इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

बुधवार, 4 सितंबर 2013

वह जो साथ है


रामशंकर चंचल
गाँव की
पगडंडी पर बैठी
मेरी छोटी - छोटी आँखें
ताक रही थी, विराट आसमान
तो कभी, दूर - दूर तक फैली
वसुन्धरा को
जिसका कोई अन्त नहीं था
सोच रहा था कितनी बड़ी दुनिया है
सोच ही नहीं सकता
फिर क्यों सोच रहा हूं
इस दुनिया में, दौड़ लगा
पा लूं अपना लक्ष्य
मंजिल, अकेले ही
सचमुच बहुत दुर्लभ है यह
सोच घबरा जाता हूं
तभी दूर, सुदूर, नभ में
वह मुस्काया
अनायास सारी निराशाएँ
कुंठाएँ गायब थीं
सोच रहा था अकेला क्यों
वह जो साथ है
यही सोच दे रही थी
अजीब ऊर्जा ताकत
और मैं उसे समेटे
लग जाता हूं अपने
कर्म साधना श्रम में
निष्ठïा आत्मविश्वास लिए
सदैव उसे अपने संग
मुस्क ाते साथ देते है
जिसे सब
ईश्वर कहते है।
ईश्वर से
ईश्वर से
जब - जब
जिन्दगी उदास होती है
आ जाता हूं
तेरे दरबार में
तुझे देख ताकत
महसूस होने लगती है
भीतर ही भीतर
पता नहीं तुझसे क्या रिश्ता है ?
जो हक पूर्वक
मांगता हूं तुझसे
चंद खुशियाँ
ताकि जिन्दगी फिर
दौड़े, भागे अपने
नित्य कर्मों में
मैं जानता हूं
तेरे पास बहुत दिनों
के बाद आया हूं
क्या करूं
तेरी ही दी
जिन्दगी में व्यस्त था
पर तुझे कभी भूला नहीं
आज फिर मन हुआ
तेरे दर्शन पा लूं
एक अजीब शक्ति
आत्मविश्वास
145, गोपाल कालोनी
झाबुआ-

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें