इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

गुरुवार, 12 सितंबर 2013

इन रस्तों की धूप

डां. महेन्द्र अग्रवाल
इन रस्तों की धूप उठा लें शाम करें।
मुमकिन है जो सोचें, वैसा काम करें॥
तुलसी की ममता, बरगद की छांव वहां,
घर है आंगन में जाकर आराम करें।
डेमोके्रसी ने आंखों मे रोप दिए,
नेताओं को नाहक हम बदनाम करें।
खच्चर, घोड़े और गधे सब एक जगह,
पेड़ों पर लटके चिमगादड़ नाम करें।
दफ़्तर - दफ़्तर कौन भटकता यार यहां,
हमने खुद चाहा पैसे लें काम करें।
आने वाली नस्लें हमको याद रखें,
हर गुंचे का ख्वाब मुकम्मल राम करें।
संपादक नई $ग$जल, रामेश्वरम्ï
सदर बाजार, शिवपुरी म.प्र.

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