इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

शनिवार, 13 जुलाई 2013

शांति मार्ग


-  विष्णु नागर  -
धोबी का कुत्ता घर का, न घाट का। इस मुहावरे पर बहस हो रही थी। एक ने कहा -धोबी के कुत्ते की नियति पर हँसने वाले हम कौन?
दूसरे ने कहा- हाँ, हम कौन? हम भी तो कुत्ते - से हैं।
तीसरे ने कहा - कुत्ते -से मत कहो। कुत्ते हैं, कुत्ते। और धोबी के ही हैं। इस पर सब हँस पड़े और अपने - अपने घर चले गए और उस रात सब मजे से सो गए। अगले दिन फिर मिले। एक ने दूसरे को छेड़ दिया - और कुत्ते, मेरा मतलब धोबी के कुत्ते। इतना कहना था कि वह उस पर लात - घूंसों से पिल पड़ा। उसे मार - मार कर अधमरा कर दिया। हालांकि वह उनका मित्र था।
और हुआ यह कि सबने एक - दूसरे से मिलना बंद कर दिया। सबने माना कि सुख शांति से रहने का यही एकमात्र उपाय है।

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