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इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

बुधवार, 4 सितंबर 2013

साला छत्‍तीसगढि़या

कुबेर
""स्कूल खुले महिना भर हो गे हे, लइका हा दिन-रात रेंघ मताथे । तंय  का सुनबे, तोर कान म तो पोनी गोंजा गे हे । पेन-कापी लेय  बर कहत हे, ले नइ देतेस ।'' देवकी हा अपन नंगरिहा रतनू ला झंझेटिस ।
रतनू हा कथे- ""हित लगा के दू कंवरा बासी ला तो खावन दे भगवान । पेन-कापी भागत थोरे हे । कालिच  बांवत उरकिस हे । हाथ म एको पइसा नइ हे । खातू-दवाई घला अभीच  लेना हे । निंदाई-कोड़ाई ला तो आन साल जुर मिल के कर डारत रेहेन, फेर पर साल ले तो बन-झार के मारे खेत हा पटा जाथे । एसो कोन जाने का होही । बनिहार लेगे बर झन परे । इही ला कहिथे, दुबबर बर दू असाड़ । करंव ते का करंव, तिंही बता ?''
देवकी से कुछ कहत नइ बनिस । अपन गलती ला संवास के वो हा चुप हो गे । थोरिक देर दुनो झन एक दूसर के रोनहू बानी ला, करलई अकन देखत रहिगे । अइसन में कइसे बनही ? देवकी हा अपन जी ला कड़ा करके कहिथे- ""जउन होना होही  तउन होवत रहही, चिंता काबर करथो, हित लगा के बासी तो खा लेव । महूँ अड़ही, जकही-भूतही सरीख बिना गुने, कुछ के कुछ कहि परथों, नराज मत होय  करो ।''
रतनू कहिथे- ""काबर नराज होहूँ राजेस के मां । तोला का सुख देवत हंव, कि तोर बर नराज होहंव । फेर का करंव, एक फिकर छुटे नहीं कि दस ठन फिकर आगू ले मुंह फार के खड़े रहिथे । ऐकरे सेती, टांठ भाखा निकल जाथे ।''
गोसंइया के मुंह ले अतेक सुघ्घर मया के गोठ सुनके देवकी के मन गदगद होगे । फेर घर के जुच्छा कोठी के सुरता करके अऊ रतनू के अइलहा मुंहरन-बरन ला देख के ओखर आंसू झरे लगिस । अंच रा के कोर म ढ़रत आंसू ला कलेचुप पोंछ के कहिथे- ""कइसे तुंहर बानी-बरन हा अइलहा-अइलहा दिखथे ? जर-बुखार तो नइ धरे हे ? सूजी-पानी लगवा लेतेव ।''
""दू-चार दिन हो गे राजेस के मां, सुस्ती-सुस्ती कस लागथे । गोड-हाथ घला पिराथे । नांगर-बखिर के दिन म का आदमी ला कहिबे , का बइला भंइसा ला कहिबे । सबके रगड़ा टूट जाथे । हKता-पंद्रा दिन के तो बात रहिथे । फेर तो अरामे अराम हे । तंय  फिकर काबर करथस । मोला कुछू नइ होय  हे ।'' रतनू अपन गोसाइन ला ढ़ांढ़स बंधाइस ।
देवकी झिच कत-झिच कत लटपट किहिस- ""नांदगांव वाले साहेब बाबू हा काली संझा बेरा फटफटी म आय  रिहिस । कहत रिहिस कि भइया अपन खेत ला बो डरिस होही त हमरो खेत ला बो देतिस । हर साल तुंहीच  मन तो कमाथो । भइया के रहत ले मंय  हा कोनो दूसर ला नइ तियारंव ।''
""तब तंय  का कहेस राजेस के मां ।'' रतनू हा टप से पूछिस, जइसे रस्ता च लत बटलोही मिल गिस होय  ।
""का कहितेंव, तुमला पूछे बिना । ऐसो भर हो गे हे, तुंहर देह झुकते जावत हे । वइसने बइला मन घला थक गे हे । सब बात सोंच  के बOा बंधा गे ।'' कहत-कहत देवकी बोटबिटा गे ।
रतनू कहिथे- ""दू-चार दिन भाड़ा फांदे बिना हाथ कइसे क‚ा होही । आज बुधवार ए । बिरसपत, सुकरार अउ सनि‚र, तीन दिन के भाड़ा कमाय  ले राजेस के कापी-किताब के पुरती तो होइच  जाही । इतवार दिन नांदगांव के बजार हरे ।''
""नांदगांव घुमे के सउक लगे हे, नइ कहव, गांव के गंउटिया दुकान म तो घला पेन-कापी बेचाथे । उंहे नइ ले लेहव । किताब तो स्कूल डहर ले मिल गे हे ।'' देवकी हा सुझाव दिस ।
रतनू कहिथे- ""बने कथस राजेस के मां ! पाछू साल गंउटिया दुकान म लेय  रेहेंव । छपे कीमत ले रूपिया-दूरूपिया कम करके देय  रिहिस । पान-बिड़ी के पुरती अउ छोड़ाय  रेहेंव । ये तो छोटे दुकान आय  । नांदगांव के बड़े दुकान मन म लेय  से रूपिया-दू-रूपिया अऊ बच  जाही । इही सोंच  के नांदगांव जाहूँ कहत हंव । तंय  कहिथस घूमे के सउक लगे हे । जब गोठियाबे, उल्टाच  गोठियाबे ।''
""जानत हंव, फेर मोर बर का लाबे ?'' कहिके देवकी हा मुंच  ले हांस दिस ।
रतनू कहिथे- ""नांदगांव के गोल बजार ला ।''
देवकी हा रतनू कोती कनखही देख के जिबरा दिस । रतनू के हिरदे म घलो मया उमड़ गे । कथे- ""कतको साल हो गे, तोर बर पैरपuी अऊ करधन बनाहूँ कहत-कहत । भगवान के किरपा ले, बने-बने पानी-बादर बरस जाही त एसो अवस्य  बनवा देहूँ ।''
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इतवार के दिन रतनू ह बिहिनिया ले नहा धो के, बासी खा के तियार होगे । साय किल के पाछू च Oा पंदरही पहली भरस्ट हो गे रिहिस । मिÍी तीर बनाय  बर लेगे रिहिस । टैर-टूब कंद गे हे, कहिके मिÍी हा नइ बनाइस । नवा टैर-टूब बर अढ़ई-तीन सौ रूपिया बताइस, तंहले रतनू के मुंह बंधागे । अब का करे ? बड़े भइया के साइकिल ला मांगे बर सोंचि स, फेर भऊजी के सुभाव देखत वोकर हिम्मत नइ होइस । आखिर म रेंगत जाय  के पOा करिस । न उधो के लेना, न माधो के देना । झोला-झांगड़ धर के जइसने घर ले निकले के होइस, राजेस संग पड़गे । रेंध मता दिस । कहे लागिस- ""हम एको घांव नांदगांव देखे नइ हन, हम तोर संग जाबो । हम जाबो, त हमर मन के लेबो । पाछू साल तंय  उल्टा-पुल्टा ले देय  रेहेस ।''
देवकी के पलोंदी पा के राजेस अउ जिद करे लागिस । आखिर म रतनू ला मानेच  बर पडिस ।राजेस के खुसी का का पूछना ?
गांव के सड़क म, जेती देखव, ग‰ा च -ग‰ा । रात मा जोरदार पानी गिरे रहय  । ग‰ा मन तरिया कस भरे रहय  । चि खला के मारे च प्पल फदक-फदक जाय  । खिसिया के रतनू हा दुनो झन के च प्पल मन ला हाथ म धर लिस । राजेस के भाग खुलगे । रतनू हा सुखिा-सुखिा देख के रेंगय , त राजेस हा डबरा के पानी म च भक-च भक रेंगय  । कभू-कभू त खेले बर रम जाय  ।
सड़क के दूनो बाजू जतिक दुरिहा ले देखव, खेतेच -खेत दिखत रहय  । कतको खेत जोता-बोंवा गे रहय  । कतको म अभी घला नांगर च लत रहय  । कतको खेत के धान पिकियात रहय  । रतनू के मन खेत-खार म लगे रहय  । राजेस के सुरता आ गे । पाछू लहुट के देखिस, राजेस पानी खेले म भुलाय  रहय  । रतनू खिसियाइस- ""झपकिन आ, खेलत मत रह । पानी बादर के दिन ।'' राजेस दउड के आइस ।
बड़ मुस्किल से बड़े सड़क म पहुंचि न । बड़े सड़क गजब ऊँचा, अबबड़ चाकर, डामर के पOा बनल, चि Oन चांदर रहय  । रतनू हा पाई के डबरा के पानी म गोड धो के, अपन च प्पल ला पहिन लिस । राजेस घला वइसनेच  करिस ।  अब दूनो बाप-बेटा डामर सड़क के डेरी बाजू कोरेकोर रेंगे लागिन । सड़क हा मोटर-गाड़ी के मारे दमदमात रहय  । किसम-किसम के बस, टरक, कार, फटफटी पूछी चाबे-चाबे कभू एती ले भरर् के आय , कभू वोती ले । पें&&... करत एक ठन गजब सुंदर अकन कार सांय  ले उंखर बाजू ले निकल गे । राजेस वोकर नकल उतारिस- ""पीं&&& ।'' तभे आगू डहर ले एक ठन अबबड़ लाम के टरक आवत रहय  । वोमा बड़ भारी मसीन जोराय  रहय  । प‚ासो ठन च Oा लगे रहय  । कनखजूर जइसे टरक ला देख के राजेस हा च कित खा गे । वोकर च Oा मन ला गिने लागिस- एक, दू, तीन, चार.................प‚ीस । आंखी च कमका गे । गिनती घला भुला गे । कन्झा के अपन बाप ला पूछे लगिस- ""बाबू-बाबू, येखर के ठन च Oा हे ?''
रतनू हा लइका के हाथ ला च मच मा के धरे रहय  । अपन डहर खिंचि स । किहिस- ""सड़क ला देख के च ल । च Oा गिने में झन भुला ।''
राजेस हा फेर पूछिस- ""येमा का मसीन जोराय  हे बाबू ?''
""कोनो कोती कारखाना बनत होही । वोकरे होही । विहिचे जावत हो ही ।''
राजेस के मन नइ मानिस । टरक गुजर गे रहय  । दुरिहात टरक ला लहुट-लहुट के देखे लागिस । वोतका म एक ठन बस, पें ....... करत आइस अउ सांय  ले आगू निकल गे ।
राजेस कहिथे-  ""बाबू, बाबू थकासी लग गे, मोटर म च ढ़ के जाबो ।''
रतनू कहिथे- ""टिकिट बर पइसा नइ हे बेटा ।''
""बिन पइसा के नइ च ढ़ाय  ?''        ""तोर अजा बबा नोहे ।''        ""तंय  तो पइसा धरे हस''
""बस वाले बर नइ धरे हंव । तोर पेन-कापी लेय  बर धरे हंव । वोखर ले बांच ही तेखर खाई खजानी खाबो । बस वाले ला काबर देबो ।''
किसम-किसम के मोटर गाड़ी देख के राजेस के मति च कराय  रहय  । थोरिक देर गुनिस । दिमाग नइ पुरिस, तब अपन बाबू ला पूछिस- ""बाबू-बाबू ये मोटर मन काकर होही ?''
रतनू कहिथे- ""बड़े-बड़े आदमी मन के आय  ।''
""हमरो मन ले बड़े ?''
""हाव ।''
अच रज म अपन दुनो हाथ ला ऊपर उचा के राजेस हा कहिथे- ""अतेक बड़े ?''
रतनू - ""भोकवा, वइसन बड़े नहीं । बड़े आदमी माने खूब अकन रूपिय -पइसा वाले आदमी । समझे । हमन तो गरीब आवन ।''
राजेस अपन दुनो हाथ ला आगू कोती लमा के नापे कस करके कहिथे- ""अतिक रूपिया ?''
रतनू  - ""वोकर ले कतको जादा ।''
राजेस - ""अतेक पइसा ओ मन कहां ले पाथे ?''
रतनू - ""भगवान हा देथे ।''
राजेस - "" भगवान हमन ल काबर नइ देय  ?''
रतनू कहिथे  - ""अपन-अपन करम-कमई तो आय  बेटा ।''
राजेस- ""तंहू तो अबड़ कमाथस, रात दिन कमाथस, तब ले भगवान हमन ला बस च ढ़े बर घला पइसा नइ देय  ?''
रतनू राजेस के बात सुन के अकबका गे । कुछू जवाब देतिस, वोतका म असोक गुरूजी ऊंखर आगू म फटफटी ला धम ले रोक के खड़े हो गे । रतनू झकनका के कहिथे- ""राम-राम गुरूजी ।''
असोक गुरूजी- ""राम-राम कका, दूनो बाप-बेटा कहां जावत हो जी ? नांदगांव जावत हव का ?''
रतनू- ""हव गुरूजी, साइकिल पंच र पड़े हे, रेंगत जावत हन जी ।''
असोक गुरूजी- ""रेंगत-रेंगत लइका हा लथर गे हाबे, आवव, मोर संग बइठ जावव ।''
रतनू- ""आप मन ला तकलीफ होही गुरूजी ।''
असोक गुरूजी- ""का के तकलीफ होही ?''
रतनू - ""उपरहा पइसा नइ हे गुरूजी । पिटरोल खरचा कहां ले देहूं आप मन ला ।''
असोक गुरूजी- ""कका, तोला गारी खाय  बर भाय  हे का ? अरे ये पइसा के बात कहां ले आ गे । हमला अतेक बिरान काबर समझत हाबस । अरे हम लोटा धर के अवइया अउ चार साल म बिल्डिंग टेकइया नो हन । तुंहर-हमर, कइ पुरखा के नेरवा इही गांव के माटी म गड़े हे ।''
रतनू कहिथे- ""दूध के जरइया, मही ला घलो फूंक-फूंक के पीथे बेटा । एक घांव सेठ टुरा संग अइसने सोंच  के बइठ गे रेहेंव । च उक म उतार दिस, अउ बीस रूपिया ले लिस । च ना-च बेना बर बंचा के रखे रेहेंव । लइका के मुंह म पेरा गोंजा गे बेटा । विही पाय के कहि परेंव ।''
असोक गुरूजी- ""सही बात आय  कका । हमर मन के मुंह म पेरा गोंजही, तभे तो ऊंखर मन के बिल्डिंग खड़े होही ।''
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दुनो बाप-बेटा गुरूजी के फटफटी  म बइठ के नांदगांव पहुंच  गिन । राजेस कभू फटफटी नइ च ढ़े रहय  , च ढ़ के खुस होगे । उतरत समय  असोक गुरूजी हा कहिथे- ""आफिस जावत हंव, दू बजत ले मोर काम हो जाही । इंही कर अगोरा कर लेहू । आय  हवन, वइसने च ल देबो । राजेस पढ़ई म गजब होसियार हे, ओकर मन पसंद के पेन-कापी ले देबे ।''
बेटा के प्रसंशा सुन के रतनू के छाती गज भर च ौड़ा होगे ।
राजेस के अंगठी धरे-धरे रतनू हा किताब के बड़े दुकान कोती जावत रहय  । राजेस के धियान सड़क के दूनो बाजू सजे-धजे किसम-किसम के दुकान अउ तिमंजिला-च ौमंजिला बड़े-बड़े बिल्डिंग मन कोती रहय  । वो हा सोच त रहय  कि अतेक ऊंच -ऊंच  मकान ला कइसे बनाय  होही, इंहा रहवइया मन कइसन होत होही ? राजकुमारी के कहानी के सुरता आ गे कि कइसे वो हा सतखंडा महल के झरोखा ले राजकुमार ला देखत रहय  । वोतका बेरा एक झन सेठाइन टुरी एक ठन बिल्डिंग के खिड़की ले झांकत रहय  । राजेस अपन बाबू ला पूछथे- ""बाबू-बाबू वो झांकत हे तउने हा राजकुमारी आय  का ?''
रतनू- ""कोन राजकुमारी ?''
राजेस- ""काली रात म कहानी सुनात रेहेस तउने राजकुमारी ।''
रतनू सोंच  म पड़गे । कहिथे- ""अब कहां के राजा अउ राजकुमारी । फेर आज कल के राजा अउ राजकुमारी इही मन तो आय  बेटा ।''
राजेस- ""सेठ मन कइसन होथे ?''
रतनू- ""वो दुकान म बइठ के पइसा गिनत हे तउन ला देख ले । उही मन सेठ आय  ।''
राजेस- ""हमू मन अइसने घर काबर नइ बनान ?''
रतनू- ""पइसा वाले मन बनाथे । हमन कहां ले बना सकबो ।''
राजेस- ""सेठ मन तीर बहुत पइसा होथे का ?''
रतनू- ""हव ।''
राजेस- ""तब हमू सेठ बनबो ।''
रतनू राजेस के सवाल पुछई म थरार् गे रहय  । वोला कुछू कहत नइ बनिस । रोसिया के कथे- ""तोला सेठ बनाय  बर नइ पढ़ावत-लिखावत हंव । ये सब तो गरीब-किसान के खून चुसइया होथे । तोला खून चुहकइया नइ बनना हे । तंय  तो बड़े साहब बनके खून चुहकइया मन के काल बनबे । समझे ?''
भूख के मारे राजेस के पेट अइठत रहय  । बाप के गोठ वोला समझ नइ आइस । हलवाई लाइन से गुजरत रहय  । दुकान मन म किसम-किसम के मिठाई सजे रहय  । भxी मन म बड़े-बड़े कड़ाही च ढ़े रहय  । कहीं समोसा-कच ौरी, त कहीं जलेबी-इमरती चुरत रहय  । तेल अउ मसाला के सुगंध म राजेस के भूख अउ बाढ़गे । मंुह पनछिया गे । मुंह के पानी गुटकत कहिथे- ""बाबू-बाबू अबड़ भूख लागत हे । पियास घलो लागत हे ।''
रतनू घलो पियास मरत रहय  । लइका के दसा देख के वोला रोना आगे, फेर मन मसोस के कहिथे- ""थोरिक दम धर बेटा, तोर पेन-कापी ले बाचे पइसा के मन भर मिठाई खाबो । तोर मां बर घला लेगबो । फेर पहली किताब दुकान च ल ।''
दूनो बाप-बेटा, बड़े दुकान म गिन । दुकान के नाम अतराब म परसिद्ध रहय  । गांव-गंवइ के छोटे-छोटे दुकान दार मन इहें ले थोक भाव म खरीद के लेगथे । राजेस हा अपन मन माफिक पेन-कापी अउ किताब छाटिस । सबो के कीमत जोड़ के सेठ ह बताइस । सुनके रतनू बक खा गे । अकबकाय  कस हो गे । बड़ मुस्किल म मुंह उलिस । कहिथे- ""अबड़ मंहगा लगायेस सेठ जी ।''
सेठ- ""ए साल मंहगाई बाढ़ गे हे कका । सब म कीमत छपे हे । बने देख ले, जोड़ ले, तब पइसा दे ।''
रतनू- ""देख डरेंव सेठ जी, ये मन म कीमत छपे हे तउन ब्रह्मा के लेख नो हे, थोरिक तो कम करके जोड़ ।''
सेठ- ""एक पइसा कम नइ हो सकय  । लेना हे त ले, नइ तो आगू बढ़ । इंहा मोल-भाव नइ च लय  ।''
रतनू- ""कइसे नइ हो सकही सेठ जी, हमर गांव के छोटे-छोटे दुकानदार मन सब म अठÛी रूपय  कम करके बेच थे । तंय  तो बड़े दुकानदार आवस । इंहा दू पइसा अऊ सस्ता मिलत होही कहिके हम गांव ले तोर तीर आय  हन । इंहा आके तो उल्टा होगे भई ।''
रतनू के बात सुनके सेठ कनझा गे । बाजू म दूसर सेठ बइठे रहय  तऊन ला कहिथे- ""सुन रहे हो न सेठ जी, गांव के साले जितने छत्तीसगढ़िया दुकानदार हैं, सब लोगों ने रेट खराब कर दिये हैं । हम तो परेशान हो गये हैं ।'' फेर रतनू डहर देख के कहिथे- ""अरे लेना हे त ले, नइ ते जा तोर गांव म जा के ले लेबे । वो मन तुंहर सगा होही, तेकर सेती दे देवत होही । समझे ।''
रतनू- ""समझ  गेव, बने कहत हस तंय  सेठ जी, विही मन हमर सगा आय । विही मन हमर छत्तीसगढ़िया भाई आय  । तुमन हमर कोन लगथो जी ? तुमन तो इंहा बेपार करे बर आय  हव । हमर सगा बने बर, छत्तीसगढ़िया बने बर थोड़े आय  हवव । समान बिकत ले, मुठा म पइसा आवत ले हम तुंहर कका-बबा आवन । पाछू तुंहर बर हम साला छत्तीसगढ़िया बन जाथन । साला देहाती बन जाथन ।''
रतनू एक हाथ म झोला अउ दूसर हाथ म राजेस के अंगठी  ल धरे सड़क म आ गे । राजेस के मुंह ला देखथे, भूख-पियास के मारे अइला गे रहय  । खुद वोला भी भूख लागत रहय  । थैली म हाथ डारके देखथे , दू-चार ठन सिOा  के अलावा कुछ नइ रहय  । च उक म चाय -ठेला वाले तिर रूकिस, चाय  के भाव-पूछिस । चाय  के पूरती पइसा बचे रहय  । दूनो बाप-बेटा पानी अउ चाय  पी के अपन पियास बुझाइन । हलवाई दुकान के आगू इमरती, जलेबी, समोसा, कचोरी के सुगंध से  अभी घला हवा हा महर-महर करत रहय  । फेर ये सुगंध न तो रतनू ला जनाइस न राजेस ला ।
व्‍याख्‍याता, शास. उच्‍चतर माध्‍यमिक शाला, कन्‍हारपुरी , राजनांदगांव ( छत्‍तीसगढ़ )
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