इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

बदली हुई भाषा और छत्‍तीसगढ़ की लोक संस्‍कृति

  • -  डॉ. जीवन यदु  -
       भाषा और संस्कृति का आपस में घनिष्ट संबंध होता है। वास्तव में भाषा भी संस्कृति का हिस्सा होती है। कहा जाता है -  भाषा के बूते ही संस्कृति का अस्तित्व संभव है। अर्थात क्रिया - कलाप, आचार - व्यवहार, खानपान, पहनावा - ओढ़ावा, कला - साहित्य सब कुछ भाषा के माध्यम से प्रकट होते हैं, अथवा विश्लेषित होते हैं। संस्कृति चाहे शिष्ट समाज की हो, चाहे लोक - समाज की, अपने प्रकटीकरण के लिए भाषा का ही सहारा लेती है। भाषा संस्कृति के प्रकटीकरण का माध्यम ही नहीं, वरन संस्कृति पर प्रभाव डालने वाला तत्व भी है। इसी तरह संस्कृति भी भाषा पर प्रभाव डालती है। चूंकि भाषा परिवर्तनशीलता होती है अत: भाषा को जो रुप अभी मौजूद है, कल भी यही रहेगा, यह कहना गलत नहीं होगा। जब पहले शिक्षा का प्रचार गाँवों में नहीं था, तब गाँव वाले अपने बच्चों को शिक्षा दिलाने हेतु पढ़े - लिखे व्यक्ति को नियुक्त कर देते थे। वह न केवल अध्यापक होता था अपितु गाँव का सलाहकार भी हो जाता था। गाँव वाले उसे वेतन में नगत रुपये के स्थान पर कोदो या धान देते थे। पढ़ाई का स्तर कुछ विशेष नहीं रहा होगा। इसलिए गाँवों में आज भी यह गर्वोक्ति सुनने मिल जाती है -मँय कोदो दे के नइ पढ़े हवँ।   तब शिक्षा - संस्कार भी विशेष प्रबल नहीं था, छात्र भी कम होते थे, किन्तु गाँव वालों के मन में उस स्थान के लिए श्रद्धा होती थी,जहाँ कोदो या धान के बदले शिक्षा देने वाले गुरुजी छात्रों को बिठाकर पढ़ाते थे। वे उस स्थान को मदरसा कहते थे। मदरसा शब्द इस्लामी संस्कृति से आयातित शब्द है और उर्दू शिक्षा - केन्द्रों के लिए आज भी प्रयुक्त हो रहा है। चूंकि  मदरसे  प्राय: मस्जिदों में ही लगाये जाते थे अत: लोगों के मन में मदरसों के लिए पवित्र भावना होती थी। यहाँ संस्कृति से लोकभाषा प्रभावित हुई और लोकभाषा में मदरसा   शब्द शुमार हो गया, किन्तु जैसे ही राजनीति प्रेरित शिक्षा संस्थानों की स्थापना गाँव - गाँव में होने लगी और शिक्षाा का दायित्व सरकार पर डाल दिया गया -  मदरसों  का स्थान  इसकूलों  ने ले लिया और कोदो, धान के बदले विद्या प्रदान करने वाले गुरुजी या पंडितजी , मास्टर जी हो गये।
       आज यह देखा जा रहा है कि ग्रामीणों के मन में जो श्रद्धा और पवित्र भावनामदरसों के लिए थी, वह स्कूल के लिए नहीं है। ठीक उसी तरह जो सम्मान पंडितजी या गुरुजी के लिए था, वह अब नहीं रहा। क्योंकि अब वह सरकारी वेतनभागी कर्मचारी है, ग्रामीणों का सलाहकार नहीं। तात्पर्य यह कि भाषा और संस्कृति एक - दूसरे से प्रभावित होती रहती है।
       लोक - जीवन में अभिवादन के लिए - राम - राम, जै रामजी या सियाराम शब्दों का व्यवहार वर्षों से हो रहा है। इन अभिवादनीय संबोधनों के पीछे उद्देश्य यही रहता था कि अभिवादन के बहाने ईश्वर को भी याद कर लिया जाए। श्रमजीवी लोक - समाज को ईश्वरीय आराधना के कर्मकण्डों के लिए समय निकालना कठिन ही है। अत: लोगों ने भक्ति - आंदोलन मध्यकाल के प्रभाव से ईश्वर स्मरण ही यही युक्ति निकाली होगी। बाद में यह लोक - समाज में एक व्यवहार - सा बन गया। इन अभिवादनों में अब धार्मिक गूंज कम और सामाजिक गूंज अधिक सुनाई पड़ती है। स्वतंत्रता आंदोलन से समूचे देश में राष्ट्रीय चेतना जागृत हुई और पढ़े - लिखे लोगों ने राम - राम और जय राम के बदले जय - हिन्द कहना शुरु कर दिया। यद्यपि यह अभिवादन पूर्व - प्रचतिल अभिवादन - शब्द को स्थान च्युत करने में पूरी तरह सक्षम नहीं था, फिर भी लोक जीवन में राष्ट्रीयता के बीज बोने में सफल अवश्य हुआ आज भी गाँवों में अध्यापकों का जय - हिन्द से अभिवादन किया जाता है।
        आजादी के बाद, राजनैतिक स्वार्थपरता के फलस्वरुप लोक - विश्वास पर आघात हुआ। राष्ट्रीय - चेतना से लैस अभिवादन जय - हिन्द ने एक पतनशील अर्थ ग्रहण कर लिया। यदि किसी ऐसे व्यक्ति की मृत्यु हो जाए, जिससे लोग नफरत करते हों तो लोक व्यंग्य में कहते हैं - बहुत कूदत रहिस हे, बने होगे आज मुंधरहा कुन ओकर जयहिन्द होगे। अर्थात् अब लोक - समाज में यह शब्द समाप्त होने के अर्थ में भी प्रयुक्त होने लगा है। छत्तीसगढ़ी काव्य - भाषा ने भी उसी अर्थ को ग्रहण किया है -
नेता मन आथे संगी
सुघ्घर गोठियाथे संगी
पलथिया के चिक्कन- चिक्कन खाथे
तहाँ जय हिन्द।
        बीसवीं सदी के अंतिम दशक के प्रारंभ में राम जन्मभूमि - बाबरी मस्जिद के राजनीति - प्रेरित आंदोलन ने अभिवादन की भाषा को फिर एक नया रुप दिा। लोक - जीवन और लोक - संस्कृति में राम रच बस गए हैं, अत: जयराम, राम - राम, जय - सियाराम के स्थान पर जय श्रीराम की स्थापना कठिन नहीं थी। चूंकि यह अभिवादन राजनीति के साम्प्रदायिक दृष्टिकोण से प्रेरित था, अत: इसने भाषा पर लहर के रुप में ही प्रभाव डाला। चूंकि लोक संस्कृति, जिसमें मुस्लिम आयातित शब्द मदरसा के लिए भी पवित्र भावना है के मूल में साम्प्रदायिकता के दुर्गुण नहीं होते, अत: साम्प्रदायिकता जनित शब्द ने लोक - संस्कृति को आंदोलित मात्र किया। स्थायी रूप से प्रभाव नहीं डाला। लोक - संस्कृति बहुत ही संवेदनशील समुच्चय है। वह राजनेताओं की राजनीतिक स्वार्थपरता को अनुभवकर जय - हिन्द जैसे राष्ट्रीय चेतना जनित शब्द का अर्थान्तर कर दे, कहा नहीं जा सकता।
       यदि कोई संस्कृति किसी दूसरी संस्कृति में घुसपैठ करती है, अथवा प्रभाव डालती है तो वह भाषा को ही माध्यम बनाती है क्योंकि भाषा अपनी संवेदनशीलता के कारण दूसरी संस्कृति के शब्दों को ग्रहण कर लेती है और उस पर अपनी अच्छी या बुरी प्रतिक्रिया भी प्रकट करती है। उदाहरण के तौर पर अंग्रेजी संस्कृति के हाफ - पैन्ट या फूल - पैन्ट को लिया जा सकता है। छत्तीसगढ़ की लोक - संस्कृति में इनका प्रवेश सीधे - सीधे नहीं हुआ। ये पहले शब्द के रूप में भाषा को मिले। लोक - संस्कृति की ओर से भाषा ने ही इन पर अपनी प्रतिक्रया की। लोक - समाज ने फुल - पैन्ट को कभी गाड़ा - टेकनी कहा तो कभी पोंगा या चोंगा। कहीं - कहीं गैंड़थैली भी कहते सुना गया है। अब गाँव  के लोग हाफ - पैन्ट और फुल - पैन्ट को धारण करके गर्व का अनुभव करते हैं। नयी पीढ़ी उन्हें स्वीकार कर चुकी है। पुरानी पीढ़ी अब भी पैन्ट को असुविधाजनक मानती है। यह सांस्कृतिक घुसपैठ कवियों की दृष्टि में थी।
बाप पहिरथे धोतिया - पोतिया
लइका बर फुलपैन्ट रे।
बाप लगावै चोवा चंदन,
लइका ल चाही सेन्ट रे।।
        लोक जीवन के खानपान में, दूसरी संस्कृति की जिस चीज ने अपना स्थान निश्चित कर लिया है, वह है चाय। सुबह चटनी - बासी खाकर खेती में जाने वाले किसान भी आज चाय की चुस्की लेकर काम पर जाने लगे हैं। मेहमानों का स्वागत भी चाय से किया जा रहा है। पहले अपने रिश्तेदार को निमंत्रण देते हुए लोग कहा करते थे - '' मोर घर तुमला एक बटकी बासी तहू मिलही।''
        छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति में चटनी - बासी बड़ी इज्जत की चीज समझी जाती थी। किन्तु अब उसका स्थान चाय ने ले लिया है। - तुमला मोर घर एक कोप चाहा तहू मिलही। चाय जो कि चीनी भाषा का शब्द है, छत्तीसगढ़ी में घुस गया और मराठी के प्रवाह से चहा या चाहा हो गया। कहीं - कहीं चा भी कहा जाता है। इस शब्द ने ना केवल भाषा को प्रभावित किया, अपितु लोक व्यवहार को भी बदल कर रख दिया। भाषा और लोक व्यवहार में रच बस कर इस शब्द ने कुछ दूसरे अर्थ भी ग्रहण कर लिए। पहले बासी जलपान और भोजन दोनो थी, किन्तु अब जलपान के साथ पर चायपानी चलने लगा है। विभिन्न शासकीय योजनाओं से लाभान्वित होने के लिए लोग सरकारी बाबुओं को उनका चाय - पान भी देने लगे हैं। लोक - जीवन में चाय के अर्थ को पकड़ रिश्वत रुपी चाय - पान को पकड़ लिया है। लोग इस बात से अनभिज्ञ है कि चाय किस भाषा - संस्कृति से उसकी भाषा - संस्कृति में घुस गई है, किन्तु सौदा - सुलुफ करते समय बुक बाण्ड, टाटा, ताज आदि शब्दों अपनी भाषा में स्थान देते जा रहे हैं।
       आजादी के बाद, जब देश का तेजी के साथ औद्योगीकरण हुआ,तब छत्तीसगढ़ी इलाके में अनेक छोटे - बड़े उद्योग खुले। लोक जीवन इन उद्योगों से प्रभावित हुआ। गाँव के कृषक चार महीने अस्थायी श्रमिक बनकर उद्योगों को अपना श्रम बेचने लगे। ऐसे लोगों की छत्तीसगढ़ी अन्य स्थानीय भाषा से मिलकर अथवा हिन्दी भाषा से मिलकर, भाषा का अजीब घाल - मेल तैयार करने लगी। लोगों को यह भी पता नहीं चला कि छत्तीसगढ़ी का हमार शब्द कब हमरा हो गया। हमरा को हमरा कहने वालों की कथन शैली में ठसक की अनुभूति होती है, वे अन्य लोगों से खुद को कुछ ऊंचा अनुभव करते हैं। उद्योग क्षेत्रों से लौटे लोगों की भाषा न हिन्दी रहती है न छत्तीसगढ़ी और न अन्य स्थानीय बोली। तात्पर्य यह कि उद्योग - क्षेत्रों में एक नई भाषा पैदा हो जाती है। भिलाई के लौह - संयंत्र से लगकर कई छोटे - छोटे उद्योग खुल गये हैं। गाँव के लोग इन्हीं छोटे उद्योगों में अस्थायी रूप से कार्य करते हैं। लौटकर बताते हैं कि वे ऐनामार और करेसन में काम कर रहे थे। कृषि संस्कृति और उद्योग - प्रधान - संस्कृति ने इतर भाषा के शब्दों को अपनी प्रकृति के अनुरुप स्वीकार किया है। ऐनामार शब्द अंग्रेजी के नामिनल मास्टर रोल के संक्षिप्त रूप एन.एम.आर. का छत्तीसगढ़ी रुप है। इसी तरह पत्थर तोड़ने वाली के्रशर मशीन से करेसन निकल आया और छत्तीसगढ़ी ने उसे स्वीकार कर लिया।
       पहले लोक - जीवन में नौकरी के प्रति कोई आकर्षण नहीं था। लोग नौकरी को हेय दृष्टि से देखते थे। लोक - जीवन में नौकरी को लेकर एक कहावत प्रसिद्ध थी -
उत्तम खेती, मद्विम बान।
अधम नौकरी, भीख निदान।।
       अब स्थिति बदल चुकी है। गाँव के पढ़े लिखे युवक सरकारी नौकरियों के प्रति आकर्षित है। अब उनके बुजुर्ग नौकरी को अधन नहीं कहते , प्रतिष्ठा की बात मानते हैं। वे बड़ी अकड़ के साथ कहते हैं  - मोर लइका फलाना डिपाट मा सरभिस करत हे। लोक जीवन का नौकरी के प्रति दृष्टिकोण बदला और अधम - नौकरी ने सरभिस का चोला पहन लिया। साथ ही विभाग या मुहकमा डिपाट बनकर छत्तीसगढ़ी में शामिल हो गया। जब लोक - संस्कृति ने नौकरी की स्वीकृति दे दी तब लोक भाषा ने अंग्रेजी के सर्विस और डिपार्टमेंट को अपना लिया।
       शासकीय योजनाओं से न केवल लोक - भाषा अपितु लोक  - संस्कृति भी प्रभावित हुई है। इनसे जहाँ लोक भाषा को अनेक शब्द मिले, वहीं दूसरी ओर उनके जीवन में और उनके दृष्टिकोण में भी परिवर्तन आया। पहले गाँव का मुखिया पूरे गाँव को अपने अनुसार चलाता था अब उनकी पकड़ गाँव के बूते मुखिया को कलेक्टर और हाई कोस्ट तक पहुंंचने का धौंस देता है। बिलाक - आफिस में अपनी पहुंच के बल पर काम करा सकता है। बीडियो की शिकायत एमले से कर सकता है। लोकभाषा में कचहरी के साथ कोर्ट जुड़कर कोस्ट कछेरी हो गया। कोरट - कछेरी के चक्कर से भरसक बचना चाहते थे, उन्होंने कोरट - कछेरी चढ़ना को प्रतिष्ठा का मानदण्ड बना लिया। आजादी के बाद लोकभाषा में कलेक्टर, कोर्ट ब्लाक - आफिस, बीडियो, एमएलए जैसे शब्दों ने प्रवेश किया और लोक - संस्कृति युगानुरूप मोड़ से गुजरने लगी।
       पहले लोक - जीवन में बचत पैसों से आभूषण खरीदने की परम्परा थी। कुछ हद तक आज भी है। इससे उनकी बचत आभूषण के रुप में उनके पास रहती थी। वे आभूषणों के प्रदर्शन में गाँव - समाज में प्रतिष्ठित हो जाते थे। साथ ही आवश्यकता और विपत्ति के समय ये आभूषण बड़े उपयोगी सिद्ध होते थे। आज बैंक खुल गये हैं, जहाँ से उन्हें ऋण भी मिलता है और बचत को जमा करने पर ब्याज भी। लोक - समाज में साहूकारों की भूमिका समाप्त होने लगी है। साहूकार की भूमिका बेंग और बिलाक निभाने लगे हैं। जहां इन सुविधाओं से किसानों को लाभ पहुंचा, वहीं कुछ किसान निरक्षरता और कार्यालयीन व्यवहार - वाद के कारण कर्ज में डूब गये -
भिखमंगी होगे किसान ला,
काम करे का खा के।
बोझा होगे हावे बढ़ियन,
सरकारी करजा के।।
       भविष्य में छत्तीसगढ़ी भाषा से बेंग शब्द साहूकार शब्द को पूरी तरह खारिज कर सकती है। अपनी उपयोगिता के कारण ही गाय - बैल, देवी - देवताओं की तरह पूंजित होते हैं। किन्तु इधर कुछ दिनों से उनकी उपयोगिता में कमी आयी है। कृषि जीवन में टे्रक्टर और सरकारी खातू या उरिया का महत्व बढ़ता जा रहा है। यदि भविष्य में गाय बैलों की पूजा औपचारिक मात्र बन जाये अथवा पूरी तरह बंद हो जाये और नगरिहा शब्द के स्थान पर टैक्टरिहा शब्द आ जाये तो कोई आश्चर्य नहीं। किन्तु तब - मोर नंगरिहा अवत होही, राँधे व भूंज बघार के जैसे लोकगीतों की संवेदना टेक्टरिहा के साथ जुड़ नहीं पायेगी। इस तरह कभी - कभी परिवर्तित होती हुई भाषा से संवेदना पर भी आघात पहुँचता है। किसानों के लिए गोबर खाद के अतिरिक्त सभी प्रकार की खाद सरकारी खातू में सुमार होती है। उनकी भाषा में यूरिया, उरिया बनकर मिल गई।
       ग्राम्य महिलाएं अब पानी भरने के लिए ठाकुर कुँआ, महराज कुँआ, मंडल कुँआ या दाउ कुँआ नहीं जाती। वे बोरिंग जाती है। लोकभाषा में बोरिंग शब्द शामिल हो गया, किन्तु इससे लोकगीतों के घाट - घठौंदा से जुड़ी प्रेम भावनाओं पर आघात नहीं हुआ, क्योंकि नदी तालाबों की उपयोगिता आज भी बनी हुई है। बोरिंग से लोक जीवन का सामाजिक धरातल ऊपर उठा है, क्योंकि मंडल - गौटियों की पकड़ से जन सामान्य को मुक्ति मिल गई।
       जब कोई शब्द उपयोगिता, सुविधा, आवश्यकता, संस्कृतियों के मिलन आदि के कारण भाषा में प्रवेश करते हैं तो वे मात्र शब्द नहीं रह जाते। वे किसी विशिष्ट सोच अथवा व्यवहार को साथ लेकर प्रविष्ट होते हैं। वे अपनी प्राणवत्ता से जनजीवन और संस्कृति को आंदोलित करते हुए उसके अंग बन जाते हैं। परिवर्तित होती हुई भाषा कभी लोक - संस्कृति को प्रभावित करती है तो कभी लोक - संस्कृति भाषा में परिवर्तन लाती है, और कभी - कभी बाहरी हरचलों से दोनों एक साथ प्रभावित होती है। बाहरी हलचलों से मेरा आशय अन्य क्षेत्रीय संस्कृति और भाषा ही नहीं अपितु राष्ट्रीय स्तर पर चल रही सामाजिक - राजनैतिक - आर्थिक और सांस्कृतिक परिवर्तन की गतिविधियों तथा गाँवों के निकट के नगरों की हलचलों से भी है। नगर सांस्कृतिक केन्द्रों के रुप में कार्य करते हैं अत: नगरों के विश्वास, उत्सव, शिष्टाचार, कथा, गीत आदि अनेक पार्श्ववर्ती ग्राम - समुदायों में प्रसार पाते हैं और सामान्य संस्कृति के अंग बनते रहे हैं। प्रचार प्रसार का माध्यम भाषा ही है। अत: लोक जीन की भाषा उन हलचलों को सर्वप्रथम ग्रहण करती है, फिर लोक संस्कृति को देती है। लोक संस्कृति का अपना एक विशिष्ट ढांचा होता है। वह अपने ढाँचे के मुताबिक आत्मसात करती है। इस यात्रा में नगरीय छाप वाली चीजें भी लोकजीवन से अभिन्न प्रतीत होती है।
1.  मानव और संस्कृति : युलियन ब्रोमलेव
2. नोनी बेदंरी : रामेश्वर वैष्णव
3. चंदा, अकास मं : बृजलाल प्रसाद शुक्ल
4. सुरूज नई मरै : नारायण लाल परमार
5. लोक साहित्य और संस्कृति : डॉ दिनेश्वर प्रसाद
  • पता ' गीतिका' दाउ चौरा, खैरागढ़, जिला - राजनांदगांव (छ.ग.) 

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