इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

बुधवार, 11 सितंबर 2013

मैने सोचा मोहब्बत पाना

जितेन्द्र कुमार साहू ' सुकुमार'
मैने सोचा मोहब्बत पाना मुश्किल होगा।
पर आसान है, लोग रंग रूप में ढाले होते हैं॥
हम जैसे दिलवालों को कुछ नहीं मिलता।
प्यार मिलता उन्हें जो मन के काले होते हैं॥
लूट लेते हैं वे सब कुछ इतनी आसानी से।
जो दिखने में अक्सर भोले - भाले होते हैं॥
चश्मा पहनना मेरी मजबूरी नहीं तजुर्बा है।
वो क्या जानेंगे जो दूसरों पर बुरी नीयत पाले होते हैं॥
इंसान से अब क्या डरने लगे हैं शैतान भी।
क्योंकि ये गिरगिट से दो कदम आगे होते हैं॥
आँसू बहाते रहे
तेरी याद में हर वक्त आँसू बहाते रहे,
तन्हाई की आग में दिल को जलाते रहे।
टूटे हुए साहिल की कोई मंजर नहीं होता,
पी चुका हूं इश्क का जहर, मौत का डर नहीं होता
जन्नत सी जहाँ को अपनी, जहन्नुम बनाते रहे,
तेरी याद में हर वक्त आँसू बहाते रहे।
मेरे सपने, चाहत जल कर खाक हो गए,
प्यार किया तो दूनियां की नजरों में पाप हो गए
अपने अरमानों की चिता में आग लगाते रहे,
तेरी याद में हर वक्त आँसू बहाते रहे।
जख्मों से मिटने लगा इस च्च् सुकुमार ज्ज् का वजूद,
अपना यहां कोई नहीं,सब पराया नजर आते रहे,
तेरी याद में हर वक्त आँसू बहाते रहे।
चौबे बांधा  ( राजिम )
जिला - रायपुर ( छ.ग .)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें