इस अंक में :

मनोज मोक्षेन्‍द्र का आलेख '' सार्थक व्यंग्य के आवश्यक है व्यंग्यात्मक कटाक्षों की सर्वत्रता '', डॉ. माणिक विश्‍वकर्मा '' नवरंग '' का शोध लेख '' हिन्दी गज़ल का इतिहास एवं छंद विधान: हिन्दी की'',रविन्‍द्र नाथ टैगोर की कहानी '' सीमांत '', मनोहर श्‍याम जोशी की कहानी '' उसका बिस्‍तर '', कहानी ( अनुवाद उडि़या से हिन्दी)'' अनसुलझी''मूल लेखिका:सरोजनी साहू अनुवाद:दिनेश कुमार शास्त्री, छत्तीसगढ़ी कहिनी'' फोंक - फोंक ल काटे म नई बने बात'' लेखक:ललित साहू' जख्मी', बाल कहानी '' अनोखी तरकीब''''मेंढक और गिलहरी'' रचनाकार पराग ज्ञान देव चौधरी,सुशील यादव का व्यंग्य '' मन रे तू काहे न धीर धरे'', त्रिभुवन पांडेय का व्‍यंग्‍य ''ललित निबंध होली पर'',गीत- गजल- कविता: रचनाकार :खुर्शीद अनवर' खुर्शीद',श्याम'अंकुर',महेश कटारे'सुगम',जितेन्द्र'सुकुमार',विवेक चतुर्वेदी,सुशील यादव, संत कवि पवन दीवान,रोज़लीन,डॉ. जीवन यदु, टीकेश्वर सिन्हा'गब्दीवाला, बृजभूषण चतुर्वेदी 'बृजेश', पुस्तक समीक्षा:'' इतिहास बोध से वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार'' समीक्षा : एम. एम. चन्द्रा'', ''मौन मंथन: एक समीक्षा''समीक्षा''मंगत रवीन्द्र,''जल की धारा बहती रहे''समीक्षा : डॉ. अखिलेश कुमार'शंखधर'

बुधवार, 4 सितंबर 2013

केशर की क्यारी


लक्ष्‍मीनारायण राय
अलस उनीदी भीगी पलकें,
जोह रही है बाट तुम्हारी।
मास बरस बीते निर्मोही,
सूखी जाये केशर की क्यारी॥

आवारा सपने आकर के,
मुझको हर दम फुसलाते हैं।
नयनों के निर्मल झरनों से,
झर - झर मोती टपकाते हैं।
किस से कहूं मैं मन की पीड़ा,
नयन बसी है छवि तिहारी॥
सूखी जाये केशर ..........

शशि हुआ बड़ा बैरी है अब तो,
लिखता पुष्पों पर परिभाषा।
सौतन जैसी हाय चंदनियाँ,
नित पढ़ती विरहा की भाषा।
यह बासन्ती हवा चलत है,
हिय में जाय जस धंसी कटारी।
सूखी जाये केशर ..........

सावन जैसा दिल है रोता,
भादों जैसी झड़ी लगी है।
आठों पहर जतन से जी लूं,
पीड़ा तू ही सखी सगी है।
अन्तस व्यथा कही न जाती,
मैं विष तू अमृत की झारी॥
सूखी जाये केशर ..........

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