इस अंक में :

मनोज मोक्षेन्‍द्र का आलेख '' सार्थक व्यंग्य के आवश्यक है व्यंग्यात्मक कटाक्षों की सर्वत्रता '', डॉ. माणिक विश्‍वकर्मा '' नवरंग '' का शोध लेख '' हिन्दी गज़ल का इतिहास एवं छंद विधान: हिन्दी की'',रविन्‍द्र नाथ टैगोर की कहानी '' सीमांत '', मनोहर श्‍याम जोशी की कहानी '' उसका बिस्‍तर '', कहानी ( अनुवाद उडि़या से हिन्दी)'' अनसुलझी''मूल लेखिका:सरोजनी साहू अनुवाद:दिनेश कुमार शास्त्री, छत्तीसगढ़ी कहिनी'' फोंक - फोंक ल काटे म नई बने बात'' लेखक:ललित साहू' जख्मी', बाल कहानी '' अनोखी तरकीब''''मेंढक और गिलहरी'' रचनाकार पराग ज्ञान देव चौधरी,सुशील यादव का व्यंग्य '' मन रे तू काहे न धीर धरे'', त्रिभुवन पांडेय का व्‍यंग्‍य ''ललित निबंध होली पर'',गीत- गजल- कविता: रचनाकार :खुर्शीद अनवर' खुर्शीद',श्याम'अंकुर',महेश कटारे'सुगम',जितेन्द्र'सुकुमार',विवेक चतुर्वेदी,सुशील यादव, संत कवि पवन दीवान,रोज़लीन,डॉ. जीवन यदु, टीकेश्वर सिन्हा'गब्दीवाला, बृजभूषण चतुर्वेदी 'बृजेश', पुस्तक समीक्षा:'' इतिहास बोध से वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार'' समीक्षा : एम. एम. चन्द्रा'', ''मौन मंथन: एक समीक्षा''समीक्षा''मंगत रवीन्द्र,''जल की धारा बहती रहे''समीक्षा : डॉ. अखिलेश कुमार'शंखधर'

बुधवार, 11 सितंबर 2013

छत्तीसगढ़ी राजभाषा और एकरूपता ?


आखिरकार छत्तीसगढ़ी को संविधान के अनुच्छेद 345 के तहत अध्यादेश लाकर राजभाषा का दर्जा देने की प्रक्रिया शुरू हो ही गई। छत्तीसगढ़ी को राजभाषा बनाने से जो  खुशी छत्तीसगढी के जानकारों को हुई उतनी ही पीड़ा उन्हें हुई जो यह कभी नहीं चाहते थे कि छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा मिले। अब आवश्यकता है छत्तीसगढ़ी को समृद्धिशाली बनाने का। इसके लिए छत्तीसगढ़ी रचनाकारों को छत्तीसगढ़ी में साहित्य लिखने के अतिरिक्त उद्योग, व्यवसाय, विज्ञान पर भी छत्तीसगढ़ी में सृजन आवश्यक है। यह भी आवश्यक है कि समाचार पत्रों, फिल्मों में भी छत्तीसगढ़ी शब्दों का अधिकाधिक मात्रा में प्रयोग किया जाये। बेहतर तो यही होगा कि आकाशवाणी केन्द्रों द्वारा छत्तीसगढ़ी पर ही विविध कार्यक्रम रखा जाये जिससे आम जन तक छत्तीसगढ़ी सही मायने में पहुंच सके। इसके लिए दूरदर्शन केन्द्र को भी ध्यान देने होगें इसके अतिरिक्त प्राथमिक शिक्षा से ही छत्तीसगढ़ी को पाठï्यक्रम में शामिल किया जाये।
छत्तीसगढ़ी के मानकीकरण को लेकर भी अनेक बातें सामने आने लगी है। पूर्व में छत्तीसगढ़ी का प्रयोग बोली के रूप में किया जाता था इसी का परिणाम था कि जो जिस क्षेत्र का रचनाकार था वह अपने क्षेत्र के आमबोल चाल का उपयोग साहित्य मे करता था  जिससे छत्तीसगढ़ी में एकरूपता नहीं आ सकी मगर अब जबकि छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा देने की प्रक्रिया शुरू हो ही गई है तो छत्तीसगढ़ी में एकरूपता लाना आवश्यक है क्योंकि अलग अलग जिलों में अलग - अलग छत्तीसगढ़ी वाक्यों, शब्दों का प्रयोग किया जाता है। अब मानकीकरण करके एकरूपता लाने से ही छत्तीसगढ़ी का विकास संभव है। तथा इसी से ही छत्तीसगढ़ी को 8 वीं अनुसूची में शामिल कर पूर्ण रूप से राजभाषा का दर्जा दे पाना संभव है।इस हेतु विभिन्न जिले के छत्तीसगढ़ी  जानकारों, साहित्यकारों, विद्वानों, को एक मंच पर लाना होगा और उनके द्वारा ही निर्धारण करना होगा।
राजकाज की भाषा बनने के लिए एकरूपता आवश्यक है। छत्तीसगढ़ी के अनेक रूप है। छत्तीसगढ़ के अन्य - अन्य क्षेत्रों में अलग - अलग प्रकार के छत्तीसगढ़ी का प्रयोग किया जाता है। मगर अब छत्तीसगढ़ी को प्रशासनिक, तकनीकी, वाणिज्य, बैंकिंग, कृषि, कानून कोर्ट, कचहरी, आदि आदि क्षेत्रों में प्रयोग में लाना है। इसके लिए जल्द से जल्द मानककोष बनाने की जरूरत है ताकि पूरे छत्तीसगढ़ में एक ही प्रकार के छत्तीसगढ़ी को इन स्थानों में प्रयोग में लाया सके।
बहरहाल,संविधान के अनुच्छेद 345 के तहत छत्तीसगढ़ी को अध्यादेश लाकर राजभाषा का दर्जा देने की प्रक्रिया सरकार द्वारा की गई वह छत्तीसगढ़ के लिए गौरव की बात है तथा सरकार बधाई के पात्र है ......।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें