इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

मंगलवार, 10 सितंबर 2013

ब्रम्‍ह्रम भोज

- शोभा रस्तोगी ' शोभा' -
आज शुक्ला जी के घर ब्रह्मभोज था ।  मृत्यु  उपरांत किया जाने वाला भोज  ।  दो साल से शुक्लाजी अकेले रह रहे थे  । आर्थराइटिस व डाईबीटीस से पीड़ित  ।  तीनों बेटों को फुर्सत नहीं थी आकर हाल भी पूछने की ।  मृत्यु की सूचना पाते ही तीनों ने आकर दाहकर्म किया  ।  तेरह  दिन रूक कर इस विशाल मकान को प्रोपर्टी डीलर के हाथों बेच दिया  ।  लाखों हाथ आये  ।  तीन हिस्से बँट गए  ।  उसी में से थोडा ब्रह्मभोज में लगा दिया ।  पंडित व बिरादरी के लोग तारीफ  कर रहे थे   वाह ! क्या ब्रह्मभोज था ! दिल खोल कर पिता की आत्मा को तृप्त किया है ।
वाकई  ब्रह्मभोज बहुत बढ़िया था।
पता - आर जेड,208 बी,डीडीए पार्क रोड, राजनगर 2, पालम कालोनी
नई दिल्ली

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