इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

हमने उसके शहर में

-  जितेन्द्र ' सुकुमार ' -
हमने उसके शहर में मकान खरीदे हैं।
बेजुबान होकर भी जुबान खरीदे हैं।
जिंदगी जैसे है वैसे दिखती नहीं बाबू ,
नाम वाले होकर भी पहचान खरीदे हैं।
मेरी क़ीमत आखिर तुम क्या लगावोगे,
हमने बाज़ार में सड़ रही ईमान खरीदे है।
हमारी बुलंदी देख ऐसा नहीं लगता क्या,
हम ज़मीं पर रहकर आसमान खरीदे हैं।
यहाँ कुछ भी मुफ्त में नहीं मिलता हुजूर,
रिश्वत में नारियल देकर भगवान खरीदे है।
  • पता - चौबेबांधा राजिम, जिला - रायपुर (छग.)

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