इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

बुधवार, 3 जुलाई 2013

पाठक वर्ग को जागरूक होने के पहले लेखक वर्ग को जागरूक होना पड़ेगा ....

अपाच्य  भोजन परोसकर हम किसी को खाने के लिए कहें तो वह भला यिों खाये ? आज य ही क्स्थति लेखक और पाठकवगर् के मध्य  निमिर्त होती जा रही है. लेखक अपाच्य  लेखन पाठकवगर् के मध्य  परोस रहे  हैं और पाठकवगर् उसे नकार रहे हैं. य ही कारण है कि पाठकवगर् में पठन के प्रति वह लालसा नहीं रह गयी है जो पहले होती थी. मुझे अच्छी तरह मालूम है कि पहले पाठकवगर् मोटी - मोटी पुस्तकें पढ़ जाते थे मगर अब आठ - दस पेज की पुक्स्तका पढ़ने से कतराने लगते हैं.
पाठकवगर् में आयी कमी के लिए पूणर्त: टी.वी. संस्कृति को जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है पर यिा य ह उचि त है ? मुझे तो नहीं लगता. आज भी कई लोग ऐसे हैं जिनमें देखने की अपेक्ष्ाा पढ़ने की लालसा अधिक  रहती है बावजूव वह भी पढ़ने से जी चुराने लगता है.
चिंतन का विषय  है कि आखिर ऐसी कौन सी परिक्स्थयाँ निमिर्त हो गयी कि हमें पाठकवगर् को पढ़ने के लिए जागरूक करने अभियान च लाने, आव्हान करने की जरूरत पड़ गयी. पढ़ने की आदत छुटने से लेखन की आदत छुटती जा रही है, इसे नकारा नहीं जा सकता. पहले लोग चि ट्ठी लिखकर अपनी बात व्य I करते थे अब तो टेलीफोन, मोबाइल के कारण चि ट्ठी - पत्री लिखने की आदत छुट गयी है. तो यिा इसके लिए संचार माध्य म को दोषी करार दिया जाये ? जैसे कि पाठकवगर् में आयी कमी के लिए टी.वी. संस्कृति को दोषी ठहरा दिया जाता है. पाठकवगर् में आयी कमी के लिए जितना जिम्मेदार टी.वी. संस्कृति है यिा उतना ही जिम्मेदार वे लोग नहीं है जो पाठकवगर् को बांध रखने की क्षमता नहीं रखते. अथार्त वे लेखकवगर् नहीं है जो लिखते तो हैं पर पाठकवगर् को पढ़ा नहीं पाते. पठनयोग्य  सामग्री नहीं होने के कारण पाठकवगर् पढ़ना नहीं चाहते इस अकाट्य  सत्य  को भी स्वीकारना होगा.
माना कि Òष्य  संस्कृति ने हमारी पढ़ने की आदत पर डांका डाली है. मगर हम कितना कुछ टी.वी. पर देख पाते हैं. जो कुछ देखते हैं वह साहित्य  की श्रेणी में आता हो मुझे तो ऐसा नहीं लगता. सीरिय लें जो परोस दी जाती है. हम देख लेते हैं पर यिा उन सीरिय लों पर कभी चिंतन होती हैं ? कभी बुद्धिजीवियों के मध्य  प्रसारित सीरिय लों में से किसी एक सीरिय ल पर गहन चिंतन, आचार - विचार होता है ? जिस पर विचार न हो. जिस पर च चार् न हो. उसे साहित्य  कहना बेमानी नहीं तो और यिा है ?
मेरा तो व्य Iिगत विचार य ही है कि  आज पाठक वगर् पढ़ने से इसलिए कतराने लगे हैं यिोंकि हम उन्हें  वह पठनीय  वस्तु  नहीं दे पा रहे हैं , जो वे पढ़ना चाहते हैं. हम लिख तो रहे हैं परन्तु हम वह नहीं लिख पा रहे हैं जो पाठकवगर् चाहते हैं. या फिर कुछ अच्छा लिखा भी जा रहा है तो वह पाठकवगर् की पहुंच  से बहुत दूर है. पाठकवगर् को पढ़ने के लिए जागरूक करने के पूवर् लेखकवगर् को जागरूक होने की आवश्य कता है. अच्छी, विचारणीय  साहित्य  लेखन की दिशा में काम करना होगा. निक्श्च त रूप से पाठकवगर् बढ़ जायेंगे ....।

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