इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

गुरुवार, 12 सितंबर 2013

साकेत का वार्षिक साहित्यिक समारोह एवं वैचारिक गोष्ठी संपन्न

साकेत साहित्य परिषद् सुरगी, जिला राजनांदगाँव द्वारा अपनी स्थापना के चौदह वर्ष पूर्ण होने पर  वैचारिक गोष्ठी एवं सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। विषय था - '' लोक-साहित्य में मिथक '' कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रख्यात प्रगतिवादी समीक्षक एवं साहित्यकार डॉ. गोरेलाल चंदेल, खैरागढ़, ने फेबल ( Fable ) मिथक ( Myth ) और लीजेण्ड, में अंतर बताते हुए कहा कि   हिन्दी शब्दकोश के लिए मिथक नया शब्द है। मिथक शोषित वर्ग द्वारा अपने शोषण का प्रतिकार करने के लिए रची गई कहानियाँ है जिसमें समाज का शास्त्र और समाज दोनों विद्यमान रहते हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए सुप्रसिद्ध गीतकार एवं साहित्यकार डॉ. जीवन यदु, खैरागढ़, ने कहा कि मिथक का अभिप्राय मिथ्या भी होता है क्योंकि इनमें घटित घटनाएँ मिथ्या होती है और तर्क व ज्ञान के द्वारा इसकी व्याख्या संभव नहीं है परंतु इसके द्वारा ज्ञान की तार्किक व्याख्या अवश्य की जाती है। मिथकों की रचना इसीलिए की गई हैं। लोककला व लोककथा के मर्मज्ञ डॉ. पीसी लाल यादव ने कहा कि न सिर्फ  हमारा लोक साहित्य, अपितु पौराणिक साहित्य भी मिथकों से भरे हुए हैं। मिथक में लोक का ज्ञान छिपा रहता है। इसमें रहस्यमयी प्राकृतिक घटनाओं की लोकव्याख्या निहित होती है। प्राध्यापक डॉ. शंकरमुनि राय ने कहा कि किसी एक भाषा या एक क्षेत्र के ऐसे बहुत से मिथक हैं जो देश के अन्य हिस्सों में भी पाए जाते हैं। समाज में ऐसे मुहावरे और लोकोक्तियाँ भी कहे जाते हैं जो मिथकों पर आधारित होते हैं। जाहिर है, मिथकों का सीधा संबंध समाज से है। श्री यशवंत मेश्राम ने कहा कि लोक-समाज मिथकों के द्वारा अपने शोषण का विरोध करता है।
कार्यक्रम के प्रारंभ में अपने आधार वक्तव्य में परिषद् के संरक्षक एवं कथाकार श्री कुबेर ने मिथकों का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए मिथक, मिथकों की उत्पत्ति एवं समाज में मिथकों की उपयोगिता को रेखांकित करते हुए कहा कि मिथकों की रचना लोक-समाज के बौद्धिक वर्ग ने ही प्रकृति की अजेय, विकट व रहस्यमयी शक्तियों की अभ्यर्थना हेतु अथवा प्रकृति की ऐसी ही किसी घटना की व्याख्या करने के लिए अथवा प्रकृति की सुकोमल, विश्वकल्याणकारी स्वरूप से प्रेरित होकर अनायास ही किया होगा परंतु बौद्धिक वर्ग द्वारा रची गई इस तरह की कोई भी कहानी लोक-स्वीकार्यता और लोक-मान्यता प्राप्त करने के पश्चात् ही मिथक बन पाई होगी। ज्ञान के आधार पर मिथकों की रचना नहीं हुई है अपितु मिथकों के आधार पर ज्ञान का विकास अवश्य हुआ है। हर समाज, हर भाषा, हर जाति, हर देश का अपना-अपना मिथक होता है। मिथकों की रचना समाज की मान्यताओं और परिस्थितियों के अनुसार ही हुआ होगा।
कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध लोक- संगीतकार श्री खुमान साव, साहित्यकार आचार्य सरोज द्विवेदी, श्री सुरेश सर्वेद (साहित्यकार एवं संपादक, विचार वीथी) तथा हास्य कवि श्री पद्म लोचन शर्मा ' मुँहफट ' ने भी अपने विचार व्यक्त किये। इस अवसर पर परिषद् के सदस्य श्री कुलेश्वर दास साहू को  ' साकेत सम्मान-2013 ' से सम्मानित किया गया।  कार्यक्रम में ' लोक साहित्य में मिथक ' विषय पर केन्द्रित परिषद् की स्मरिका ' साकेत - 2013 '  का विमोचन भी किया गया।
कार्यक्रम में भिलाई से पधारे साहित्यिक संस्था सिरजन के प्रांतीय अध्यक्ष श्री लोकनाथ साहू तथा संयोजक श्री दुर्गा प्रसाद पारकर, राजनांदगाँव से पधारे श्री चन्द्रशेखर शर्मा, साकेत साहित्य परिषद् के सभी सदस्यों सहित बड़ी संख्या में साहित्यानुरागी एवं ग्रामीणजन उपस्थित थे।
कार्यक्रम का संचालन परिषद् के सलाहकार श्री ओमप्रकाश साहू ' अंकुर ' तथा सचिव श्री लखनलाल साहू ' लहर ' ने किया। आभार प्रदर्शन परिषद् के अध्यक्ष श्री थनवार निषाद ' सचिन ' ने किया।

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