इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

भील बच्चा



- डॉ. रामशंकर चंचल -
वह नंगा
अधनंगा
नन्हें पैरो से दौड़ता
चढ़ जाता
मिट्टी के टीलों पर
मैं उसके पीछे
घने जंगलों से
भयभीत / हाँफता
थका सा
वह
मुझे देखता / मुस्काता
कभी मेरे किसी सवाल पर
हूं , हाँ , करता
देखने लग जाता
अजीब जिज्ञासा से,
वह
भोला / सहृदय
अज्ञान
चलता
बेधड़कर / निडर
निर्भीक
जैसे सारे जंगल का
गाँव का
वह
मालिक हो।
पता - मां, 145, गोपाल कालोनी, झाबुआ (म.प्र.)  457661

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