इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

गुरुवार, 12 सितंबर 2013

लाठी माला और भुजाली

डॉ . जवाहर लाल च्बेकसज्
लाठी माला और भुजाली आज हमारी बस्ती में।
कौन करें किसकी रखवाली आज हमारी बस्ती में॥

कटते पेड़ सिमटते जंगल आबादी बढ़ती अविराम।
धरती की उजड़ी हरियाली आज हमारी बस्ती में॥

दूषित हवा प्रदुषित पानी बे - मतलब का शोर यहॉ।
गंदी गली सड़क औ नाली आज हमारी बस्ती में॥

बिजली के इस चकाचौंध में हमने अंधापन खरीदा।
बिला दीप के सजी दीवाली आज हमारी बस्ती में॥

वस्त्रहीन नंगी औरत की जब लोगों पर नजर पड़ी।
घुटनों से वह बदन छुपा ली आज हमारी बस्ती में॥

उस बेचारी भलमानस को भूख ने जब अपहरण किया।
करती क्या इज्जत लुटवाती आज हमारी बस्ती में॥

इतने पर मत चौकों यारों एक हादसा और सुनो।
अस्मत भी देती है गाली आज हमारी बस्ती में॥

मंदिर मस्जिद यहां बने हैं प्यार मोहब्बत को दफना कर।
घर - घर देवी - दुर्गा - काली आज हमारी बस्ती में॥

कर्ण दधीचि हरिश्चन्द्र सा दानी होंगे कभी यहँा।
अब तो बचे हैं सिर्फ सवाली आज हमारी बस्ती में॥

कहीं पे रैली कहीं पे धरना कहीं बगावत का जलवा।
हठ करते दिखते हड़ताली आज हमारी बस्ती में॥

उस दिन जिसने खत भेजा था मुझसे व्याह रचाने को।
उसने भी वह खत मंगवा ली आज हमारी बस्ती में॥

उसकी बात करूं क्या च्बेकसज् सच कहना दुश्वार यहाँ।
मेरे मुंह पर भी दुनाली आज हमारी बस्ती में॥
संपादक - पनघट, रूपांकन, पो.बा.203, पटना - 800001

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