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मंगलवार, 10 सितंबर 2013

बिरछा ल झन काट

- पीसीलाल यादव  -
बिरछा ल बचा ले मितान... सिरतोन गउ ईमान,
तैं बिरछा ल झन काट रे, तैं बिरछा ल झन कांट बंधुवा
बिरछा तो आय भगवान, सिखोथे ग किसान
तैं बिरछा ल झन काट रे ...।
रूख राई रहि तब तो बादर ह बरसही
नई ते दुनिया ह पानी बिना तरसही
रुख हवय तभे तो चलत हवय सांसा
जीयत हे जीव - जन्तु, जीयत हवय आसा।
बिरछा तो आय हमर जान, तैं झन हो बेईमान।
तैं बिरछा ल झन काट रे ...।
कार्बन डाइआक्साइड ल लेथे अपन मन
फूल - फर देथे हमला, देथे गा आक्सीजन।
दुनिया म भला कोन हवय जी अइसन?
महुरा ल पी के अपन, देथे पर ल जीवन।
पेड़ ह बचाये ग परान, तैं कर ओखर गुमान
तैं बिरछा ल झन काट रे ...।
बिरछा बचा के जग - जिनगी ल बचा ले
नवा पीढ़ी बर कुछु तो पुन तैं कमा ले
हरियर डोंगरी - पहार, हरियर खेत - खार
बिरछा तो आय संगी जिनगी के सिंगार
कहिथे जी वेद अउ पुरान, कर पुरखा के मान
तैं बिरछा ल झन काट रे ...।
आमा अमली, बर पीपर, सरई - सईगोना
कउहा - मउहा तेंदू - चार, अमरीत के दोना
चिरई - चिरगुन फुदक के, गाथे डारा- डारा
दाई- ददा कस पेड़ हवय, जिनगी के सहारा
बिरछा तो आय हमर मान,करथे ग कल्यान
तैं बिरछा ल झन काट रे ...।
साहित्य कुटीर, गंडई पंडरिया, जिला -राजनांदगांव छ.ग.

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