इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

बुधवार, 4 सितंबर 2013

साला छत्‍तीसगढि़या

कुबेर
""स्कूल खुले महिना भर हो गे हे, लइका हा दिन-रात रेंघ मताथे । तंय  का सुनबे, तोर कान म तो पोनी गोंजा गे हे । पेन-कापी लेय  बर कहत हे, ले नइ देतेस ।'' देवकी हा अपन नंगरिहा रतनू ला झंझेटिस ।
रतनू हा कथे- ""हित लगा के दू कंवरा बासी ला तो खावन दे भगवान । पेन-कापी भागत थोरे हे । कालिच  बांवत उरकिस हे । हाथ म एको पइसा नइ हे । खातू-दवाई घला अभीच  लेना हे । निंदाई-कोड़ाई ला तो आन साल जुर मिल के कर डारत रेहेन, फेर पर साल ले तो बन-झार के मारे खेत हा पटा जाथे । एसो कोन जाने का होही । बनिहार लेगे बर झन परे । इही ला कहिथे, दुबबर बर दू असाड़ । करंव ते का करंव, तिंही बता ?''
देवकी से कुछ कहत नइ बनिस । अपन गलती ला संवास के वो हा चुप हो गे । थोरिक देर दुनो झन एक दूसर के रोनहू बानी ला, करलई अकन देखत रहिगे । अइसन में कइसे बनही ? देवकी हा अपन जी ला कड़ा करके कहिथे- ""जउन होना होही  तउन होवत रहही, चिंता काबर करथो, हित लगा के बासी तो खा लेव । महूँ अड़ही, जकही-भूतही सरीख बिना गुने, कुछ के कुछ कहि परथों, नराज मत होय  करो ।''
रतनू कहिथे- ""काबर नराज होहूँ राजेस के मां । तोला का सुख देवत हंव, कि तोर बर नराज होहंव । फेर का करंव, एक फिकर छुटे नहीं कि दस ठन फिकर आगू ले मुंह फार के खड़े रहिथे । ऐकरे सेती, टांठ भाखा निकल जाथे ।''
गोसंइया के मुंह ले अतेक सुघ्घर मया के गोठ सुनके देवकी के मन गदगद होगे । फेर घर के जुच्छा कोठी के सुरता करके अऊ रतनू के अइलहा मुंहरन-बरन ला देख के ओखर आंसू झरे लगिस । अंच रा के कोर म ढ़रत आंसू ला कलेचुप पोंछ के कहिथे- ""कइसे तुंहर बानी-बरन हा अइलहा-अइलहा दिखथे ? जर-बुखार तो नइ धरे हे ? सूजी-पानी लगवा लेतेव ।''
""दू-चार दिन हो गे राजेस के मां, सुस्ती-सुस्ती कस लागथे । गोड-हाथ घला पिराथे । नांगर-बखिर के दिन म का आदमी ला कहिबे , का बइला भंइसा ला कहिबे । सबके रगड़ा टूट जाथे । हKता-पंद्रा दिन के तो बात रहिथे । फेर तो अरामे अराम हे । तंय  फिकर काबर करथस । मोला कुछू नइ होय  हे ।'' रतनू अपन गोसाइन ला ढ़ांढ़स बंधाइस ।
देवकी झिच कत-झिच कत लटपट किहिस- ""नांदगांव वाले साहेब बाबू हा काली संझा बेरा फटफटी म आय  रिहिस । कहत रिहिस कि भइया अपन खेत ला बो डरिस होही त हमरो खेत ला बो देतिस । हर साल तुंहीच  मन तो कमाथो । भइया के रहत ले मंय  हा कोनो दूसर ला नइ तियारंव ।''
""तब तंय  का कहेस राजेस के मां ।'' रतनू हा टप से पूछिस, जइसे रस्ता च लत बटलोही मिल गिस होय  ।
""का कहितेंव, तुमला पूछे बिना । ऐसो भर हो गे हे, तुंहर देह झुकते जावत हे । वइसने बइला मन घला थक गे हे । सब बात सोंच  के बOा बंधा गे ।'' कहत-कहत देवकी बोटबिटा गे ।
रतनू कहिथे- ""दू-चार दिन भाड़ा फांदे बिना हाथ कइसे क‚ा होही । आज बुधवार ए । बिरसपत, सुकरार अउ सनि‚र, तीन दिन के भाड़ा कमाय  ले राजेस के कापी-किताब के पुरती तो होइच  जाही । इतवार दिन नांदगांव के बजार हरे ।''
""नांदगांव घुमे के सउक लगे हे, नइ कहव, गांव के गंउटिया दुकान म तो घला पेन-कापी बेचाथे । उंहे नइ ले लेहव । किताब तो स्कूल डहर ले मिल गे हे ।'' देवकी हा सुझाव दिस ।
रतनू कहिथे- ""बने कथस राजेस के मां ! पाछू साल गंउटिया दुकान म लेय  रेहेंव । छपे कीमत ले रूपिया-दूरूपिया कम करके देय  रिहिस । पान-बिड़ी के पुरती अउ छोड़ाय  रेहेंव । ये तो छोटे दुकान आय  । नांदगांव के बड़े दुकान मन म लेय  से रूपिया-दू-रूपिया अऊ बच  जाही । इही सोंच  के नांदगांव जाहूँ कहत हंव । तंय  कहिथस घूमे के सउक लगे हे । जब गोठियाबे, उल्टाच  गोठियाबे ।''
""जानत हंव, फेर मोर बर का लाबे ?'' कहिके देवकी हा मुंच  ले हांस दिस ।
रतनू कहिथे- ""नांदगांव के गोल बजार ला ।''
देवकी हा रतनू कोती कनखही देख के जिबरा दिस । रतनू के हिरदे म घलो मया उमड़ गे । कथे- ""कतको साल हो गे, तोर बर पैरपuी अऊ करधन बनाहूँ कहत-कहत । भगवान के किरपा ले, बने-बने पानी-बादर बरस जाही त एसो अवस्य  बनवा देहूँ ।''
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इतवार के दिन रतनू ह बिहिनिया ले नहा धो के, बासी खा के तियार होगे । साय किल के पाछू च Oा पंदरही पहली भरस्ट हो गे रिहिस । मिÍी तीर बनाय  बर लेगे रिहिस । टैर-टूब कंद गे हे, कहिके मिÍी हा नइ बनाइस । नवा टैर-टूब बर अढ़ई-तीन सौ रूपिया बताइस, तंहले रतनू के मुंह बंधागे । अब का करे ? बड़े भइया के साइकिल ला मांगे बर सोंचि स, फेर भऊजी के सुभाव देखत वोकर हिम्मत नइ होइस । आखिर म रेंगत जाय  के पOा करिस । न उधो के लेना, न माधो के देना । झोला-झांगड़ धर के जइसने घर ले निकले के होइस, राजेस संग पड़गे । रेंध मता दिस । कहे लागिस- ""हम एको घांव नांदगांव देखे नइ हन, हम तोर संग जाबो । हम जाबो, त हमर मन के लेबो । पाछू साल तंय  उल्टा-पुल्टा ले देय  रेहेस ।''
देवकी के पलोंदी पा के राजेस अउ जिद करे लागिस । आखिर म रतनू ला मानेच  बर पडिस ।राजेस के खुसी का का पूछना ?
गांव के सड़क म, जेती देखव, ग‰ा च -ग‰ा । रात मा जोरदार पानी गिरे रहय  । ग‰ा मन तरिया कस भरे रहय  । चि खला के मारे च प्पल फदक-फदक जाय  । खिसिया के रतनू हा दुनो झन के च प्पल मन ला हाथ म धर लिस । राजेस के भाग खुलगे । रतनू हा सुखिा-सुखिा देख के रेंगय , त राजेस हा डबरा के पानी म च भक-च भक रेंगय  । कभू-कभू त खेले बर रम जाय  ।
सड़क के दूनो बाजू जतिक दुरिहा ले देखव, खेतेच -खेत दिखत रहय  । कतको खेत जोता-बोंवा गे रहय  । कतको म अभी घला नांगर च लत रहय  । कतको खेत के धान पिकियात रहय  । रतनू के मन खेत-खार म लगे रहय  । राजेस के सुरता आ गे । पाछू लहुट के देखिस, राजेस पानी खेले म भुलाय  रहय  । रतनू खिसियाइस- ""झपकिन आ, खेलत मत रह । पानी बादर के दिन ।'' राजेस दउड के आइस ।
बड़ मुस्किल से बड़े सड़क म पहुंचि न । बड़े सड़क गजब ऊँचा, अबबड़ चाकर, डामर के पOा बनल, चि Oन चांदर रहय  । रतनू हा पाई के डबरा के पानी म गोड धो के, अपन च प्पल ला पहिन लिस । राजेस घला वइसनेच  करिस ।  अब दूनो बाप-बेटा डामर सड़क के डेरी बाजू कोरेकोर रेंगे लागिन । सड़क हा मोटर-गाड़ी के मारे दमदमात रहय  । किसम-किसम के बस, टरक, कार, फटफटी पूछी चाबे-चाबे कभू एती ले भरर् के आय , कभू वोती ले । पें&&... करत एक ठन गजब सुंदर अकन कार सांय  ले उंखर बाजू ले निकल गे । राजेस वोकर नकल उतारिस- ""पीं&&& ।'' तभे आगू डहर ले एक ठन अबबड़ लाम के टरक आवत रहय  । वोमा बड़ भारी मसीन जोराय  रहय  । प‚ासो ठन च Oा लगे रहय  । कनखजूर जइसे टरक ला देख के राजेस हा च कित खा गे । वोकर च Oा मन ला गिने लागिस- एक, दू, तीन, चार.................प‚ीस । आंखी च कमका गे । गिनती घला भुला गे । कन्झा के अपन बाप ला पूछे लगिस- ""बाबू-बाबू, येखर के ठन च Oा हे ?''
रतनू हा लइका के हाथ ला च मच मा के धरे रहय  । अपन डहर खिंचि स । किहिस- ""सड़क ला देख के च ल । च Oा गिने में झन भुला ।''
राजेस हा फेर पूछिस- ""येमा का मसीन जोराय  हे बाबू ?''
""कोनो कोती कारखाना बनत होही । वोकरे होही । विहिचे जावत हो ही ।''
राजेस के मन नइ मानिस । टरक गुजर गे रहय  । दुरिहात टरक ला लहुट-लहुट के देखे लागिस । वोतका म एक ठन बस, पें ....... करत आइस अउ सांय  ले आगू निकल गे ।
राजेस कहिथे-  ""बाबू, बाबू थकासी लग गे, मोटर म च ढ़ के जाबो ।''
रतनू कहिथे- ""टिकिट बर पइसा नइ हे बेटा ।''
""बिन पइसा के नइ च ढ़ाय  ?''        ""तोर अजा बबा नोहे ।''        ""तंय  तो पइसा धरे हस''
""बस वाले बर नइ धरे हंव । तोर पेन-कापी लेय  बर धरे हंव । वोखर ले बांच ही तेखर खाई खजानी खाबो । बस वाले ला काबर देबो ।''
किसम-किसम के मोटर गाड़ी देख के राजेस के मति च कराय  रहय  । थोरिक देर गुनिस । दिमाग नइ पुरिस, तब अपन बाबू ला पूछिस- ""बाबू-बाबू ये मोटर मन काकर होही ?''
रतनू कहिथे- ""बड़े-बड़े आदमी मन के आय  ।''
""हमरो मन ले बड़े ?''
""हाव ।''
अच रज म अपन दुनो हाथ ला ऊपर उचा के राजेस हा कहिथे- ""अतेक बड़े ?''
रतनू - ""भोकवा, वइसन बड़े नहीं । बड़े आदमी माने खूब अकन रूपिय -पइसा वाले आदमी । समझे । हमन तो गरीब आवन ।''
राजेस अपन दुनो हाथ ला आगू कोती लमा के नापे कस करके कहिथे- ""अतिक रूपिया ?''
रतनू  - ""वोकर ले कतको जादा ।''
राजेस - ""अतेक पइसा ओ मन कहां ले पाथे ?''
रतनू - ""भगवान हा देथे ।''
राजेस - "" भगवान हमन ल काबर नइ देय  ?''
रतनू कहिथे  - ""अपन-अपन करम-कमई तो आय  बेटा ।''
राजेस- ""तंहू तो अबड़ कमाथस, रात दिन कमाथस, तब ले भगवान हमन ला बस च ढ़े बर घला पइसा नइ देय  ?''
रतनू राजेस के बात सुन के अकबका गे । कुछू जवाब देतिस, वोतका म असोक गुरूजी ऊंखर आगू म फटफटी ला धम ले रोक के खड़े हो गे । रतनू झकनका के कहिथे- ""राम-राम गुरूजी ।''
असोक गुरूजी- ""राम-राम कका, दूनो बाप-बेटा कहां जावत हो जी ? नांदगांव जावत हव का ?''
रतनू- ""हव गुरूजी, साइकिल पंच र पड़े हे, रेंगत जावत हन जी ।''
असोक गुरूजी- ""रेंगत-रेंगत लइका हा लथर गे हाबे, आवव, मोर संग बइठ जावव ।''
रतनू- ""आप मन ला तकलीफ होही गुरूजी ।''
असोक गुरूजी- ""का के तकलीफ होही ?''
रतनू - ""उपरहा पइसा नइ हे गुरूजी । पिटरोल खरचा कहां ले देहूं आप मन ला ।''
असोक गुरूजी- ""कका, तोला गारी खाय  बर भाय  हे का ? अरे ये पइसा के बात कहां ले आ गे । हमला अतेक बिरान काबर समझत हाबस । अरे हम लोटा धर के अवइया अउ चार साल म बिल्डिंग टेकइया नो हन । तुंहर-हमर, कइ पुरखा के नेरवा इही गांव के माटी म गड़े हे ।''
रतनू कहिथे- ""दूध के जरइया, मही ला घलो फूंक-फूंक के पीथे बेटा । एक घांव सेठ टुरा संग अइसने सोंच  के बइठ गे रेहेंव । च उक म उतार दिस, अउ बीस रूपिया ले लिस । च ना-च बेना बर बंचा के रखे रेहेंव । लइका के मुंह म पेरा गोंजा गे बेटा । विही पाय के कहि परेंव ।''
असोक गुरूजी- ""सही बात आय  कका । हमर मन के मुंह म पेरा गोंजही, तभे तो ऊंखर मन के बिल्डिंग खड़े होही ।''
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दुनो बाप-बेटा गुरूजी के फटफटी  म बइठ के नांदगांव पहुंच  गिन । राजेस कभू फटफटी नइ च ढ़े रहय  , च ढ़ के खुस होगे । उतरत समय  असोक गुरूजी हा कहिथे- ""आफिस जावत हंव, दू बजत ले मोर काम हो जाही । इंही कर अगोरा कर लेहू । आय  हवन, वइसने च ल देबो । राजेस पढ़ई म गजब होसियार हे, ओकर मन पसंद के पेन-कापी ले देबे ।''
बेटा के प्रसंशा सुन के रतनू के छाती गज भर च ौड़ा होगे ।
राजेस के अंगठी धरे-धरे रतनू हा किताब के बड़े दुकान कोती जावत रहय  । राजेस के धियान सड़क के दूनो बाजू सजे-धजे किसम-किसम के दुकान अउ तिमंजिला-च ौमंजिला बड़े-बड़े बिल्डिंग मन कोती रहय  । वो हा सोच त रहय  कि अतेक ऊंच -ऊंच  मकान ला कइसे बनाय  होही, इंहा रहवइया मन कइसन होत होही ? राजकुमारी के कहानी के सुरता आ गे कि कइसे वो हा सतखंडा महल के झरोखा ले राजकुमार ला देखत रहय  । वोतका बेरा एक झन सेठाइन टुरी एक ठन बिल्डिंग के खिड़की ले झांकत रहय  । राजेस अपन बाबू ला पूछथे- ""बाबू-बाबू वो झांकत हे तउने हा राजकुमारी आय  का ?''
रतनू- ""कोन राजकुमारी ?''
राजेस- ""काली रात म कहानी सुनात रेहेस तउने राजकुमारी ।''
रतनू सोंच  म पड़गे । कहिथे- ""अब कहां के राजा अउ राजकुमारी । फेर आज कल के राजा अउ राजकुमारी इही मन तो आय  बेटा ।''
राजेस- ""सेठ मन कइसन होथे ?''
रतनू- ""वो दुकान म बइठ के पइसा गिनत हे तउन ला देख ले । उही मन सेठ आय  ।''
राजेस- ""हमू मन अइसने घर काबर नइ बनान ?''
रतनू- ""पइसा वाले मन बनाथे । हमन कहां ले बना सकबो ।''
राजेस- ""सेठ मन तीर बहुत पइसा होथे का ?''
रतनू- ""हव ।''
राजेस- ""तब हमू सेठ बनबो ।''
रतनू राजेस के सवाल पुछई म थरार् गे रहय  । वोला कुछू कहत नइ बनिस । रोसिया के कथे- ""तोला सेठ बनाय  बर नइ पढ़ावत-लिखावत हंव । ये सब तो गरीब-किसान के खून चुसइया होथे । तोला खून चुहकइया नइ बनना हे । तंय  तो बड़े साहब बनके खून चुहकइया मन के काल बनबे । समझे ?''
भूख के मारे राजेस के पेट अइठत रहय  । बाप के गोठ वोला समझ नइ आइस । हलवाई लाइन से गुजरत रहय  । दुकान मन म किसम-किसम के मिठाई सजे रहय  । भxी मन म बड़े-बड़े कड़ाही च ढ़े रहय  । कहीं समोसा-कच ौरी, त कहीं जलेबी-इमरती चुरत रहय  । तेल अउ मसाला के सुगंध म राजेस के भूख अउ बाढ़गे । मंुह पनछिया गे । मुंह के पानी गुटकत कहिथे- ""बाबू-बाबू अबड़ भूख लागत हे । पियास घलो लागत हे ।''
रतनू घलो पियास मरत रहय  । लइका के दसा देख के वोला रोना आगे, फेर मन मसोस के कहिथे- ""थोरिक दम धर बेटा, तोर पेन-कापी ले बाचे पइसा के मन भर मिठाई खाबो । तोर मां बर घला लेगबो । फेर पहली किताब दुकान च ल ।''
दूनो बाप-बेटा, बड़े दुकान म गिन । दुकान के नाम अतराब म परसिद्ध रहय  । गांव-गंवइ के छोटे-छोटे दुकान दार मन इहें ले थोक भाव म खरीद के लेगथे । राजेस हा अपन मन माफिक पेन-कापी अउ किताब छाटिस । सबो के कीमत जोड़ के सेठ ह बताइस । सुनके रतनू बक खा गे । अकबकाय  कस हो गे । बड़ मुस्किल म मुंह उलिस । कहिथे- ""अबड़ मंहगा लगायेस सेठ जी ।''
सेठ- ""ए साल मंहगाई बाढ़ गे हे कका । सब म कीमत छपे हे । बने देख ले, जोड़ ले, तब पइसा दे ।''
रतनू- ""देख डरेंव सेठ जी, ये मन म कीमत छपे हे तउन ब्रह्मा के लेख नो हे, थोरिक तो कम करके जोड़ ।''
सेठ- ""एक पइसा कम नइ हो सकय  । लेना हे त ले, नइ तो आगू बढ़ । इंहा मोल-भाव नइ च लय  ।''
रतनू- ""कइसे नइ हो सकही सेठ जी, हमर गांव के छोटे-छोटे दुकानदार मन सब म अठÛी रूपय  कम करके बेच थे । तंय  तो बड़े दुकानदार आवस । इंहा दू पइसा अऊ सस्ता मिलत होही कहिके हम गांव ले तोर तीर आय  हन । इंहा आके तो उल्टा होगे भई ।''
रतनू के बात सुनके सेठ कनझा गे । बाजू म दूसर सेठ बइठे रहय  तऊन ला कहिथे- ""सुन रहे हो न सेठ जी, गांव के साले जितने छत्तीसगढ़िया दुकानदार हैं, सब लोगों ने रेट खराब कर दिये हैं । हम तो परेशान हो गये हैं ।'' फेर रतनू डहर देख के कहिथे- ""अरे लेना हे त ले, नइ ते जा तोर गांव म जा के ले लेबे । वो मन तुंहर सगा होही, तेकर सेती दे देवत होही । समझे ।''
रतनू- ""समझ  गेव, बने कहत हस तंय  सेठ जी, विही मन हमर सगा आय । विही मन हमर छत्तीसगढ़िया भाई आय  । तुमन हमर कोन लगथो जी ? तुमन तो इंहा बेपार करे बर आय  हव । हमर सगा बने बर, छत्तीसगढ़िया बने बर थोड़े आय  हवव । समान बिकत ले, मुठा म पइसा आवत ले हम तुंहर कका-बबा आवन । पाछू तुंहर बर हम साला छत्तीसगढ़िया बन जाथन । साला देहाती बन जाथन ।''
रतनू एक हाथ म झोला अउ दूसर हाथ म राजेस के अंगठी  ल धरे सड़क म आ गे । राजेस के मुंह ला देखथे, भूख-पियास के मारे अइला गे रहय  । खुद वोला भी भूख लागत रहय  । थैली म हाथ डारके देखथे , दू-चार ठन सिOा  के अलावा कुछ नइ रहय  । च उक म चाय -ठेला वाले तिर रूकिस, चाय  के भाव-पूछिस । चाय  के पूरती पइसा बचे रहय  । दूनो बाप-बेटा पानी अउ चाय  पी के अपन पियास बुझाइन । हलवाई दुकान के आगू इमरती, जलेबी, समोसा, कचोरी के सुगंध से  अभी घला हवा हा महर-महर करत रहय  । फेर ये सुगंध न तो रतनू ला जनाइस न राजेस ला ।
व्‍याख्‍याता, शास. उच्‍चतर माध्‍यमिक शाला, कन्‍हारपुरी , राजनांदगांव ( छत्‍तीसगढ़ )
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