इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

भील बच्चा



- डॉ. रामशंकर चंचल -
वह नंगा
अधनंगा
नन्हें पैरो से दौड़ता
चढ़ जाता
मिट्टी के टीलों पर
मैं उसके पीछे
घने जंगलों से
भयभीत / हाँफता
थका सा
वह
मुझे देखता / मुस्काता
कभी मेरे किसी सवाल पर
हूं , हाँ , करता
देखने लग जाता
अजीब जिज्ञासा से,
वह
भोला / सहृदय
अज्ञान
चलता
बेधड़कर / निडर
निर्भीक
जैसे सारे जंगल का
गाँव का
वह
मालिक हो।
पता - मां, 145, गोपाल कालोनी, झाबुआ (म.प्र.)  457661

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें