इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शनिवार, 14 सितंबर 2013

मूतिर्कार नेल्सन के गांधी मेरी मुसीबत

  • डॉ. परदेशीराम वर्मा
गांधी डिवीजन से पास होना और मजबूरी का नाम महात्मा गांधी, इन दोनों जनप्रिय  फिकरों से हम सब प्राय : परिचि त है.पता नहीं गांधी जी तृतीय  श्रेणी में उत्तीणर् हुए इसलिए य ह उIि च ल पड़ी या फिर तृतीय  श्रेणी में रेलयात्रा करते थे इसलिए य ह कहावत बनी.लेकिन है य ह च चि र्त कथन.ठीक उसी तरह मजबूरी का नाम महात्मा गांधी कथन भी च चि र्त है.पहले का अथर् अभी जानना बाकी है लेकिन पिछले दिनों भाई जे.एम.नेल्सन मूतिर्कार की उदारता से परेशान होकर मैं मजबूरी का नाम महात्मा गांधी कहावत का अथर् जरूर ठीक ढ़ंग से समझ जान सका.हुआ यूं कि आठ वषर् पहले मेरे गांव लिमतरा मे कबीर प्रसंग का यादगार आयोजन संपÛ हुआ.गांव के  उत्साही सरपंच  भाई झालाराम ने गांव में चार पांच  मंत्रियों की उपक्स्थति का लाभ लेते हुए गांधी प्रतिमा स्थापित करने का निणर्य  लिया.स्वतंत्रता की स्वणर् जयंती की याद में पंचाय तों के द्वारा स्मृृति स्तंभ आदि बनाये जा रहे थे.पैसा उसके पास था ही.सोचा लगे हाथ गांधी जी को ही मंत्रियों के हाथों गांव में बैठा लें.
आनन - फानन गांव के मूतिर्कार सतरोहन से मूतिर् बनवाई गई और तत्कालीन मंत्री च रणदास महंत ने मूतिर् का अनावरण कर दिया.अनावृत गांधी को देखकर वहीं lूटी पर हाजिर सी.एस.पी. आर.पी.शमार् ने मुस्कराते हुए मुझसे पूछा - मूतिर् आखिर है किसकी ?सरपंच  भी पास खड़ा था.वह इस प्रश्न से बहुत शमिर्न्दा हुआ.य ह शमिYदगी लगातार बढ़ती रही.हर आगंतुक शमार् जी के अंदाज में य ही प्रश्न पूछा बैठता.अंत में झालाराम ने खिसियाकर कहा - भैया, अच्छी मूतिर् आप बनवा दीजिए, उसे स्थापित करने और समारोह का खचार् देने का जिम्मा मेरा. मैंने भल को भल समझा. तब तक मैं प्रसिद्ध मूतिर्कार जे.एम.नेल्सन से मिला भी नहीं था.उनकी कृतियों से परिचि त जरूर था.मगर विभागीय  नरेन्द्र राठौर से कभी कभार नेल्सन गाथा सुनता जरूर था.लेकिन बात बनती भी है तो अकस्मात.एक दिन खाने - पीने की एक रौनकदार पाटीर् भाई नेल्सन के घर के पास ही सुनिक्श्च त हो गई.हम दल बल के साथ नेल्सन को भी आमंत्रित करने गये.उसी दिन पहली बार मैं नेल्सन से मिला.सेटिर एक क्स्थत उनके ¹ाटर्र में बड़े -बड़े सजीव हाथी रात के अंधियारे में भी यूं लग रहे थे मानो मंथर गति से च ल ही पड़ेगे. हम सबने लाख आमंत्रित किया मगर नेल्सन ने साफ मना कर दिया.वे पाटीर् में शामिल नहीं हुए.
पीते - खाते हुए नेल्सन प्रसंग च ला.उनसे पूवर् परिचि त मित्रों ने बताया- नेल्सन इन लोगों की तरह मुंह नहीं जुठारते.वे बकाय दा तीन दिन की समाधि लगाकर अंगूर की बेटी के साथ जश्न मनाते हैं.उनके त्रिदिवसीय  अघोर साधना के हजारों किस्सें हैं.मगर मैं पहली बार सब किस्सा सुन पा रहा था.मुझे बड़ी जिज्ञासा हुई.
दो - चार दिन बाद मैं समय  निकालकर जा पहुंचा नेल्सन के घर.शालीनता पूवर्क वे मुझसे मिले.लपक कर मिलने की उनकी आदत है भी नहीं.मैंने भी बिना  भूमिका के आग्रह कर दिया कि भाई लिमतरा में गांधी जी पहचाने नहीं जाते, आप एक ढ़ंग का गांधी हमें दे दीजिए.उन्होंने आग्रह सुनकर दÛ  से कह दिया - एक हKते में आकर ले जाइये,गांधी जी मेरी तरफ से मुKत.
मैंने इसे धुनकी में कही बात समझी.लेकिन एक दिन उनके घर के पास से गुजर कर अपने दKतर की ओर जाते हुए यिा देखता हूं कि गांधी की आवक्ष प्रतिमा आने - जाने वालों को घूर रही है.बस च श्मा भर नहीं हैं गांधी जी के कानों में .
मैंने राहत की सांस ली - च लो, च श्मा नहीं है इसलिए बापू मुझे ठीक से देख नहीं पाये होंगे.दKतर से लौटकर मैं जा पहुंचा नेल्सन के घर.वे कुछ काम कर रहे थे.मुझे देखकर बोले -आपने तो आना ही छोड़ दिया.देखिए, गांधी जी सांचे में ढ़लने के लिए तैयार हैं.कल सांचा बनेगा फिर हKते भर में माबर्ल कास्टिंग के गांधी आपके गांव जा सकते हैँ.अब मैं घबराया. चूंकि इस बीच  झालाराम ने मुझे टका सा जवाब दिया था कि या तो प्रभारी मंत्री धनेश पटिला को आप लायें या गांधी जी को अपने खचेY से स्थापित करें. मैंने प्रयास भी किया मगर पटिला जी उपलबध नहीं हुए अलबत्ता गांधी जी सहजता पूवर्क उपलबध हो गए.
गांधी जी सांचे में आ गये थे.मेरी मुसीबत जस की तस थी.मैंने एक युIि सोची - गोढ़ी में मैं पढ़ा हूं.वहीं पुराने विद्याथिर्यों का मिलन समारोह रखकर गांधी जी को समारोहपूवर्क स्थापित कर दूं.य ह मैंने सोचा कि चूंकि गोढ़ी स्कूल का नाम पहले महात्मा गांधी हाई स्कूल ही था. जो शासकीय  करण के बाद अब बदल गया है.अब गांधी जी हट गये हैं, उनके बदले शासन आ गया है.इसलिए पुन: गांधी को जोड़ने की मेरी युIि सबको अच्छी लगी.बड़ी तैयारी के साथ गोढ़ी में एक बड़ी बैठक मैंने रखवाई.दुगर् के एस.पी.,कलेटिर और शिक्षाधिकारी की सम्मति मैंने ले ली.मेरे आग्रह पर मेरे सहपाठी और कम्युनिस्ट नेता साथी दुखितराम बैठक में आये.भला उनके बिना य ह आयोजन हो भी कैसे सकता था.उन्होंने जनसभा को संबोधित करते हुए कहा - साथियों,अच्छा लगा य ह जानकर कि आप सब मिल बैठकर पुरानी स्मृति को ताजा करना चाहते हैं.लेकिन कामरेड परदेशीराम वमार् से मैं पूछना चाहता हूं कि घोर अकाल  और परेशानी भरे दिनोंमें य ह कैसा आयोजन वे कर रहे हैं.साथियों परदेशीराम वमार् पढ़ते लिखते हैं. उनकी शहर में पहचान है.शहर में सेठ साहूकार, मालदार व्य Iि बहुत हैं, उनसे परदेशीराम वमार् की पहचान भी हैं.गांधी से हमारी दुश्मनी नहीं है साथियों,वे आये स्थापित हो, मेरी भी एक शतर् है -य ह शतर् है जनता के हित में,गांव के हित में..।
इस बात पर उनके समथर्कों ने जोर की तालियां बजाई.दुुखित राम पुन: अपने कुतेर् की बांहों को ऊपर च ढ़ाते हुए कहा - साथियों,हमारे गोढ़ी गांव में भावना तो बहुत हैं मगर साधन नहीं है.हम बाहर से आये साथियों का स्वागत तो करेंगे मगर स्वागत का समूचा खच र् कामरेड परदेशीराम वमार् जुटायेंगे.खच र् भी वे ही जुटायेंगे, काय र्क्रम भी वे ही करेंगे और गांधी को स्थापित करने की सारी जिम्मेदारी भी वे ही लेगे. हम लोग केवल भावनात्मक सहयोग देंगे.साथ - साथ रहेंगे.साथ साथ रहना भी छोटी बात नहीं साथियों,और एक बात मैं स्पष्ट क र देना चाहता हूं कि हमारा गांव गोढ़ी बहुत बड़ा है.कुछ नये निमार्ण शासकीय  सहयोग और सांसद निधी से हुआ है.हमारे गांव में छात्रावास भवन बनकर तैयार है.उसका हस्तांतरण समारोह भी उसी अवसर पर होना जरूरी है.फिर इस शाला में जहां हम पढ़ - लिखकर निकले,चार कमरे सांसद ताराचंद साहू बनवा रहे हैं.इन कमरों का हस्तांतरण समारोह भी जरूरी है. तो भाई अजीत जोगी मुख्य मंत्री और सांसद ताराचंद साहू को लाने और लोककला आदि करवाने की जिम्मेदारी भी परदेशी भाई की है.वे सक्षम हैं और उत्साही हैं.
अब मुझे काटो तो खून नहीं. बालोद से हमारे गुरू जी अमृतदास सहित सत्तर जुÛा विद्याथीर् वहां उपक्स्थत थे.मैं बहुत घबराया.मुझे लगा कि त्रिटंगी दौड़ में ही मैं परेशान था.भाई दुखितराम मुझे बोरा दौड़ में जोतकर मुड़भसरा गिराना चाहते हैँ.मुझे नेल्सन पर भी खूब गुस्सा आया. कुछ नाराज मैं गांधी जी पर भी हुआ कि अच्छा फंसाया बापू ने.लेकिन हिम्मत हारने से तो काम च लने वाला नही था अमृतदास सर ने बहुत भावुक होकर कहा - खोंची - खोंची मांगकर हम ला सकते हैं.मिल बैठकर खाने का सुख वह भी तुम्हारे जैसे अपने पुराने विद्याथिर्यों के साथ अ..ह...ह.. , धन्य  है य ह पागल परदेशी जिसने ऐसा पुनीत काम अपने  हाथ में लिया.
मैं अपने पागलपन के कारण पहले ही घिरा पड़ा था,दास सर अलग से घेर रहे थे.मेरी हालात बाढ़ से घिरे खेत में हरियार फसल देखकर कूद पड़े बछरू की तरह हो गयी थी जिसे सब तरफ से रखवाले डंडा लेकर दौड़ा रहे हो और बछरू को भागने की जगह सूझ नहीं रही हो.मैं मन ही मन गांधी जी के प्रिय  भजन का पाराय ण करता चुपचाप बैठा था....
ईश्वर अ„ह तेरो नाम,
सबको सम्मति दे भगवान.
दास सर की बोलने की अपनी प्रभावपूणर् शैली है.जब वे कक्षा में पढ़ाते थे तो हम लोग खिड़कियों से झांक - झांक कर उनकी अदाएं देखते थे.बड़ी मोहकशैली है दास सर की.मैं अदा पर फिदा तो उस दिन भी था मगर मृदंग की स्वर लहरी को सुनकर शिकारी की ओर आंख मंूदकर च ली च लने वाली हिरनी की क्स्थति को प्राÄ हो रहा था.
उगलत निगलत पीर घनेरी ।
तभी दास सर ने सस्वर कहा -
 वैष्णव जण तो तेणे कहिए,
 जे पीर पराई जाणे रे ।
अब मुझे रास्ता मिल गया.आभार व्य I करते हुए मैंने कहा कि दुखित भाई की पीड़ा एकदम सही हैं.क्षेत्र में अकाल है.ऐसे में मुख्य मंत्री जी अगर आ जाये तो कुछ राहत की मांग हम कर सकेंगे.इसलिए फिलहाल य ह जो मेरा काय र्क्रम है उसे निरस्त मानिए.हम बड़ी तैयारी के साथ मुख्य मंत्री को बुलाकर क्षेत्र के लिए मांगे, ठीक य ही है.दुखित भाई जननेता हैं.उनकी सोच  पर मुझे गवर् है.पासा पलटते देख दुखित भाई और सबने कुछ कहने का प्रयास तो किया लेकिन मैं भी तो वाकपटु अमृतदास सर का शिष्य  हूं. कुछ इस तरह अपनी बात रखी कि उस दिन गोढ़ी का फांदा भी किसी तरह कटा.लेकिन य हां कहानी का अंत होता नहीं.अभी नेल्सन जी के घर में गांधी जी सांचे से निकलने को आतुर थे.दो दिनों बाद यिा देखता हूं कि माबर्ल कास्टिंग में दमदमाते मजबूत महात्मा गांधी नेल्सन के घर में विराज रहे हैं.नजदीक गया तो देखा - नेल्सन जी बापू का च श्मा ठीक करने में तन्मय  थे.मैं थका हारा सा प्लास्टिक की कुसीर् में जा बैठा.नेल्सन ने काम करते हुए ही कहा - बड़े भइया, लीजिए आपके गांधी जी तैयार हैं.बस पलर् पेंट भर मारना है.फिर देखिए इनकी दमक.
मरता यिा न करता.मैं कुछ इधर - उधर की बात करता रहा फिर तीन चार दिन बाद आने की बात कह कर मैं उठ खड़ा हुआ.अब मुझे दिन चैन मिले न रात को आराम.कभी सोचूं कि इस मुसीबत को छूटकारे के लिए गांधीवादी चिंतक कनक तिवारी के शरण में च ला जाऊं.मगर वे हाईकोटर् की जरूरत को देखते हुए अपनी सेवा बिलासपुर में दे रहे थे.पद्नाभपुर में ताला पड़ा हुआ था. वे रहते तो मुझे गांधी जी से जरूर बचा ले जाते.गांधी जी का सारा वजन वे सम्हाल लेते.मगर वे भी मुझे और गांधी जी को छोड़ कर दूर जा निकले थे.काले कोट वालों की दुनिया की बारीकी नये सिरे से समझ - समझा रहे थे.इस बीच  मैंने अपने विभाग के  अफसरों को भी अपने हिसाब से टटोला.रजत जयंती लोककला महोत्सवों की श्रृंखला उस वषर् च ल पड़ी थी.इसलिए प्रबंधन ने तय  किया कि लगातार लोकात्सव हो.मोरिद और बोड़ेगांव मे ऐसे दो आयोजन हो चुके थे.मुझे लगा कि अगर मेरे मन के अनुकूल गांव मेंं य ह आयोजन हो जाये तो गांधी से मुझे बड़ी आसानी से छूटकारा मिल जाय ,वहीं स्थापित कर दूं.और नाच  गाकर गंगा नहा लूं.
मुझे नेल्सन के घर में दमदमाते महात्मा गांधी की मूतिर् के पास जाने ही हिम्मत ही न हो.परेशानी के उन दिनों में मुझे चिंता होती कि गांधी नेल्सन के घर से प्रस्थान करेंगे भी या वहीं डटे रहेंगे.
शंकर भI रावण का वह किस्सा दीमाग में कौंध - कौंध जाता.रावण के आग्रह पर शंकर भगवान उसके साथ लंका जाकर स्थापित होने मान गये.रावण ने उन्हें सपरिवार पवर्त सहित उठा भी लिया लेकिन शतर् य ह थी कि रास्ते में कहीं भी रखे भी कि  शंकर जी टरेंगे नहीं.रावण को रास्ते में एOी लगी और जो उसने शंकर भगवान सहित पहाड़ को जमीन में रखा तो फिर वहां से उन्हें हिला नहीं सका.मुझे परेशानी से भरे उन दिनों नेल्सन के घर के पास से गुजरते ही एOी लग जाती थी.गांधी जी य था स्थान थे.परेशान होकर मैंने बड़े इसरार के साथ अपने साहब वरिþ प्रबंधक शैलेन्द्र श्रीवास्तव को आग्रह किया कि एक लोकोत्सव मेरे पहुंच  के गांव में कर देवें.वे सुनते ही उखड़ गये.मंत्रियों और शासकीय  अधिकारियों के साथ मेरी पहचान से अकसर बिदक उठने वाले श्रीवास्तव जी साथ सुर में सुर मिलाते हुए छोटे साहब मोहनसिंह चंदेल ने भी खूब जमकर सुनाया कि इसीलिए मेरी तरOी नहीं हो रही है.मैनेजमेंट को सब पता है.मैं हOा बOा रह गया.मुझे बड़ा आश्च य र् हुआ कि आखिर य ह गांधी आख्यान मैनेजमेंट को कैसे पता च ला.साहित्य  - संस्कृति संबंधी जो भी जानकरी मैनेजमेंट को मिलती है वह तो सदी की सबसे लम्बी कविता लिखने वाले अशोक सिंघई के माफर्त ही मिलती है.अशोक भाई से मेरी मित्रता जग जाहिर है.वे तो बताने से रहे तो फिर मैनेजमेंट ने जाना कैसे !मैनेजमेंट की थोड़ी बहुत जानकारी मुझे भी है.वह वरिþ प्रबंधकों की आंखों से देखता है और कुशल प्रबंधकों के कानों से ही सुनता है तो मोहनसिंह का य ह डराने वाला डाय लाँग बहुत प्रमाणित नहीं लगा मुझे.मगर वे अफसर हैं इसलिए उनकी बात को काट भी नहीं सकता था मैं.यिोंकि उनके साथ मैनेजमेंट था जबकि मेरे साथ केवल महात्मा गांधी भर थे.इस बार भी महात्मा गांधी को मैनेजमेंट से मुंह की खानी पड़ी.और मैं सोच ने लगा कि बापू ने गोरो को जरूर ठीक कर दिया इसलिए य ह गीत च चि र्त भी हुआ...
गली - गली खोर - खोर में
उड़त हे गांधी के नाम ।
गांधी बबा बड़ परतापी,
धन - धन ओकर छाती,
बिन गोला बारूद भगाइस,
गोरा अंगरेजी उत्पाती ।
गोरो से तो प्रतापी गांधी ने पार पा लिया मगर इस बार तो गोरो से पाला पड़ा नहीं था, इसलिए गांधी बबा बड़ परतापी, बिना गोला बारूद के सिद्ध नहीं हुए. और फिर मैं फिर निकल पड़ा नई संभावनाओं की तलाश में. मुझे याद आया कि मैं साक्षरता समिति से जुड़ा हुआ हूं.डी.एन.शमार् से कुछ मदद लेने का प्रयास यिों न करूं.श्री नेल्सन और डी.एन.शमार् को लेकर मैं साक्षरता समिति जा पहुंचा.मैं भूल गया था कि डी.एन.शमार् अब वे देवेन्द्रनाथ नहीं रह गये थे जो एक एक कहानी और नाटक लेखन के लिए दाद देते अघाते नहीं थे.अब वे छत्तीसगढ़ राज्य  के साक्षरता प्रमुख हो गये थे.अभी - अभी जय पुर, आगरा,दि„ी फतह कर वापस लौटे थे.मैं पहुंचा तो दोनों कानों में फोन का एक एक चोंगा लगाये कभी इसे तो कभी उसे कुछ आÄवच न सुना रहे थे.बीच - बीच  में साक्षरता देवी - देवताओं के द्वारा प्रस्तुत चेकों पर दस्तखत भी कर रहे थे.वहां से फारिंग होते तो फाइल में कुछ लिखने लग जाते.कभी फैसि मशीन पर हाथ मारते तो कभी किसी कमर्चारी को डाँट पिलाते.आधे घंटे के बाद बाकाय दा कुछ भूमिका बांधते हुए मैंने अपनी बात रखने का प्रयास प्रारंभ किया - शमार् जी,ऐसा है कि मैं उपन्यास लिख रहा हूं, नवसाक्षरों के लिए.उसकी कम्पोजिंग हो चुकी है.
- तो पलापी दे दो. शमार् जी ने कहा.
- कम्पोजिंग का चाजर्...।
शमार् जी बड़े सुनियोजित ढ़ंग से उखड़ते और झुकते हैं.उन्हें वह अवसर मिल गया जहां से प्रभावी ढ़ंग से उखड़ा जा सकता था.वे लगभग दुत्कारते हुए बोले - देखो यार, फालतू बातें आप करने लगते हैं.काम की बात करो.बेकार में मेरा समय  मत लो.बात कह दी तो कह दी.पलापी की बात करो.वस्तुत: मैं तो उन्हें गांधी से जोड़ने की जुगत जमाने आया था.य हां तो हालात ऐसी हो रही थी मानों बेटी बयाहने की उम्मीद लेकर पहुंचे बाप को पानी मांगने भर से फटकार - दुत्कार शुरू हो जाए.
मैं नेल्सन को और अपने बाल सखा को साथ लेकर इस उम्मीद में भी गया था कि भले गांधी यात्रा में डी.एन.शमार् शरीक न हो मगर मित्रों पर मेरा रौब तो पड़ेगा ही देखो छत्तीसगढ़ शासन का स्वामी मुझे कितना मानता है.मगर हर बार आदमी को अपने मन के अनुरूप तो व्य वहार मिलने से रहा.हम सब लक्ज्जत हो उठे.साक्षरता सदन से निकलते हुए मुझे पंच राम मिरझा का गीत याद ही आया -
तैं हा जान गंवाये गांधी,
इही तिरंगा खातिर तैं हा जान गंवाये ।
मरगे कतको गोली खा के,
काटे तैं च ौरासी
3 जनवरी 48 के
नाथू ह मारिस गोली
प्रान तियागे ये मोर बाबा,
भर दिये तैं हर झोली,
तैं हर जान गंवाये गांधी,
तैं हर जान गंवाये.....।
निराश - हताश मैं घर लौट आया.शाम का समय  था.अचानक कोलिहापुरी गांव का मेरा मंचीय  चेला केशव हरमुख बंटी अपने लाव लश्कर के साथ आ धमका.भाई बसंत देशमुख की जीवन संगिनी लक्ष्मी कोलिहापुरी खानदान से आयी है.गाड़ा भर कलारी और काठा भर तुतारी वाले मालगुजार और नेता य शवंत हरमुख की बहन है.बसंत भाई के कारण हरमुख परिवार में मेरी थोड़ी सी इƒत है. केशव हरमुख य शवंत जी का य शस्वी सपूत हैं.वह कलाकार तो है ही,जनपद सदस्य  तथा भविष्य  का प्रतापी नेता हैं. उसने च रण स्पशर् करते हुए कहा - चाचाजी, गांव में मुख्य मंत्री अजीत जोगी का काय र्क्रम सुनिश्चि त है.सूखा राहत के लिए कुछ धन हम उन्हें देंगे.दो फरवरी को च न्दूलाल च न्द्राकर पु·य  दिवस है.उसी दिन समारोह पूवर्क देंगे.मैं उदास - उदास उनकी बात सुनता रहा.केशव हरमुख बसंत देशमुख को फूंफा क हे य ह हसरत मेरी सदा रही मगर वह चाचा कहता है.उसके पिता दाऊ य शवंत हरमुख मुझे उसका गुरू मानते हैं.मेरे मुंह बोले भाई डी.पी.देशमुख के चाचा की लड़की है.केशव की माता जी, उस हिसाब से मैं केशव का मामा भी हूं.
केशव उफर् बंटी ने मुझे उदास देखकर फिर कहा - चाचाजी, यिा बात है.कुछ परेशान दिख रहे हैं.
मैंने अब लगभग रूआंसे होकर साग्रह कहा - मोला गांधी जी से बचा दे बंटी.परेशान हँव बाबू ।
बंटी ने साश्च य र् पूछा - गांधी से परेशान है. कैसे चाचा जी !
तब मैंने पूरा वृतांत उसे सुना दिया.सुनकर वह हो - हो कर हंसने लगा.उसने कहा - चाचाजी,इसीलिए कहावत बनी है - मजबूरी के नाव महात्मा गांधी...य ह कहकर वह और उसके सभी साथी फिर हंस पड़े.मुझे भी हंसी आ गई.
उसने कहा - चाचा जी,बड़े काम की बात है.देखिए, छत्तीसगढ़ राज्य  बना,डाँ खूबचंद बघेल की कल्पना के अनुरूप.इसे बनवाने के लिए च ली लड़ाई.उसके सफल नेतृत्व किया हमारे चंदूलाल बबा ने.लेकिन किया गांधीवादी अहिंसक तरीके से ही न.तो बस दो फरवरी पु·य  दिवस पर गांधी जी को हम अपने गांव में स्थापित करेंगे.गांधी जी स्थापित होंगे इस वषर् और उनके चेले चंदूलाल बबा की मूतिर् लगेगी अगले बरस.मुझे लगा कि अकाल में बाढ़ी मांगने वाले दुखी किसान को मानो उदार मालगुजार ने केवल परिवार पालने के लिए ही नहीं बल्कि खेत में बोने के लिए भी भरपूर बिजहा देने के लिए भंडार खोल दिया हो.आनन - फानन योजना बन गई कि कैसे गांधी जी की पूजा दाऊ वासुदेव चंद्राकर नेल्सन के घर में करेंगे.कैसे बाजा रूंजी के साथ गांधी जी को हम ट¬ेटिर ट¬ाली में सजाकर कोलिहापुरी लायेंगे और स्थापित करेंगे. बंटी दल जब घर से उठा तो गांधी जी से जुड़े गीत फिर मेरे मानस में उमड़ने - घुमड़ने लगा...।
तें भारत के भाग ल फेरे,
अपन के साहबी बाना हेरे ।
ते घर घर मं सत के दीया बारे,
परेम के ओमा तेल डारे ।
मन मंदिर के अंधियारी माँ ,
जोत जलाये तैं भारत माँ ।
और विप्र जी की ये पंIियां भी ...।
देवता बनके आये गांधी,
देवता बनके आये ।
2 फरवरी का आयोजन तय  हो गया.कोलिहापुरी में चंदूलाल चंद्राकर पु·य  तिथि पर हम गांधी जी की मूतिर् का अनावरण छत्तीसगढ़ के मुख्य मंत्री अजीत जोगी से  करायेंगे, य ह भी तय  हो गया.अगासदिया के संरक्षक दाऊ वासुदेव चंद्राकर, प्रेरणा Íोत और विराट स्वाभिमान रैलियों के नेतृत्वकतार् मंत्री भूपेश बघेल का सम्बल तो था ही.पुरूषोत्तम चंद्राकर भी हमारे साथ थे.य शवंत हरमुख दाऊ और बसंत देशमुख, अशोक सिंघई,रविश्रीवास्तव का भरपूर सहयोग मिल रहा था.कोलिहापुरी के सरपंच  एवं पंच गण भिड़ गये.पु·य  तिथि पर अनावरण के लिए गांधी जी को स्थापित करना कठिन हो रहा था.य शवंत दाऊ के बाड़ा के आगे तालाबनुमा जगह है.य ही मंच  भी है.इसी जगह पर ट¬कों पत्थर , इYट, मिuी डालकर पुन: आयोजन के लिए मंच  बना और वीरसिंह का क्रेन ने उठाकर बापू को उठाकर य थास्थान बिठा दिया.नाम खुदाने के लिए संगमरमरी पत्थर के लिए चंदा अरोग्य धाम वाले डाँ रावलमल जैन मणि  और विबग्योर कलर लैब वाले भाई हरिशरण अग्रवाल ने दिया.तय  हो गया कि गोढ़ी स्कूल के अपने गुरूओं कपिल नाराय ण श्रीवास्तव एवं अमृतदास के साथ ही मूतिर्कार नेल्सन का सम्मान भी मैं करूं.केशव हसमुख को हमने सस्नेह हमने इस तिकड़ी के साथ जोड़ा सम्मान के लिए शाल मिला राजू अग्रवाल और भाई रमन साहनी  से.प्रमाण पत्र और स्मृति चि न्ह मैंने अपनी ओर से जमाया.इस तरह एक भव्य  सम्मान समारोह नशिा बना.चार लोगों को चंदूलाल चंद्राकर सम्मान 21 देने का संकल्प पूरा होने जा रहा था .गोढ़ी से निकला य ह खरखरा अब कोलिहापुरी की ओर बह निकला.कोलिहापुरी वालों की कमर्ठता और प्रीति देख मेरा सीना च ौड़ा हो जाता.दिन - रात वे जुटे रहते.प्रेमलता हरमुख बहन का स्नेह और सम्बल हम सबको प्रेरित करता.गांव के विपÛ कलाकार और श्रमिक वगर् के लोग गांधी स्थल पर दिन रात लगे रहते.मुझे श्यामलाल च तुवेर्दी की पंIियां याद हो आती -
का भगवान के खुर बेटा ये,जांगर रोज च लाथे ,
तभो रंच  कन आधा थोरा,नून मिरचा म खाथे ।
सउत के बेटा कस लक्ष्मी हर , काबर इनला मानै ,
इनकर दुख ला थोरको कन काही सन नइ जानै ।
गांधीजी की प्रतिमा स्थापित हो गई.चंदूलाल चंद्राकर पु·य तिथि के दिन गरिमापूणर् समारोह में प्रदेश के तत्कालीन मुख्य मंत्री अजीत जोगी ने चार पकती की नसैनी पर च ढ़ कर उन्हें श्रद्धापूवर्क हार पहनाया.मुझे चार पकती की नसैनी पर च ढ़ते अजीत जोगी को देख लगा कि ये चार पकतियाँ उनके जीवन के चार पड़ाव की तरह है.आई.ए.एस. में जाना,लोकसभा में प्रवेश,काँग्रेस का प्रवIा होना और अब छत्तीसगढ़ का मुख्य मंत्री पद.इसलिए ये चार सोपान च ढ़ने के बाद वे गांधी जी को श्रद्धापूवर्क हार पहना पा रहे थे.अपनी जिजीविषा और लगन के बल पर ऊंचाइयों को छूने वाले अजीत जोगी को माइक पर आमंत्रित करते हुए मैंने राय पुर के शाय र काविश हैदरी की इन पंIियों से स्वागत किया -
जिन्दगी है तो बहरहाल गुजर जायेगी,
तू अगर साथ नहीं है तो कोई बात नहीं ।
ठोकरें खाके भी मंजिल में पहुंच  जाऊंगा,
चांदनी रात नहीं है तो कोई बात नहीं ।
चंदूलाल चंद्राकर - अमर रहे, महात्मा गांधी - अमर रहे । का नारा गूंज उठा.गांधी जी की प्रतिमा की छाया में चारों व्य Iियों का सम्मान अजीत जोगी ने किया.नेल्सन का परिवार इस अवसर पर उपक्स्थत हुआ. मेरे गुरूजन भी सपरिवार पधारे. भाई देवलाल बंछोर और देवदास बंजारे सहित शिष्यों ने उनका च रण स्पशर् किया. और इस तरह मैं बापू की गिरKत से आजाद हुआ.जे.एम.नेल्सन पहले ऐसे व्य Iि नहीं है जिन्होंने मांगते ही मुझे निहाल कर दिया.मुझे जीवन भर ऐसे व्य Iि मिलते रहे जिनकी उदारता की छाया मे मैं परेशानियों की धूप का सामना करता रहा.लेकिन पहली मुलाकांत में  मांगते ही देने वाले विचि त्र दाता सिद्ध हुए भाई जे.एम.नेल्सन.मुझे समझ ही नहीं आया कि इस उदारता के कारण जो मैं एक वजन सा महसूस करता था उससे मुक्ति कैसे मिले.चंदूलाल चंद्राकर की छाया उनके जाने के बाद भी मुझ जैसे लाखों लाख अनुगामियों पर है.य ह मैंने महसूस किया जब कोलिहापुरी में ही मैं हल्का हुआ. नेल्सन की कृपा के भार से मुI हुआ.
जे.एम.नेल्सन को वहीं पुरूषोत्तम चंद्राकर ने चंदूलाल चंद्राकर की मूतिर् बनाने का आडर्र दे दिया.नेल्सन से जब मैंने पूछा कि कितना देना होगा तो उसने फिर कहा कि मुKत में बना देंगे.मुझे उसके कथन से पसीना छूट गया.मैंने कहा - भाई जी, मुझ पर रहम करो.तब जाकर पन्द्रह हजार में बात तय  हुई.मैंने राहत की सांस ली.मैंने मन ही मन बीते हुए 15 दिनों को याद किया और इस शेर को भी...।
ये इश्क नहीं आसा,हमने जो ये जाना है,
काजल की लकीरों को आंखों से चुराना है ।
इसी दिन एक मूतिर् चंदूलाल चंद्राकर मेमोरिय ल हाक्स्पटल के लिए भी बनवाने की बात तय  हो गई.धीरे - धीरे कई लोगों ने नेल्सन से चंदूलाल चंद्राकर की मूतिर् के लिए संपकर् करना प्रारंभ कर दिया. और फिर मैं पुराने दिनों की ओर लौटने लगा.मैंने नेल्सन को सिफर् पन्द्रह दिनों के लिए पाया. इन्हीं पन्द्रह दिनों में मुझे लग गया कि नेल्सन एक ऐसा समुद्र है जहां बड़वाSि की आशंका सदा बनी रहती है.मैं अपनी छोटी सी कश्ती को लेकर इस समन्दर में उतर तो गया था मगर जल्द की घबराकर किनारे की ओर लौट आया.मैं घबराया इसलिए भी यिोंकि नेल्सन ने अपना जन्म दिवस 3 जनवरी की रात मस्ती में अपने मित्र  तांडी आदि की उपक्स्थति में अहिवारा से मुझे फोन किया.वह लगातार अपनी बात कहता रहा जिसका आशय  य ह था कि भाई साहब, आप आठ बजे रात को भोजन कर सो जाते है ऐसे में नेल्सन पर यिा लिख पायेगे आप.रात - रात भर साथ रहना होगा.गांव शहर की धूल फांकनी होगी तब नेल्सन और उसके द्वारा निमिर्त मूतिर्याँ आपसे अपने दिल की बात कहेंगी.मैंने इतने दिनों में य ह जान लिए कि नेल्सन एक औघड़ कलाकार है जो बस में है तब तक बस में है , और मस्ती में आया तो फिर हर व्यक्ति उसके सामने बेबस है.हर जगह उसे घर सा सुकून मिल जाता है.वह डोंगरगढ़ की पहाड़ियों में दो - दो माह रहकर बुद्ध की ऐसी प्रतीमा बना सकता है जिसे देखकर जापानी पीछे पड़ जाय  कि च लो जापान और सूरज के देश में अपनी जिंदगी रोशन करो.मगर नेल्सन भी नेल्सन ही है,इस प्रस्ताव का उसने य ह कह कर विरोध कर दिया....।
दिल का नगर तो देर से वीरान था मगर ,
सूरज का शहर भी मुझे उजड़ा हुआ लगा ।
नेल्सन ने क्‍या क्‍या किसके लिए नहीं बनाया और नेल्सन को जाने किन किन अपनों ने नहीं बिगाड़ा.जवाहर लाल नेहरू हाक्स्पटल सेटिर से लेकर जाने कहां - कहां उनकी बनाई मूतिर्यां नहीं लगी.लगीं और उपेक्षा की शिकार हुई.राजनीतिक षड़यंत्र का शिकार हुई.प्रशासनिक छद्म से विखंडित भी हुई.कोई सक्षम व्य Iि ही उसकी मूतिर् से शाय द कभी बात कर सके.उन्हें समझ सके.उनकी ददर् भरी दास्तान को शबद दे सके.मैं अपनी सीमा समझता हूं, हैसिय त भी.मुझे  मूतिर् कला की समझ नहीं है और नेल्सन को आदमी की समझ कम है.इसीलिए केवल पन्द्रह दिनों में अघा गया.सहम गया.थम गया.

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