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इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

शुक्रवार, 29 फ़रवरी 2008

व्यंग्य - विधा और शैली

प्रो. बांके बिहारी शुक्ल
साहित्य में सत्य शिव एवं सुन्दर का समन्वय रहता है। शिव तत्व की साधना दो प्रकार से होती है। एक यथार्थवादी ढंग जैसे दर्पण में हम अपना चेहरा देखकर सुधार करते हैं। दूसरा आदर्शवादी दृष्टिï जिसमें मान्य आदर्शों के आधार पर अनुकरण करने की प्रेरणा मिलती है।
साहित्य को मुख्यत: दो विधाओं में पढ़ा जाता है, पद्य और गद्य। इनमें भी बहुत सी उपविधायें हैं। गद्य के अंर्तगत एक विधा व्यंंग्य साहित्य है इससे समाज का हित साधन यथार्थवादी ढंग से होता है।
सामान्य बातचीत में भी हम सभी व्यंग्य का प्रचुर प्रयोग करते रहते हैं। जो व्यक्ति अपनी भाषा में इसका जितना अधिक प्रयोग कर पाता है वह समाज में वाकपटु माना जाता है एवं उसे लोकप्रियता भी मिलती है। छत्तीसगढ़ी में एक लोकोक्ति है खाय बर बासी, बताये बर बतासा अर्थात करनी और कथनी में बहुत भेद रहता है।
यद्यपि हिन्दी में व्यंग्य साहित्य आधुनिक काल की देन है तथापि किसी न किसी रूप में साहित्य उदïï्भव काल से रहा है क्योंकि यह कथ्य ही नहीं शैली भी है। वचन वक्रता यह वक्रोक्ति इसके लिए उपयुक्त माध्यम है। संस्कृत साहित्य शास्त्र में आचार्य कुन्तक ने इसे वकोक्ति : काव्यं जीवितमï् कहकर काव्य की आत्मा मान लिया था।
व्यंग्य साहित्य के भी दो रूप हो सकते हैं 1. विध्वंसात्मक या खंडनात्मक व्यंग्य 2. रचनात्मक व्यंग्य। कबीर का पद - मूड़ मुड़ाये हरि मिलै .... भेंड़ न बैकुंठ जाय प्रथम कोटि का व्यंग्य है।
डां. नामवर सिंह ने सम्प्रेषण की समस्या को आधुनिक साहित्य की प्रमुख समस्या माना है। महाभारत के युद्ध के बाद भी यह समस्या उत्पन्न हुई थी। महर्षि ब्यास कहते हैं - उर्द्दबाहु विरोभ्येष न श्रुणेति कहाचन। आज की जटिल मनोवृत्ति को भी अमिधा में कह पाना कठिन होता जा रहा है इसीलिए व्यंग्य साहित्य की लोकप्रियता बढ़ रही है।
डां. रामस्वरूप चतुर्वेदी कहते हैं कि विकासशील संस्कृति के तत्वों के अनुरूप अपने आप को परिष्कृत करते हुए आप को एक काव्यात्मक भाषा तथा भविष्य प्रक्षिप्त दृष्टिï के लिए अर्थ गर्भ शब्दों का प्रयोग वांछित है। व्यंग्य इस हेतु उपयुक्त है। वैज्ञानिक और मशीनी संस्कृति तथा धार्मिकता का विघटन इसके कारण है। आधुनिक संवेदना में लेखक का नया सौन्दर्य बोध विशेष महत्व रखता है। केक्टस नई सौन्दर्य चेतना का प्रतीक है। व्यंग्य इसका अच्छा माध्यम है।
क्या मानव चिंतन मानव की भौतिक क्रियाशीलता से निरपेक्ष होता है? असंगति तब पैदा होती है। जब प्रतिभा और व्यक्ति को देशकाल निरपेक्ष मान लिया जाता है। प्रतिभा का दबाव कलाकार के भीतर एक वृहद असंतोष से ही उसका संघर्ष प्रारम्भ होता है। व्यंग्य साहित्य इसका ही परिणाम है। आजकल औसत बुद्धिजीवी अजनवीपन, अकेलेपन और संत्रास की माला जप रहा है और चूंकि अपने संदर्भों से असम्पृकृ है। एक धुरीहीनता के शिकार है। आप भारतीय एक स्वप्र भंग से गुजरा है और जीविकोपार्जन की सुविधा और सुरक्षा के लिए वह तथाकथित वैचारिक स्वतंत्रता और रचना आस्था तक छोड़ने को मजबूर है। इसका प्रतिबिंब व्यंग्य साहित्य में दिख पड़ता है।
आज का संसार जितना भी छोटा हो किंतु है बड़ा जटिल। इस जटिलता को व्यक्त करने के लिए अब सरल भाषा सक्षम नहीं है। छत्तीसगढ़ के गांवों में भी किसी व्यक्ति की कुटिलता को व्यक्त करने के लिए कहते हैं - हंसिया बरोबर सीधा हे। एक नजर में यह वाक्य सिधाई को व्यक्त कर रहा है। चूंकि हंसिया का स्वभाव ही टेढ़ा है अस्तु अंतत: टेढ़ेपन को ही इंगित किया जा रहा है। आज की जटिलता को व्यक्त करने के लिए भाषा व्यंग्य की ही हो सकती है।
प्रसिद्ध व्याकरणाचार्य भतृहरि ने लिखा है - अनादि निधान बह्रïा शब्द एव विर्वतायें। यह शब्द अमिधा से कब लक्षणा शक्ति में और कब व्यंग्रा शक्ति में प्रयुक्त होता है इसकी कहानी बहुत जटिल है। इसकी जटिलता हमारे मन की जटिलता के इतिहास से जुड़ा है। उपनिषद की भाषा बहुत सरल है यद्यपि उसकी व्याख्या गूढ़ है। किन्तु आज की भाषा बहुत गूढ़ है भले ही भाव साधारण हो। आधुनिक अमरीकी कविता का प्रारम्भ व्हिटमेन से होता है जिन्होंने भाष में व्यंग्य को अपनाया। लीब्ज आफ ग्रास में जिस भाषा का प्रयोग किया गया है वह सम्प्रेषण की चुभती विद्या है। इसमें कवि की द्वन्द्वात्मक मानसिकता, उसका राजनीतिक स्वप्रभंग, अंर्तदृष्टïा होने का उसका दावा, अतीत के प्रति उसका बदला हुआ रूख कलात्मक पूर्णता की उसकी बदली हुई धारणा और उसके बोध में होने वाले परिवर्तन सबने मिलकर एक नये संश्लेषण को जन्म दिया। अमरीकी कवियों को अपनी विदग्धता और मौलिकता पर अधिक विश्वास है। इसलिए कई बार वे एक नई भाषा का अन्वेषण करता है और वह व्यंग्य होता है जो कभी - कभी पुनर्विन्यास और विस्फोट पैदा करता है।
मानव मन के जटिल भावों को जो कभी - कभी परस्पर विरोधी भी होते हुए एक साथ उदय हो जाते हैं। उन्हें व्यक्त करना बहुत कठिन होता है। उसके लिए अर्थगर्भ शब्दों का व्यंजना शक्ति युक्त वाक्यों का या दूसरे शब्दों में कहे तो व्यंग्य विद्या का प्रयोग अपेक्षित होता है। जैसे कालिदास के कुमार संभव नामक महाकाव्य में भगवान शिव ब्राम्हा्रण का वेश बनाकर पार्वती के प्रेम की परीक्षा लेने जाते है वहां शिव की निंदा करते है। पार्वती बहुत देर तक प्रतिवाद करती है किंतु ब्राहा्रण के चुप न होने पर वहां से उठकर चली जाना चाहती है किंतु तत्काल ब्राहा्रण शिव के रूप में प्रकट हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में पार्वती न तो रूक पाती है और न जा पाती है।
एक अन्य प्रसंग में सप्तर्षि गण पार्वती के विवाह का प्रस्ताव लेकर हिमांचल के घर जाते है। वहां पार्वती भी बैठी हुई है। अपने विवाह की चर्चा सुन वह वहां से बाहर जाना चाहती है और उत्सुकता वश वहां रहना भी चाहती है ऐसी स्थिति का वर्णन करते हुए कवि लिखते हैं - लीला कमल पत्राणि गणयामास पार्वती।
ऐसी विध या ऐसा व्यंग्य हर बोली और भाषा में व्यवह्रïत होता है। छत्तीसगढ़ी में अधिकांश मुहावरे इसका उदाहरण है जैसे - नाम धरे बर बलिहार सिंह अउ भरना पटाये बर दू आना...।
व्यंग्य की सबसे बड़ी विशेषता उसके गागर में सागर समाने की वृत्ति है। या दूसरी भाषा में कहे तो स्थिति स्थापकत्व का गुण कह सकते हैं। अपने गांव में गम्मत देख रहा था। एक नर्तक बहुत अच्छा नाच रहा था। एक किशोरवय बालक टिप्पणी करता है - अरे ... ददा रे ... ऐसना नाच कभू नइ देखे रहेंवं। इसे सुनकर पास बैठे बूढ़े ने कहा लखुर्री सावन म जनमिस अउ भादो के पूरा बाढ़ ले देखके कहथे ऐसना पूरा कभू नइ देखे रहेवं। अर्थात बहुत कम समय में बहुत बड़ी टिप्पणी नहीं दे देनी चाहिए।
व्यंग्य की मार इतनी पैनी होती है कि उसे बर्दास्त करना हर किसी के बस की बात नहीं होती जर्मनी में हिटलर के समय वहां का एक नाटक का विदूषक एक वाक्य कहता था - छेल  ... उस मूर्ख को क्या पता था ? लोग हंसते लगते थे। लोग हंसने लगते थे क्योंकि आगे हिटलर का नाम आता था क्योंकि उन दिनों एक नारा आम था - छेल हिटलर ... अर्थात हिटलर की जय हो। जिसे हिटलर बर्दास्त नहीं कर पाया और उसे व्यंग्य करने के अपराध में दंडित किया गया।
आचार्य भतृहरि ने शब्द के चार भेद बताया है - परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी। सबसे सुबोध वैखरी है जिसमें अमिधा गुण होता है व्यंग्य वैखरी से कुछ ऊपर मध्यमा के निकट ही वाणी हुआ करती है जिसमें केवल शब्दार्थ नहीं होता। उसमें कुछ अधिक समझने और बूझने को होता है। आचार्य जी ने शब्दयोग का उल्लेख किया है जहां ध्यानावस्थित होकर साधारण शब्दों में अनकही संकेतों का बोध कराया जाता है।
कबीर की वाणी की समीक्षा करते हुए डां. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है कबीर वाणी के डिटेक्टर थे। भाव भाषा में सीधे - सीधे आ गये है तो ठीक अन्यथा वे दरेरा निकाल देते हैं।
बी - 5 नेहरू नगर
बिलासपुर 6छ.ग.8

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