इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

मंगलवार, 10 सितंबर 2013

एक पर्व अंगारों का

आचार्य सरोज द्विवेदी
मेरे देश में आता है, एक पर्व अंगारों का,
हर द्वार चमकने लगता है,
यह राजा है त्यौहारों का।
दीपक स्वयं धधकती ज्वाला
दीवाली उनकी कतार
मानव से दिल वालों को
मेरे देश में यह उपहार
बच्चे इस दिन खेल खेलते,
सूरज चाँद सितारों का।
दीप मार लेता है बाजी
अमावस की काली रात से
कोयला हीरा बन जाता है
किरणों की बरसात से
यह प्रकाश की पूजा है,
बलि है यह अंधियारों का।
कुटियों से लेकर महलों तक
इस रात चमकने लगते हैं
राजा रंक  सभी इस दिन
नाना कुबेर के लगते हैं
लक्ष्मी स्वयं नाचती छमछम,
और ढेर कलदारों का।
मेरे देश में आता है, एक पर्व अंगारों का॥

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें