इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

रविवार, 15 सितंबर 2013

तुम या मैं

    शिखा वाष्णेय
मैं थी ही क्या तुम्हारे लिए
        एक चलती फिरती प्रतिमा
            या एक यंत्र भर
                जरूरतों की पूर्ति का
    जिसका अपना तो कुछ था ही नहीं
        ख़ुशी भी थी तुम्हारी हंसी में
            गमगीन भी थी तुम्हारी नमी में
                    पर तुम...
    तुम हमेशा रहे
        मेरे लिए सब कुछ
            मेरा दिल,जान, नींद,सपने
                मेरी सहर,धूप,छाँव,नगमें
    अब मेरी कविताओं में तुम
        कभी कभी मुस्कुरा भी देते हो तो
            यूँ लगता है जैसे
                तुम्हारे दिल ने मेरे वजूद को छुआ है।
पता : द्वारा - शिल वाष्णेय
3/214, विद्या नगर कालोनी
अलीगपताढ़ (उ . प्र . )

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