इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

मंगलवार, 10 सितंबर 2013

एक पर्व अंगारों का

आचार्य सरोज द्विवेदी
मेरे देश में आता है, एक पर्व अंगारों का,
हर द्वार चमकने लगता है,
यह राजा है त्यौहारों का।
दीपक स्वयं धधकती ज्वाला
दीवाली उनकी कतार
मानव से दिल वालों को
मेरे देश में यह उपहार
बच्चे इस दिन खेल खेलते,
सूरज चाँद सितारों का।
दीप मार लेता है बाजी
अमावस की काली रात से
कोयला हीरा बन जाता है
किरणों की बरसात से
यह प्रकाश की पूजा है,
बलि है यह अंधियारों का।
कुटियों से लेकर महलों तक
इस रात चमकने लगते हैं
राजा रंक  सभी इस दिन
नाना कुबेर के लगते हैं
लक्ष्मी स्वयं नाचती छमछम,
और ढेर कलदारों का।
मेरे देश में आता है, एक पर्व अंगारों का॥

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