इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

बुधवार, 4 सितंबर 2013

बसंत बिना कोइली रोवय


जगन्नाथ डड़सेना
बसंत बिना कोइली रोवय
बसंत बिना कोइली रोवय,
रस बिना भौरा।
अडिहा बिना हॅडिया रोवय,
सुहावय नहीं कौंरा॥
दार बिना भात रोवय,
साग बिना कलौंजी।
चना बिना दांत रोवय,
नंनद बिना भऊजई॥
खइरखा बिना अहिरा रोवय
चारा बिना गरूवा।
बर बिना बिहाव रोवय,
डारा बिना मड़वा॥
तिल बिना घानी रोवय,
मऊहा बिना कलार।
मुसर बिन ढेंकी रोवय,
बारी बिना मरार॥
तेल बिना तिहार रोवय,
पानी बिना धान।
डोकरा बिना डोकरी रोवय,
मोटियारी बिना जवान॥
ग्राम - पचरी, पो - नरतोरा
विकासखंड - महासमुन््द
जिला - महासमुन्द 6 छग. 8

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