इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

गुरुवार, 11 जुलाई 2013

जितेन्द्र ' सुकुमार ' की दो ग़ज़लें



( एक )

गाँव हुआ न मेरा शहर हुआ
क्‍यूं हर शय बेखबर हुआ
महफिल हो न सकी हमारी
अपना तो बस ये दोपहर हुआ
मुसाफिर की तरह चल रहें
चलना इधर - उधर हुआ
आफ़ताबे तब्जूम कैसे करे
खामोश हर सफर हुआ
मंजिल की तलाश रही पर
न बसेरा, न कोई घर हुआ
भीड़ ही दिखायी देती रही मुझे
तन्हा यहॉ हर शहर हुआ

( दो )

सोचने के लिए इक रात काफी है
जीने, चंद शाद - ए - हयात काफी है
यारो उनके दीदार के लिए देखना
बस इक छोटी सी मुलाकात काफी है
उनकी उलझन की शक्‍ल क्या है
कहने के लिए जज्‍ब़ात काफी है
बदलते इंसान की नियति में
यहॉ छोटा सा हालात काफी है
न दिखाओं आसमां अपना दिल
तुम्हारे अश्कों की बरसात काफी है
खुद को छुपाने के लिए ' सुकुमार '
चश्म की कायनात काफी है
  • ' उदय आशियाना ' चौबेबांधा राजिम जिला- गरियाबंद, (छग.) - 493 885 

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