इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

बुधवार, 11 सितंबर 2013

सुरहोती के दीया बरगे

देवलाल सिन्हा
सुरहोती के दीया बरगे,
अंजोर होगे गली खोर।
आही अंगना मं लक्षमी दाई, जगर - बगर घर कुरिया हे।
धान हरहूना मिंजागे भइया, माई लकठा नई धुरिहा हे॥
दिन बुड़गे, मुंधियार परगे, दीया बरगे चारो ओर।
सुरहोती के दीया बरगे, अंजोर होगे गली खोर॥
दूसर दिन देवारी के मानय, बहिनी मन हा भाई दूज।
चाऊंर चंदन माथे म टीके चरन ल धोके पीये दूद॥
बहिनी के बीपत हटगे, राखी म लेबे काहय सोर।
सुरहोती के दीया बरगे,अंजोर होगे गली खोर॥
गऊ माता ल खिचरी खवाये, घरो घर चूरे कोहड़ा कोचई।
हांका पारे बरदीहा मन अऊ, गाय ल बांधय ओहा सोहई॥
कोसटऊंहा धोती परगे, हाना गहीश गावय जोर।
सुरहोती के दीया बरगे,अंजोर होगे गली खोर॥
मातर होय खइरखा डांड़ म घोन्डईया काछन मारत हे।
कुकरा ल छोंड़े बीच खरखा म, गइया खुर मारत हे॥
खुंडहर मेर दीया  हूम धरके, मान म नरियर देवय फोर।
सुरहोती के दीया बरगे, अंजोर होगे गली खोर॥
इतवारी बाजार, खैरागढ़, जिला - राजनांदगांव ( छ.ग.)

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