इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

रविवार, 15 सितंबर 2013

सारे बेदर्द ख़यालात : चांदनी पांडे

चांदनी पांडे
सारे बेदर्द ख़यालात रुके नहीं कब से।
सूने - सूने से ये हालात रुके नहीं कब से।

ये समंदर भी मेरी प्यास से कमतर निकला,
तिश्नगी के मेरे ज़ज्बात रुके हैं कब से।

आशियाने को बचाने में कसर क्या छोड़ी?
दिल के कोने में सवालत रुके हैं कब से।

यक - ब - यक तुमसे मुलाक़ात के दिलकश लम्हें,
बाद उसके सभी लम्हात रुकें हैं कब से।

चांदनी से है मिरासिम में अंधेरी रात,
और उजालों के ये सौगात रुके हैं कब से।
पता :
13 सी 3, चंद्रा नगर, जगईपुरा,
राजेन्द्र आटा चक्की के पास लाल बंगला , कानपुर  (उ.प्र.)  208007,
मोबाईल : 08896758559

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