इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

बुधवार, 4 सितंबर 2013

केशर की क्यारी


लक्ष्‍मीनारायण राय
अलस उनीदी भीगी पलकें,
जोह रही है बाट तुम्हारी।
मास बरस बीते निर्मोही,
सूखी जाये केशर की क्यारी॥

आवारा सपने आकर के,
मुझको हर दम फुसलाते हैं।
नयनों के निर्मल झरनों से,
झर - झर मोती टपकाते हैं।
किस से कहूं मैं मन की पीड़ा,
नयन बसी है छवि तिहारी॥
सूखी जाये केशर ..........

शशि हुआ बड़ा बैरी है अब तो,
लिखता पुष्पों पर परिभाषा।
सौतन जैसी हाय चंदनियाँ,
नित पढ़ती विरहा की भाषा।
यह बासन्ती हवा चलत है,
हिय में जाय जस धंसी कटारी।
सूखी जाये केशर ..........

सावन जैसा दिल है रोता,
भादों जैसी झड़ी लगी है।
आठों पहर जतन से जी लूं,
पीड़ा तू ही सखी सगी है।
अन्तस व्यथा कही न जाती,
मैं विष तू अमृत की झारी॥
सूखी जाये केशर ..........

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