इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

भील बच्चा



- डॉ. रामशंकर चंचल -
वह नंगा
अधनंगा
नन्हें पैरो से दौड़ता
चढ़ जाता
मिट्टी के टीलों पर
मैं उसके पीछे
घने जंगलों से
भयभीत / हाँफता
थका सा
वह
मुझे देखता / मुस्काता
कभी मेरे किसी सवाल पर
हूं , हाँ , करता
देखने लग जाता
अजीब जिज्ञासा से,
वह
भोला / सहृदय
अज्ञान
चलता
बेधड़कर / निडर
निर्भीक
जैसे सारे जंगल का
गाँव का
वह
मालिक हो।
पता - मां, 145, गोपाल कालोनी, झाबुआ (म.प्र.)  457661

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