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शुक्रवार, 30 नवंबर 2007

जहां पाषाण बोलते हैं

गंडई का भाँड़ देउर
डां. पीसी लाल यादव
छत्तीगसढ़ प्राचीनकाल से आस्था का केन्द्र बिन्दु रहा है। यहां सिरपुर,  शिवरीनारायण, राजिम,  मल्हार, रतनपुर, पाली, ताला, भोरमदेव, आरंग, जांजगीर, देवबलोदा, बारसुर, जैसे अनेक पुरातात्विक स्थलों का अपना पृथक - पृथक ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और पुरातात्विक महत्व है। यहां के मंदिरों के उत्कीर्ण शिल्पांकन तत्कालीन समाज की धार्मिक व सांस्कृतिक स्थितियों के जीवन्त साक्ष्य हैं। ये मूक होकर भी बोलते हैं। आवश्यकता केवल उनकी मूक भाषा को समझने की है। छत्तीसगढ़ के कोने - कोने में अनेक मंदिर इतिहास, कला व संस्कृति के साक्षी के रूप में विद्यमान हैं। ऐसा ही एक भव्य व प्राचीन शिवमंदिर गण्डई जिला राजनांदगांव में स्थित है।
गण्डई राजनांदगांव जिले का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल है। यहां आसपास अनेक प्राचीन मंदिर व प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण स्थान है। गण्डई का शिव मंदिर टिकरीपारा, वार्ड नं. 15 में स्थित है। यह मंदिर इस अंचल में च्च् भाँड़ देउर ज्ज् के नाम से विख्यात है। भाँड़ छत्तीसगढ़ी शब्द से व्युत्पन्न है। जिसका अर्थ है - भग्न या गिरा हुआ और देउर का अर्थ - देवालय से है। भाँड़ देउर अर्थात् ऐसा देवालय जो भग्ïन हो। कालान्तर में यह मंदिर भग्न था जिसे केन्द्रीय पुरातत्व विभाग ने संरक्षित कर पुनर्निर्मित किया है। पुनर्निर्माण के चिन्ह्रï आज भी इस मंदिर में स्पष्टïत: परीलक्षित होते हैं। मंदिर स्थापत्य की दृष्टिï से पुरातत्ववेत्ता इस मंदिर को भग्न मानते हैं क्योंकि इस मंदिर का अन्तराल व महा मंडप नहीं है। केवल गर्भगृह व विमान ही शेष है, पर जो है अतिसुन्दर और कलात्मक है।
मंदिर का निर्माण शैली व स्थापत्य कला की दृष्टिï से पुरातत्ववेत्ताओं ने इस मंदिर को कल्चुरीकाल में 11 वीं - 12 वीं शताब्दी में निर्मित माना है। यह मंदिर भोरमदेव मंदिर का समकालीन है। तथा भोरमदेव मंदिर की तरह भव्य एवं मूर्तिकला की दृष्टिï से समुन्नत है। नागर शैली में निर्मित यह पंचरथ प्रकार का व पूर्वाभिमुखी है। इस मंदिर में महा मंडप नहीं है किन्तु अंतराल का कुछ भाग सुरक्षित है। इससे यह प्रमाणित होता है कि मंदिर का महा मंडप व अन्तराल भी भव्य और अलंकरण युक्त रहा होगा। मंदिर के सम्मुख नंदी की अलंकारित पश्चिमाभिमुख प्रतिमा स्थापित है। आंशिक रूप से सुरक्षित अन्तराल के ऊपर पृथक शिखर स्थापित है। इस शिखर में ज्यामितीय आकृतियां व पुष्प वल्लरियों के साथ नारी मूर्तियाँ विद्यमान है। शीर्ष में गर्जन की मुद्रा में सिंह विराजमान है, जिसकी भव्यता कला प्रमियों को सम्मोहित करती है।
ललौंहे पत्थर से निर्मित मंदिर का प्रवेश द्वार सर्वाधिक अलंकृत है। लगता है इस भाग में शिल्पियों ने मूर्तियों में कोई लेप किया है अथवा महीन घिसाई की है, जिसके कारण की यह भाग आभामय है। किरणें पड़ती है तो एक अलौकिक चमक पैदा होती है। निर्माणकाल से लेकर वह चमक आज भी सुरक्षित है। इसकी भव्यता और सजीवता शिल्पी की कल्पनाशीलता और उसकी कला कुशलता को मुखरित करती है। प्रवेश द्वार का शिल्पांकन अद्वितीय है। प्रवेश द्वार के अधोभाग में प्रस्तर खंडों पर उत्कीर्ण वादन रत व नित्य रत नर - नारियों की मूर्तियां लघु रूप में होकर कला की सूक्ष्म भाव - भंगिमा व उसकी निपुणता के भव्य रूप को उद्घाटित करती है। शिल्प ने नृत्य मग्न कलाकार के पाँवों में बंधे घुंघरूओ को भी बड़ी कुशलता के साथ उकेरा है। चौखट के चारों ओर सूक्ष्म रूप से उत्कीर्ण लता वल्लरियाँ और पुष्प वल्लरियाँ अंकित है। खड़े चौखटों पर नृत्यरत मयूर शोभामान है। सूक्ष्म अंकन आंखों को संतृप्त करते हैं। अधोभाग में गणेशजी व सरस्वती की छोटी किन्तु सजीव मूतियाँ हैं।
प्रवेश द्वार के दोनों भाग में भगवान शिव का मानुषी रूप हाथ में त्रिशुल,डमरू व सर्प के साथ प्रदर्शित है। नीचे नंदी विराजित है। दोनों ओर सहचर भी है। अन्य मंदिरों की तरह द्वारपाल के रूप में मकरवाहिनी गंगा तथा कुर्म वाहिनी यमुना का सुन्दर व सजीव अंकन है। इसी स्थान पर सात - सात की संख्या में नाग कन्याओं की अति सूक्ष्म आकृतियां अंकित हैं, जो परस्पर प्रत्येक के पृच्छ भग से गुम्फित हैं। द्वार शाखा के सिरदल के मध्य नृत्यरत गणेशजी उत्खचित हैं। प्रवेश द्वार की ओर क्रमश: लक्ष्मी, दुर्गा व सरस्वती की शोभायमान मूर्तियां हैं। प्रवेश द्वार के ऊपरी भाग में पांडव परिवार द्वारा शिवपूजन का शिल्पांकन अप्रतिम है। महाभारत में स्वर्गारोहण के पूर्व पांडवों द्वार महादेव के पूजन का प्रसंग मिलता है। संभवत: यह उसी का दृष्यांकन हो। पांडव की मूर्तियों के मध्य महिष की पीठ पर शिवलिंग की स्थापना है। दोनों पाार्श्व ऋषिगण  पूजा की मुद्रा में है। पाण्डवों भ्राता अपने आयुधों के साथ अंकित है। यहां देवी द्रोपती व माता कुन्ती भी उपस्थित हैं। नीेचे पट्टिïका में इनका नामोल्लेखभी है, जो सुस्पष्टï एवं पठनीय है। माता कुन्ती का नाम यहां च्च् कोतमा ज्ज् अंकित है। यहां विचारणीय तथ्य यह है कि कुछ पुरातत्ववेत्ताओं ने महिष मूर्ति को नंदी माना है जबकि वह मूर्ति स्पष्टïत: महिष की ही परिलक्षित हो रही है। महिष की पीठ पर शिवलिंग की स्थापना और पांडव परिवार द्वारा उसकी पूजा - प्रतिष्ठïा कब की गई ? यह अन्वेषण का विषय है।
मंदिर के गर्भगृह में ग्रेनाइट प्रस्तर से निर्मित बड़ी जलहरी है। जिसमें शिवलिंग स्थापित है, परन्तु यह शिवलिंग मूल प्रतीत नहीं होता। क्योंकि इसकी आकृ ति जलहरी के अुरूप स्वभाविक नहीं लगती है। शिवलिंग की जलप्रवाहिका उत्तर की ओर है। गर्भगृह की दीवारें सादी, अलंकरण विहीन है। गर्भगृह की पश्चिमी भित्ती पर आले में करबद्ध नारी प्रतिमा है। लोग जिसकी पूजा पार्वती के रूप में करते हैं। गर्भगृह के चारों कोनों में अलंकृत स्तंभ है। तीन भित्तियों पर छ: भारवाहकों की प्रतिमाएं हैं। ऊपर का शीर्ष भाग पाँच वृत्ताकार भागों में विभक्त हैं जो शीर्ष की ओर क्रमश: संकीर्ण होते गये हैं। गर्भगृह के केन्द्रीय शीर्ष पर पूर्ण विकसित कमल का अलंकरण है। यह अलंकरण बड़ा दर्शनीय और चित्ताकर्षक है।
मंदिर का वाह्यï शिल्प अतुलनीय और अद्वितीय है। इसमें भिन्न - भिन्न विषयों और भाव - भंगिमाओं से युक्त मूर्तियां उत्कीर्ण हैं। मंदिर का अधिष्ठïान, जंघा, शिखर व आमलक अत्यंत ही अलंकृत है। मंदिर की जगती भूमि पर ही निर्मित है। अधिष्ठïान के प्रथम भाग में ताड़ पत्रों व पत्रावलियों का अलंकरण है। द्वितीय भाग में प्रथम गजथर हैं जिसमें हाथियों को गतिशील मुद्रा में अंकित किया गया है। कहीं हाथी युद्ध की मुद्रा में है तो कहीं तरू पल्लवों के साथ क्रीड़ारत। कुछ दृश्यों में शिकारियों द्वारा हाथियों के शिकार का दृश्य है गजथर के ठीक ऊपर हय अर्थातï् अश्वथर है। इस थर में विभिन्न मुद्राओं में अश्वरोहियों को अंकित किया गया है। अश्वरोही हाथ में तीर - कमान, तलवार, भाला आदि धारण किये हुए हैं। अश्वथर में कुछ मिथुन मूर्तियां भी उत्कीर्ण हैं। इन प्रस्तर खंडों में शिल्पकला का अद्भूत नमूना विद्यमान है। अश्वथर के ऊपर नरथर है। नरथर में स्त्री - पुरूष की विभिन्न भाव - भंगिमाओं के साथ - साथ रामायण व कृ ष्णलीला से संबंधित दृश्यों का सजीव शिल्पांकन है। दक्षिण दिशा में कृष्ण द्वारा कालिया नाग का मर्दन, गोर्वधन पर्वत का धारण तथा त्रिभंग मुद्रा में बंशीवादन की मनोहरी दृश्यावलियां हैं। कुछ मिथुन मूर्तियां भी हैं। पश्चिम दिशा के नरथर में मैथुन क्रिया में रत मिथुन मूर्तियों तथा मल्ल युद्ध आदि का अंकन है। उत्तर दिशा में रामलीला से संबंधित चित्रण है। बालि - सुग्रीव युद्ध, बालि वध, अशोक वाटिका में शोकमग्न सीता, स्फटिक शिला पर बैठे राम लक्ष्मण के सम्मुख करबद्ध हनुमान तथा वानरों का नृत्य संगीत आदि का सहज दृश्यांकन इस मंदिर के कला वैभव को द्विगुणित करता है।
मंदिर के जंघा भाग में स्तंभाकृतियां नौ - नौ भागों में विभक्त है। प्रस्तर खंडों की जुड़ाई इतनी कुशलतापूर्वक की गई है कि खंडों में विभक्त होने के बावजूद ये प्रस्तर खंड एक ही शिलाखंड के रूप में प्रतीत होते हैं। इनमें उत्कीर्ण मूर्तियों की भव्यता व अंकन दर्शनीय है। इस भाग में अनेक देवी देवताओं, दशावतार, जीवन - जगत से जुड़े पहलुओं जैसे - नवयौवना, स्तनपान कराती मामा, प्रेमालाप करते नर - नारी, गदाधारी व धनुषधारी सैनिकों आदि की सुन्दर मूर्तियां उत्खचित है। उपरोक्त शिल्पांकन तत्कालीन समाज की स्थितियों और मानवीय संबंधों का प्रकटीकरण करते हैं। जंघा में आलों का भी निर्माण हुआ है। जिसमें केवल तीन आलों में काल भैरव, सती स्तंभ व महिषासुर मर्दनी की भव्य मूर्तियां है। शेष सात आले रिक्त हैं।
मंदिर का शिखर भाग भी अनेक अलंकरणों से परिपूर्ण है। शिखर के निचले भाग में तीनों दिशाओं उत्तर, पश्चिम व दक्षिण में एक - एक मंदिर का शिरांग आमलक कलश निर्मित है। जिनमें मूर्तियों के तीन थर है। अश्वरोही थर, नरथर में कृष्ण की बंंशीवादन में लीन सम्मोहित करती मूर्तियां व तृतीय थर में नायिका की दो मूर्तियां है। शिखर के शीर्ष भाग के चारों कोनो में देवपुरूष उत्कीर्ण हैं। शीशपर पकड़ी बांधे गंभीर भाव लिये ये मूर्तियां बड़ी भव्य हैं। इसके साथ ही शिखर में ज्यामितीय आकृतियों की बहुलता है। शिखर के शीर्ष पर वृत्ताकार आमलक संपूर्ण मंदिर को भव्यता प्रदान करता है। इस आमलक के ऊपर क्रमश: पाँच लघु आमलकों की श्रृंखला के पश्चात प्रस्तर कलश स्थापित है।
अद्भुत कलात्मक व अलंकरण युक्त ये मूर्तियां इस मंदिर के वैभव हैं, और यह मंदिर वैभव है इस अंचल का, इस जिले का और सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ का। जहाँ पुरातात्विक संपदा आज संरक्षित और सुरक्षित रूप में कला - संस्कृति और इतिहास का गौरव गान कर रही है। प्रस्तरों में उत्कीर्ण मूर्तियां हमारी आस्था, श्रद्धा विश्वास और हमारे जीवन के विभिन्न क्रिया व्यवहारों तथा भाव - भंगिमाओं के गीत गा रही हैं। ये पाषाण सही, पर बोलते हैंं। जीवन में मधुरस घोलते हैं। यहां अंजान शिल्पियों ने अपनी भावनाओं और कल्पनाओं को हथोड़े व छेनी के माध्यम से प्रस्तर खंडों में उत्कीर्ण कर कला को अमर कर दिया है। जिसे विश्वास न हो, वे यहां आये, देखे - सुने और अनुभव करे। यहां पाषाण बोलते हैंं।
गण्डई - पंडरिया,जिला - राजनांदगांव ( छ.ग.)

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