इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शनिवार, 13 जुलाई 2013

शांति मार्ग


-  विष्णु नागर  -
धोबी का कुत्ता घर का, न घाट का। इस मुहावरे पर बहस हो रही थी। एक ने कहा -धोबी के कुत्ते की नियति पर हँसने वाले हम कौन?
दूसरे ने कहा- हाँ, हम कौन? हम भी तो कुत्ते - से हैं।
तीसरे ने कहा - कुत्ते -से मत कहो। कुत्ते हैं, कुत्ते। और धोबी के ही हैं। इस पर सब हँस पड़े और अपने - अपने घर चले गए और उस रात सब मजे से सो गए। अगले दिन फिर मिले। एक ने दूसरे को छेड़ दिया - और कुत्ते, मेरा मतलब धोबी के कुत्ते। इतना कहना था कि वह उस पर लात - घूंसों से पिल पड़ा। उसे मार - मार कर अधमरा कर दिया। हालांकि वह उनका मित्र था।
और हुआ यह कि सबने एक - दूसरे से मिलना बंद कर दिया। सबने माना कि सुख शांति से रहने का यही एकमात्र उपाय है।

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