इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

मंगलवार, 10 सितंबर 2013

हाथों के

- ओम रायजादा -
हाथों के फूटेंगे छाल एक दिन।
जायेंगे कुछ सिर उछाले एक दिन।।

हौलसे जुगनुओं के देखिये।
लड़के लायेंगे उजाले एक दिन।।

जुल्म खुद ही खुद दफन हो जायेगा।
हाथों के पत्थर उठाले एक दिन।।

मुल्क से तब जायेगी ये गरीबी।
होगा श्रृमिकों के हवाले एक दिन।।

तब होगी हर तरफ खुशहालियां।
पेट भर खायें निवाले एक दिन।।
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हमकों सब मंजूर है अब।
मंजिल बहुत दूर है अब।।
चाहें जितना जुल्म करे ।
उनका नहीं कसूर है अब।।
भ्रष्टाचार जहाँ तक है।
पाला ये नासूर है अब।।
जब से सिंहासन पाया।
रहबर मद से चूर है अब।।
बेईमानों से लड़ने को।
ये किसान मजबूर है अब।।
सावरकर वार्ड
कटनी [म. प्र .]

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