इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

गुरुवार, 12 सितंबर 2013

इन रस्तों की धूप

डां. महेन्द्र अग्रवाल
इन रस्तों की धूप उठा लें शाम करें।
मुमकिन है जो सोचें, वैसा काम करें॥
तुलसी की ममता, बरगद की छांव वहां,
घर है आंगन में जाकर आराम करें।
डेमोके्रसी ने आंखों मे रोप दिए,
नेताओं को नाहक हम बदनाम करें।
खच्चर, घोड़े और गधे सब एक जगह,
पेड़ों पर लटके चिमगादड़ नाम करें।
दफ़्तर - दफ़्तर कौन भटकता यार यहां,
हमने खुद चाहा पैसे लें काम करें।
आने वाली नस्लें हमको याद रखें,
हर गुंचे का ख्वाब मुकम्मल राम करें।
संपादक नई $ग$जल, रामेश्वरम्ï
सदर बाजार, शिवपुरी म.प्र.

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