इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

रविवार, 14 जुलाई 2013

यूरोपीय काव्यदृष्टि की सरल व्याख्‍या - पाश्चात्य काव्य - दर्शन

 समीक्षक - डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी
भारतीय काव्यशास्त्र की चिंताधारा में काव्यगत रस और उसके साधारणीकरण से जुड़ी समस्याएं संकेन्द्रित रही है, जबकि पाश्चात्य काव्यचिंतको ने अधिकतर काव्य के स्वरुप पर चर्चा की है। डाँ. शंकर मुनि राय की नई पुस्तक पाश्चात्य काव्यदर्शन में पश्चिम के सभी प्रमुख काव्यचिंतकों की विचारधारा में मौजूद इसी समस्या पर विवेचन उपलब्ध है। कि कविता क्या है? अथवा कैसी होनी चाहिए। अपनी विवेचना के लिए लेखक ने पाश्चात्य काव्यशास्त्र पर हिन्दी में प्रकाशित लगभग सारी सामाग्री का अनुशीलन किया है और मूल अंग्रेजी पुस्तकों  की सहायता भी ली है। तभी उनके विश्लेषणों में प्लेटो, अरस्तू, लॉजाइनस, हॉरेस,ड्रायडन, कॉलरिज, जॉनसन, वर्डसवर्थ, मैथ्यू ऑरनॉल्ड, इलियट और रिचर्डस की काव्य मान्यताएं बहुत ही पारदर्शी तौर पर छन कर सामने आई है। ऊपरी तौर पर पाश्चात्य काव्य दर्शन विद्यार्थियों के हितार्थ तैयार कृति नजर आती है, लेकिन वास्तव में डॉ. शंकर मुनि राय का निहितार्थ यूरोपीय काव्यचिंतन का समेकित विश्लेषण रहा है।
पुस्तक का नाम पाश्चात्य काव्य चिंतन होना चाहिए था। इसे पाश्चात्य काव्य दर्शन कहने से एक ओर दार्शनिकता की गंध आती है और दूसरी ओर यूरोपीय काव्यशास्त्रियों के गैरदार्शनिक आचरण का निषेध होता है। छोटे - छोटे उपशीर्षकों, अनुच्छेदों में विभक्त सामग्री को डॉ. शंकर मुनि राय बहुत ही सहजतापूर्वक सहझाया है। इससे पाश्चात्य काव्य शास्त्र के प्रमुख हस्ताक्षरों की काव्यधारणा पूरी तरह उजागर हुई है। अपनी ओर से कोई निष्कर्षात्मक टिप्पणी देने से लेखक ने अधिकतर परहेज किया है,लेकिन सभी यूरोपीय काव्यचिंतकों के व्यक्तित्व और अवदान की संक्षिप्त झांकी अवश्य दी है। अपनी संक्षिप्त भूमिका में उन्होंने यूनान के पिंडार, गार्गियस, अरिस्तोफेनिस की चर्चा हिन्दी पाठकों के लिए एक नई जानकारी के तौर पर की है। यही देमेत्रियस का उल्लेख भी होना चाहिए था। पाश्चात्य काव्य दर्शन अपनी सीमा में पश्चिमी काव्यचिंतन का स्पष्ट और बेबाक भाषा में किया गया विवेचन है। इस संक्षिप्त प्रस्तुति के लिए डॉ. शंकर मुनि राय बधाई के पात्र है।
पता - पूर्व प्राध्यापक, हिन्दी विभाग, रांची विश्वविद्यालय,रांची
आवास:6 - शिवम, हरिहरसिंह रोड, मोराबादी, रांची- 834008
फोन :0651 - 2542989

छत्तीसगढ़ी संस्कृति की गलत जानकारी अक्षम्य

- समीक्षक - कुबेर -

अध्यात्मिकता से प्रारंभ होकर, समकालीनता का निर्वहन करते हुए श्रृँगार को अंज़ाम देने वाले मुकुंद कौशल की ग़ज़ल संग्रह  ' मोर ग़ज़ल के उड़त परेवा ' की छत्तीसगढ़ी ग़ज़लों को पढ़कर मन में सुखद अनुभूति होती है।
काया के का गरब करत हस,जब तक चले चला ले,
एक्केदारी घुर जाही,ये काया हवै बतासा।
(ग़ज़ल क्र. - 1, पृ. 10)
धरे कांसड़ा ऊपर बइठे, तेकर ग़म ल का पाबे,
जिनगी के गाड़ा ल वो हर, कोन दिसा मा मोड़ दिही।
(ग़ज़ल क्र. - 5, पृ. 13)
ये गरीब के कुरिया संगी, वो दाऊ के बाड़ा है।
ये मन सूतै लांघन वोती,चाँऊर गाड़ा-गाड़ा हे।
इन्कर अँधियारी कुरिया के चिमनी घलो बुता जाथे,
उन पोगराए हें अँजोर ल, ये कइसन गुन्ताड़ा हे।
(ग़ज़ल क्र. - 21, पृ. 29)
बादर अइसन छाए लगिस। सुरता उन्कर आए लगिस।
मन झूमे-नाचे कौशल, माँदर कोन बजाए लगिस।
(ग़ज़ल क्र. - 48, पृ. 56)
यह सुखद अनुभूति उसी तरह की होती है, जैसे दुश्यंत कुमार की ' साये में धूप' को पढ़कर होती है; अत: यहाँ पर ' साये में धूप' की संक्षिप्त चर्चा जरूरी है।
गजल की ताकत और नफासत के विषय में कुछ कहने की जरूरत नहीं है। परंतु इतना तो तय लगता है, और यहाँ ऐसा लगने में कोई अतिशयोक्ति भी नहीं होगी, कि इसे यह ताकत और नफासत उर्दू से मिलती है। उर्दू के अतिरिक्त दिगर भाषा से इसे ऐसी ताकत और नफासत मिलना मुश्किल है। यही वजह है कि ग़ज़ल ने जो ख्याति उर्दू में अर्जित किया है, अन्य भाषाओं में नहीं। इस कथन के विरोध में आप बेशक ' साये में धूप ' को सामने ला सकते हैं, परंतु ऐसा करने से पहले ' साये में धूप' को पुन: पढ़कर देख लीजिये। और नहीं तो इसकी सबसे बेहतरीन और सर्वाधिक मक़बूल ग़ज़लों और शेरों को पढ़कर देख लीजिये। जैसे -
आज यह दीवार परदे की तरह हिलने लगी,
शर्त मगर यह थी कि बुनियाद हिलनी चाहिये।
सिर्फ  हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं था,
मेरी कोशिश थी कि सूरत बदलनी चाहिये।
यहाँ दीवार, बुनियाद, मक़सद, और सूरत की जगह भित्ति, नींव, उद्देश्य और परिस्थिति जैसे शब्द रखकर देख लीजिये। हंगामा के बदले में तो कोई दूसरा शब्द सोचा भी नहीं जा सकता।
Óसाये में धूपÓ को चाहें हम हिन्दी की गजल मानते रहें हैं, पर इसकी लोकप्रियता में हिन्दी का कोई बड़ा योगदान नहीं दिखता। इसकी लोकप्रियता इसकी विषयवस्तु और दुश्यन्त कुमार की शिल्पगत कुशलता में निहित है। आम आदमी अपने हक की जिन बातों को, या अपने मन के जिन आक्रोशों को व्यक्त नहीं कर पाता है,उन्हीं सारी बातों को शायर ने अपनी ग़ज़ल का विषय बनाया है। ज़ाहिर है, संग्रह को पढ़ते वक्त आम पाठक स्वयं को, स्वयं के आक्रोश को, अभिव्यक्त करता हुआ महसूस करता है। इस संग्रह की ग़ज़लों में कही गई बातें उन्हें अपनी ही बातें प्रतीत होती हैं। इस तरह दुश्यन्त कुमार ने ' साये में धूप' के माध्यम से जनता की आवाज को ही बुलंद किया है और यही बात इस संग्रह की लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण है।
विषयवस्तु के स्तर पर यही बात मुकुंद कौशल की छत्तीसगढ़ी में लिखी ' मोर ग़ज़ल के उड़त परेवा' की ग़ज़लों पर भी लागू होती है। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद, इसके लिये, और यहाँ की सवा दो करोड़ जनता के लिये,' अमीर धरती के गरीब लोग' उक्ति प्रचलित हुई।  इस उक्ति ने छत्तीसगढ़ का किसी तरह भला किया होगा, इसमें संदेह है। छत्तीसगढ़ राज्य की परिकल्पना एक आदिवासी राज्य के रूप में की गई थी। यहाँ आदिवासियों और पिछड़ों की संख्या लगभग बराबर है।  अनुसूचित जातियों की भी बड़ी संख्या यहाँ निवास करती है। जाहिर है, शुरू से ही यहाँ की जनता आर्थिक, शैक्षिक और धार्मिक शोषण का शिकार होती रही है। आजादी के बाद भी यही सूरत बनी रही। पृथक छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद कुछ उम्मादें जगी थी, परन्तु गैर छत्तीसगढ़ियों के द्वारा आज इस अमीर धरती के अमूल्य प्राकृतिक संसाधनों, जिन्हें यहाँ के लोग बड़े जतन से सहेजकर रखे हुए थे, को लूटने की होड़ मची हुई है। इन्हीं विषयों को, इन्हीं सारी बातों को, मुकुंद कौशल ने बड़ी खूबी और धारदार तरीके से अपनी ग़ज़लों का विषय बनाया है। कुछ उदाहरण प्रस्तुत है -
राज बनिस ते राज करे बर, बाहिर ले मनखे आवत हें,
हम मर-मरके चूल्हा फूँकेन, चुरे-पके म सगा हबर गे।
साहेब, बाबू, नेता जुरमिल, नाली-पुलिया तक खा डारिन,
गरूवा मन बर काहीं नइये, मनखें सब्बो चारा चरगें।
(ग़ज़ल क्र. - 18, पृ. 26)
भुँइया महतारी के जेमन, खुद ला समझिन मालिक,
आज उही मन हो गे हावैं, अपने घर मा दासा।
का गोठियावौं कौसल मैं हर, भुँइया के दुख पीरा,
भूख मरत हे खेती अउ, तरिया मरे पियासा।
(ग़ज़ल क्र. - 2, पृ. 10)
बने फायदा हावै संगी, राजनीति बैपार मा।
इही पाय के सबो झपाथें, ये पूरा के धार मा।।
ये कइसन सरकार हवै, का अइसन ल सरकार कथैं?
हमरे बिजली बेच के हमला, राखत हें अँधियार मा। 
(ग़ज़ल क्र. - 4, पृ. 12)
यहाँ कहना न होगा कि राजनीति की बाढ़ में झपाने वाले लोग कौन हैं और कहाँ के हैं। बिजली निश्चित ही यहाँ के प्राकृतिक संसाधनों और समृद्धि का प्रतीक है।
छत्तीसगढ़ बनने के बाद छत्तीसगढ़ियों का सपना किस कदर चूर-चूर हुआ है, यह शेर उसी की बानगी प्रस्तुत करता है, -
सुने रेहे हन छत्तीसगढ़ म, सूरूज नवा अवइया है,
खोजौ वो सपना के सूरूज, कोन दिसा म अटक गइस।
(ग़ज़ल क्र. - 20, पृ. 28)
पूरी तरह छत्तीसगढ़ी में लिखी गई मुकुंद कौशल के इस ग़ज़ल संग्रह ने छत्तीसगढ़ी भाषा के सामर्थ्य को भी स्थापित किया है। संप्रेषणीयता की ताकत और नफासत के मामले में मुकुंद कौशल की ये छत्तीसगढ़ी ग़ज़लें उर्दू गजलों से किसी भी माने में कम नहीं है। इस मामले में छत्तीसगढ़ी भाषा हिन्दी से बीस ही साबित हुई हैं। हाना छत्तीसगढ़ी भाषा की जान है। संग्रहीत ग़ज़लों में न सिर्फ  हाना का स्वभाविक प्रयोग हुआ है, जिससे इनकी सम्प्रेषणीयता बढ़ी हैं, अपितु शायर ने ऐसे नये-नये प्रतीकों और उपमानों का प्रयोग किया है, जिससे पाठक चमत्कृत हुए बिना नहीं रहता।
चिमटत हावै जूड़ हवा, अगहन बइठे पाँव पसार।
संझा बेरा सूरूज ल, खांद म बोहे चलिन कहार।
(ग़ज़ल क्र. - 47, पृ. 55)
जब देखौ तब गावत रहिथे, पुरवाही त हवै भजनही।
डहर रेंगइया संसो झनकर, पाँव रहत ले सौ ठन पनही।
(ग़ज़ल क्र. - 37, पृ. 45)
इसमें कोई संदेह नहीं है कि -
कौसल के संदेश लिखाए, मया-दया के पाती ल,
मोर ग़ज़ल के उड़त परेवा, गाँव-गली अमरावत हे।
(ग़ज़ल क्र. - 42, पृ. 50)
लेकिन लगता है कि शायर को छत्तीसगढ़ी संस्कृति का पूर्ण ज्ञान नहीं है। अपने पहले ग़ज़ल संग्रह में उन्होंने बैल को सोहई पहनाया था -
पीरा कांछन चघे, साँट लेवय जिनगी के मातर मां,
सुख संग दुख के बइला ल, तैं घलो सुहई पहिराए कर।
(छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल, द्वितीय संस्करण, पृ. 29)
इसी तरह की अक्षम्य गलतियाँ मोर ग़ज़ल के उड़त परेवा में भी हुई हैं।
आँखीं फारे सबके आगू जे हर जादा अँइठे ते,
एक चरू दारू ला पीके, घेरी-बेरी गोड़ धरै।
(ग़ज़ल क्र. - 8, पृ. 16)
यहाँ चरू में दारू पीने की न तो परंपरा है और न ही चरू का उपयोग किसी पैमाने के लिये ही किया जाता है। इसका उपयोग मांगलिक कार्यों में किया जाता है।
जुच्छा चूरी होगे जब ले, एक बनिहारिन मोटियारी,
(ग़ज़ल क्र. - 9, पृ. 17)
यहाँ जुच्छा चूरी कहने की परंपरा नहीं है, अपितु जुच्छा हाथ, या खाली हाथ ही कहा जाता है।
कांड़ बंधाये डोरी धर के ढेंकी म उत्ता-धुर्रा,
ओरम-ओरम के अपन धान ल छरिन तहाँ ले भगवान।
(ग़ज़ल क्र. - 3, पृ. 11)
ढेंकी में धान कूटने वाले कार्य कुशलता और सहारे के लिये डोरी को मयार में बाँधते हैं, कांड़ में नहीं। इसी तरह धान को कूटा जाता है, छरा नही जाता। छरना क्रिया चाँवल, मेरखू या दाल के लिये किया जाता है। छरने का मतलब होता है,पालिस करना।
खरही ल राखे रहिथे रखवार असन,
ब्यारा के रूँधना ला राचर कहिथें।
(ग़ज़ल क्र. - 8, पृ. 16)
रूँधना और राचर, दोनों ही अलग-अलग चीजें है। रूँधना को कहीं भी राचर नहीं कहा जाता।
शायर से ये गलतियाँ चाहे अनजाने में हुई हों, पर भविष्य में ये गलतियाँ छत्तीसगढ़ की संस्कृति की गलत जानकारियाँ प्रस्तुत करेंगी। इस तरह की गलत जानकारी देने के लिये किसी भी लेखक या कवि को कभी माफ  नहीं किया जाना चाहिये।
  • पता - व्‍याचख्‍यता, शास.उच्‍च.माध्‍य. शाला कन्‍हारपुरी जिला - राजनांदगांव (छग)

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