इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

शनिवार, 13 जुलाई 2013

शांति मार्ग


-  विष्णु नागर  -
धोबी का कुत्ता घर का, न घाट का। इस मुहावरे पर बहस हो रही थी। एक ने कहा -धोबी के कुत्ते की नियति पर हँसने वाले हम कौन?
दूसरे ने कहा- हाँ, हम कौन? हम भी तो कुत्ते - से हैं।
तीसरे ने कहा - कुत्ते -से मत कहो। कुत्ते हैं, कुत्ते। और धोबी के ही हैं। इस पर सब हँस पड़े और अपने - अपने घर चले गए और उस रात सब मजे से सो गए। अगले दिन फिर मिले। एक ने दूसरे को छेड़ दिया - और कुत्ते, मेरा मतलब धोबी के कुत्ते। इतना कहना था कि वह उस पर लात - घूंसों से पिल पड़ा। उसे मार - मार कर अधमरा कर दिया। हालांकि वह उनका मित्र था।
और हुआ यह कि सबने एक - दूसरे से मिलना बंद कर दिया। सबने माना कि सुख शांति से रहने का यही एकमात्र उपाय है।

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