इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

गुरुवार, 12 सितंबर 2013

सपने सारे टूट गये

डां. नथमल झँवर
सपने सारे टूट गये, मैं खड़ा अकेला राहों में
    उदीप्त उमँगे पाने की
    ला दी थी मुझे किनारे पर
    आशाओं के था पुल बाँधे
    केवल एक सहारे पर
    मैंने पाया था उनमें ही
    सारे जीवन का नवजीवन
    शायद यह देन प्रकृति की थी
    या पागल था अपना यौवन
    पाया था मैंने जग सारा
    केवल उनकी बाहों में
सपने सारे टूट गये, मैं खड़ा अकेला राहों में।
    वह पूनम हुई अमावस्या
    रजनी ओढ़ी काली चादर
    पावस बूंदें भी सुलग रही
    नैना बरसे जैसे बादर
    साँसों का हर कंपन्न कहता
    यूं कब तक तुम तड़फाओगी
    मेरी दुनिया तो उजड़ चुकी
    क्या तनिक न वापस आओगी
    अब बचा है क्या बाकी कह दो
    इन सिसकी भरती आहों में
सपने सारे टूट गये, मैं खड़ा अकेला राहों में।
    मेरी अतृप्त निगाहों को
    बस एक झलक ही मिल जाये
    मैं फिर से देखूँ जी भरकर
    बस एक पलक ही मिल जाये
    ये नयन - नयन से कह देंगी
    वह अनबोली दिल की भाषा
    मेरे प्रियतम ना तड़फाओ
    पूरी कर दो अब अभिलाषा
    पर सब मृगतृष्णा की नाई
    लगते हैं मुझे निगाहों में
सपने सारे टूट गये, मैं खड़ा अकेला राहों में।
झँवर निवास, मेन रोड सिमगा
जिला - रायपुर

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें