इस अंक में :

मनोज मोक्षेन्‍द्र का आलेख '' सार्थक व्यंग्य के आवश्यक है व्यंग्यात्मक कटाक्षों की सर्वत्रता '', डॉ. माणिक विश्‍वकर्मा '' नवरंग '' का शोध लेख '' हिन्दी गज़ल का इतिहास एवं छंद विधान: हिन्दी की'',रविन्‍द्र नाथ टैगोर की कहानी '' सीमांत '', मनोहर श्‍याम जोशी की कहानी '' उसका बिस्‍तर '', कहानी ( अनुवाद उडि़या से हिन्दी)'' अनसुलझी''मूल लेखिका:सरोजनी साहू अनुवाद:दिनेश कुमार शास्त्री, छत्तीसगढ़ी कहिनी'' फोंक - फोंक ल काटे म नई बने बात'' लेखक:ललित साहू' जख्मी', बाल कहानी '' अनोखी तरकीब''''मेंढक और गिलहरी'' रचनाकार पराग ज्ञान देव चौधरी,सुशील यादव का व्यंग्य '' मन रे तू काहे न धीर धरे'', त्रिभुवन पांडेय का व्‍यंग्‍य ''ललित निबंध होली पर'',गीत- गजल- कविता: रचनाकार :खुर्शीद अनवर' खुर्शीद',श्याम'अंकुर',महेश कटारे'सुगम',जितेन्द्र'सुकुमार',विवेक चतुर्वेदी,सुशील यादव, संत कवि पवन दीवान,रोज़लीन,डॉ. जीवन यदु, टीकेश्वर सिन्हा'गब्दीवाला, बृजभूषण चतुर्वेदी 'बृजेश', पुस्तक समीक्षा:'' इतिहास बोध से वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार'' समीक्षा : एम. एम. चन्द्रा'', ''मौन मंथन: एक समीक्षा''समीक्षा''मंगत रवीन्द्र,''जल की धारा बहती रहे''समीक्षा : डॉ. अखिलेश कुमार'शंखधर'

रविवार, 15 सितंबर 2013

तुम या मैं

    शिखा वाष्णेय
मैं थी ही क्या तुम्हारे लिए
        एक चलती फिरती प्रतिमा
            या एक यंत्र भर
                जरूरतों की पूर्ति का
    जिसका अपना तो कुछ था ही नहीं
        ख़ुशी भी थी तुम्हारी हंसी में
            गमगीन भी थी तुम्हारी नमी में
                    पर तुम...
    तुम हमेशा रहे
        मेरे लिए सब कुछ
            मेरा दिल,जान, नींद,सपने
                मेरी सहर,धूप,छाँव,नगमें
    अब मेरी कविताओं में तुम
        कभी कभी मुस्कुरा भी देते हो तो
            यूँ लगता है जैसे
                तुम्हारे दिल ने मेरे वजूद को छुआ है।
पता : द्वारा - शिल वाष्णेय
3/214, विद्या नगर कालोनी
अलीगपताढ़ (उ . प्र . )

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