इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

गुरुवार, 12 सितंबर 2013

इन रस्तों की धूप

डां. महेन्द्र अग्रवाल
इन रस्तों की धूप उठा लें शाम करें।
मुमकिन है जो सोचें, वैसा काम करें॥
तुलसी की ममता, बरगद की छांव वहां,
घर है आंगन में जाकर आराम करें।
डेमोके्रसी ने आंखों मे रोप दिए,
नेताओं को नाहक हम बदनाम करें।
खच्चर, घोड़े और गधे सब एक जगह,
पेड़ों पर लटके चिमगादड़ नाम करें।
दफ़्तर - दफ़्तर कौन भटकता यार यहां,
हमने खुद चाहा पैसे लें काम करें।
आने वाली नस्लें हमको याद रखें,
हर गुंचे का ख्वाब मुकम्मल राम करें।
संपादक नई $ग$जल, रामेश्वरम्ï
सदर बाजार, शिवपुरी म.प्र.

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