा - देखी डिमांड करते हैं। हम लोग यह सब अफोर्ड नहीं कर सकते। उसके तार्किक कथन का वजन मैं महसूस कर रहा था।
मार्केट दूसरे सेक्टर में था। अपने यहॉ का शीला को मॅहगा लगता था। यह सब सोसाइटी फ्लैटस् वालों के लिए है। वह ऊॅचे टॉवरों की तरफ  इशारा करके कहती। इनके कारण इस जगह हर चीज महंगी मिलती है। जो भी माँगा बिना सोचे निकाल कर दे दिया। हमारे लिए वही ठीक है। बाजार में किराने और थोड़ी बहुत परचून की चीजें खरीदी। कुछ चीजें इच्छा होने के बाद भी टाल दिया। जाड़े में बच्चों के लिए टौमेटो सूप का पैकेट लेने का मन था पर सोचा कि जाने दो। बोनस की बस हवा उड़ी हुई थी। पता नहीं मिलेगा या नहीं। मिलेगा तो कितने परसेंट। इसलिए शीला को बताया नहीं। पर वह घरेलू औरत न जाने किस रेडार के द्वारा मेरे मन के अन्दर छिपे रहस्य को भॉप लेती है। अंधेरे में तीर चलाकर सारा भेद निकाल लेती। फिर कागज कलम लेकर बरसों पुरानी फरमाइशें,बच्चों की जरुरत की चीजें और मेरे लिए ऊन का खर्चा जोड़ने बैठ जाएगी। मैं इसलिए बताता नहीं था कि जब तक हाथ में न आ जाए ख्याली पुलाव नहीं पकाना चाहिए। बाद में न मिलने पर कष्ट होता है।
बाद में हमने एकाध जगह कपड़ों को भी देखा। अंकित के लिए नया पेंसिल बॉक्स लेना है। शीला को मैंने याद दिलाया। पिछले हफ्ते अपनी दीदी से लड़ाई में जमीन पर पटक कर तोड़ दिया था। ये बच्चे भी तो। रुचि के लिए नयी कॉपियॉ चाहिए। ट्यूशन वाली कह रही थी कि हर सब्जेक्ट्स की नयी कॅापी बनाओ। कब से रुचि? कह रही है। बोलती है कि ममी मुझे दूसरे बच्चों के सामने शर्म आती है। मैडम कहती हैं कि पुरानी डायरी पर कब तक लिखोगी। नयी कॉपी लेकर आओ। यहॉ पढ़ाई कम और ढकोसला ज्यादा है। शीला की बातों में व्यथा और आक्रोश घुला -मिला था। हमने यह सोचकर कि सरकारी स्कूलों में इंग्लिश सही नहीं रहती है रुचि को ट्यूशन लगाया था। ताकि बच्ची बात कर सके। इसी चक्कर में शीला ने घर में महरी नहीं रखी। दोनो चीजें अफोर्ड करना मुश्किल था।
क्या ले क्या छोड़े! वह दुबारा बोली। रुचि के स्कूल के जूते नीचे से बिल्कुल घिस गए हैं। कहती है कि ममी जब मैं चलती हॅू तो लगता है कि नंगे पॉव चल रही हॅू।
- तो ले लो ना। मैंने प्रोत्साहित किया। एक बार डर भी गया कि क्या हम इतने पैसे लेकर चले हैं अगले महीने ले लेगें। अब दिन ही कितने बचे हैं। वह बोली।
दूकान के बाहर ही क्रिसमस के लिए सेंटा क्लॉज का ड्रेस लटक रहा था। कितने का है  मैंने हठात् पूछ लिया। ढाई सौ का साहब।् जवाब मिला। कुछ देर सोचने के बाद शीला ने  पूछा - वैसे किराए पर भी मिलता है ना
- जी। सौ रुपए लगेगें।
- अरे ! खरीदने जाओ तो ढ़ाई सौ और बस एक दिन का किराया सौ रूंपया ।
 वैसे यह आपको सत्तर.अस्सी में भी मिल जाएगा। दूकानदार मुस्कराया। लेकिन कई साल से किराए पर दिया जा रहा होगा। मेरे यहॉ बिल्कुल नयी पीस मिलेगी।
 चलिए दूसरी जगह देखते हैं। शीला मुझे ठेलती हुई बोली। तीन -चार जगह हमने और पूछताछ की। रेट लगभग इतना ही था। थोड़ा कम ज्यादा बस। लौटते वक्त स्टेशनरी की दूकान पर मुझे क्रिसमस ट्री दिखी। चलो ले लेते हैं। इसका दाम ज्यादा थोड़े न होगा।
एक के लिए लेगें और दूसरे की चीज नहीं ले जाएगें तो घर में महाभारत हो जाएगा।् उसने यह भी पसंद नहीं आया। बच्चों की हर फरमाइश मानेगें तो घर चल चुका। 
लौटते हुए मेरे मन में बच्चों के रुठने - रोने का डर समाया हुआ था। अपनी चीज न मिलने पर हंगामा खड़ा कर देगें। साथ ही एक अपराधबोध भी था। जरा सा पैसों के लिए क्या कंजूसी करना। उनका दिल रह जाता।
घर पहॅुचकर देखा कि दोनों बॉलकनी में कुछ बनाने में जुटे हुए थे। रुचि कैंची - कलर पेंसिंल और कागज की कतरनों से काम कर रही थी। नन्हा अंकित अपनी दीदी की बतायी चीजों को दौड़ - दौड़ कर ला रहा था। हम दोनों उत्सुकतावश उनके पास पहॅुचे। रुचि ने टेडी बियर को लाल कपड़े पहना कर उसके ऊपर एक टेप रख दिया था। पुरानी रजाई से रुई के फाहे निकाल कर ढाढ़ी बनायी थी।  -ममी यह है आपका सेंटा क्लॉज ! वह बेहद उत्साहित थी। अंकित हमें देखकर हॅस रहा था। उसे लगा कि ममी - पापा उनके प्रयास की सराहना करेंगे। सेंटा क्लॉज के निर्माण के बाद एक डंडी के चारों ओर गोंद से कागज की रंगीन कतरनों को चिपका कर वे क्रिसमस ट्री भी बना रहे थे। वह लगभग तैयार था। कमरे तथा बॉलकनी में कागज की कतरनें पुराने कपड़े और बाजार में मिलने वाले सस्ते रंगीन सितारें बिखरे थे। मुझे एक बार लगा कि शीला यह गंदगी देखकर बच्चों पर नाराज होगी। लेकिन वह अपने चेहरे पर कुछ दूसरे ही भाव लाकर उनको निहार रही थी।
रुचि थोड़ा संजीदा होकर अपनी ममी से बोली -ममी मैंने पहले अंकित का सेंटा क्लॉज तैयार किया। बाद में अपना क्रिसमस ट्री बनाया। मैं छोटी हॅू लेकिन अंकित मुझसे भी छोटा है। आप लोगों के जाने के बाद वह खूब रो रहा था। जब मैंने उससे सेंटा क्लॉज बनाने का प्रॉमिस किया तब जाकर वह चुप हुआ।् अपनी दीदी की बातों से बेपरवाह अंकित सेंट क्लॉज को गोद में लेकर मगन था।
  • पता -  240.सी भूतल सेक्टर.4ए वैशाली गाजियाबाद ( उत्तर प्रदेश ) पिन.201012

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