इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

सोमवार, 31 अगस्त 2009

राजभाषा : छत्‍तीसगढ़ी

यशवंत मेश्राम 
छत्तीसगढ़ी की उत्पत्ति अधर्मागधी - प्राकृत - अपभ्रंशों से हुई है. य ह हिन्दी भाषान्तर्गत पूवीर् हिन्दी की एक बोली है. भोलानाथ तिवारी के अनुसार हिन्दी की 17 बोलियाँ बतलाई गई है जबकि डाँ. रमेशच न्द्र मेहरोत्रा ने 22 बोलियाँ स्वीकार की है. छत्तीसगढ़ी की उपबोलियाँ इस प्रकार है- 1. छत्तीसगढ़ी - (अ) राय पुरी (ब) बिलासपुरी, 2. खल्टाही ,3. लरिया, 4. सरगुजिया, 5. सदरी कोरवा, 6. बैगानी, 7. बिंझवारी, 8. कलंगा, 9. बस्तरीया हल्बी.
छत्तीसगढ़ी और हिन्दी के भाषा वैज्ञानिक भेद लिखित स्तर पर स्पý है, जो छत्तीसगढ़ी को भाषा स्वरूप प्रदान करते हैं. वह इस प्रकार हैं-
1. चंद्रबिन्दु का आगमन होना - चावल का चाँँवल,
2. अनुस्वर का आगमन लोप दोनों - सोचेगा का सोंचेगा, यिों का यिो.
3. विसगर् लुÄ होता है - दु:ख का दुख.
4. हल् का लोप होना - संवत् का संवत.
5. आ के स्थान पर अ - आवाज का अवाज.
6. इ का ई होना - जाति का जाती . और ई का इ होना - नीचे का निचे.
7. उ का ऊ हो जाता है - साधु का साधू और ऊ का उ हो जाता है - बहु का बहू.
8. नुतिा का लोप हो जाना - êेवर का जेवर,
9. व के स्थान पर ब का उ‚ारण होता है - व्य य  का बय य
1. संज्ञा पुल्लिंग का Íीलिंग होता -
हिंदी - वहां से कुतियांँ, घोड़ियाँ और हाथी भाग गए .
छत्तीसगढ़ी - घोड़ियाँ, हाथियाँ और कुतियाँँं वहाँ से भाग गई.
11. Íीलिंग का पुल्लिंग होना -
हिंदी - इसमें उदास होने की यिा बात है.
छत्तीसगढ़ी - इसमें उदास होने का यिा बात है.
12. संज्ञा कारक रूप के स्थान पर मूल होता है -
हिन्दी - दादी, साले और देवर ने नरम कपड़े से अपने नाक कान साफ किए थे.
छत्तीसगढ़ी - दादी, साला, और देवर ने कोमल कपड़े से अपननाक कान पोंछ लिए.
13. संज्ञा संबोधनाथर् ओ का ओं होता है -
हिन्दी - भाइयो गधे को जीभ यिों दिखाते हो.
छत्तीसगढ़ी - भाइयों गधे को जीभ यिों दिखाते हो.
14. सवर्नाम बहुवच न का एकवच न होता है -
हिन्दी - उसने रूपयों को निकाल लिया और उनसे अपनी पत्नी के लिए जेवर बनाया.
छत्तीसगढ़ी - उसने रूपयो को निकाल लिया और उससे अपनी पत्नी के लिए जेवर बनाया.
15. सवर्नाम कारक रूप संबंधी गक्ल्त होती है -
हिन्दी - उसने य ह शिकाय त मुखिया को बताई.
छत्तीसगढ़ी - वह य ह शिकाय त मुखिया को बताया.
16. विशेषण वच न संबंधी भूल - एक वच न का बहुच न करते है.
हिन्दी - रामदास य ह बात सुनकर उदास हुआ.
छत्तीसगढ़ी - रामदास ये बात सुनकर उदास हुआ.
17. विशेषण कारक रूप संबंधी - विशेषण विकारी मूल रूप हो जाता है.
हिन्दी - भूखे भिखारी के स्थान पर छत्तीसगढ़ी में भूखा भिखारी लिखना.
18. क्रिया Íीलिंग को पुल्लिंग कर देते हैं -
हिन्दी - छह रोटियाँँ सड़ गई थी.
छत्तीसगढ़ी - छह रोटिया उस दिन सड़ गए थे.
19. क्रिया बहुवच न का एक वच न होता है -
हिन्दी - विज्ञान का सहारा ले रहे हैं.
छत्तीसगढ़ी - विज्ञान का सहारा ले रहा है.
2. क्रिया धातु रूप संबंधी गलतियाँ - हिन्दी - 3 मुद्राओं में गिरवी रखवा दूंगी. छत्तीसगढ़ी - 3 मुद्राओं में गिरवी रखा दूंगी.
21. पर सगर् होता है - में  का पर.
हिन्दी - घोड़ा राह में है. छत्तीसगढ़ी - घोड़ा रास्ते पर है.
22. संज्ञा अथर् संबंधी जातिवाच क होता है.
हिन्दी - हवलाई मिठाई बना रहा है. छत्तीसगढ़ी - मिस्त्री मिठाई बना रहा है.
ये भाषा वैज्ञानिक भेद मानक हिन्दी से छत्तीसगढ़ी भाषा को लिखित रूप में पूणर्त: अलग करते हैं, तब छत्तीसगढ़ी को भाषा का दजार् मिलना चाहिए. उपरोI अलगाव का मुख्य  कारण छत्तीसगढ़ी भाषा समाज विज्ञान की स्वतंत्र सत्ता दशार्ती है.
जब हम हिन्दी को भाषा - राजभाषा का स्थान दिलाने की बात करते हैं, तब हमें मूलनिवासियों के बोलियों का ध्यान अवश्य  रखना चाहिए. बोलियाँ इस प्रकार है -
हलबी - दुगर्, बस्तर, राय पुर. कोकर्ू - सरगुजा. भतरी - बस्तर. बंजारी - बस्तर, बिलासपुर. दोलीर्, धुरवा, माड़िया, मुड़िया - बस्तर. खड़िया - बिलासपुर, राय गढ़, राय पुर. कोरवा - बिलासपुर, राय गढ़, सरगुजा. कमारी - राय पुर. बैगानी - बिलासपुर, मंडला, सरगुजा, बालाघाट. धाँगड़ी - राय पुर. बिंझवारी - बस्तर, राय पुर. परधी - दुगर्, बस्तर, राय गढ़. बिरहोर - राय गढ़, सरगुजा. खेखारी - सरगुजा. परजी - बस्तर, राय पुर. धनवारी - राय पुर, सरगुजा.
राय पुर, बिलासपुर और दुगर् की बोलियों को छोड़कर सभी उपबोलियाँ महत्वहीन हो चुकी है. इसका कारण प्रिंट मीडिया, इलेटि¬ानिक मीडिया और रेडियो रहा है. बिलासपुर, राय पुर की छत्तीसगढ़ी बोली को छोड़ अन्य  छत्तीसगढ़ी बोलियाँ लुÄ हो जायेगी भविष्य  में . या बाकी बोलियाँ दूर अथवा छत्तीसगढ़ी में समाहित हो जायेंगी. राय पुर - बिलासपुर बोलियों के आधार पर ही छत्तीसगढ़ी बोली का ध्वनिकरण, व्याकरणिकरण शबदरूप विकसित हो रहा है. अत: छत्तीसगढ़ी बोली से भाषा में परिवतिर्त हो चुकी है. परिवतर्न न हो वह भाषा या उसका समाज का कठमु„ापन है. छत्तीसगढ़ी भाषा, राजभाषा बनकर हिन्दी पर उपकार ही करेगी.
छत्तीसगढ़ी का प्राचीन रूप बस्तर जिले के दंतेवाड़ा में अंकित शीलालेख है जो 173 ई. का है. 1735 ई. की छत्तीसगढ़ी का नमूना आरंग ग्राम के अंजोरलोधी के पास सुरक्ष्ाित है. इसके दोनों ओर अभिलेख है.
छत्तीसगढ़ी का प्रथम व्याकरण हीरालाल काव्योपाध्याय  द्वारा रचा गया. इसका संपादन जाजर् ग्रिय सर्न ने किया. य ह 189 ई. में बेप्टिस्ट मिशन प्रेस कलकत्ता से प्रकाशित हुआ था. इसका एक उदाहरण है -
- फुर बोली कहाँ अउ लबारी गोठ कहाँ. य ह व्याकरण तब लिखा गया जब हिन्दी का मानक व्याकरण कामता प्रसाद गुरू ने लिखा नहीं था. बंशीधर पांडेय  ने हिरू के कहिनी 1936 में लिखा. य हाँ से ही छत्तीसगढ़ी गद्य का प्रारंभ हुआ. दिय ना के अँजोर छत्तीसगढ़ी का प्रथम उपन्यास है. इसे शिवशंकर शुलि ने लिखा है. जागेश्वर प्रसाद के अनुसार छत्तीसगढ़ी में 11 शोध किए गए हैं. इसमें लगभग नौ हजार पुस्तकें हैं जो प्रकाशित हो चुकी हैं. सवाल शोध प्रकाशन का नहीं है. असल बात जनता के हाथों लिखित व्य वहार में छत्तीसगढ़ी का सप्रयोग कितना है ? इसका महत्व जानना होगा. इसके लाभदाय क गुण छत्तीसगढ़ियों में समावेशित हो जायेंगे तब हम छत्तीसगढ़ी भाषा को राजभाषा का दजार् दिला पायेंगे. हमारे साकेत साहित्य  परिषद, सुरति साहित्य  समिति के सदस्य  एक दूसरे के साथ छत्तीसगढ़ी में पत्राचार व्य वहार नहीं करते तब आम जन की क्स्थति को वतर्मान में समझा जा सकता है. याद रखा जाये एक विशेष वगर् ने शिक्ष्ाा पर प्राचीनकाल से जनता के लिए द्वार बंद रखे थे.
छत्तीसगढ़ी भाषा राजभाषा के रूप में स्थापित हो इसके लिए प्रायोगिक तौर पर निम्नलिखित उपाय  अमल में लाया जायें -
1.छत्तीसगढ़ी के सभी रेल्वे स्टेशनों पर उद्घोषणा हिन्दी अंग्रेजी के साथ छत्तीसगढ़ी में भी हो. य दि स्टेशन मास्टर छत्तीसगढ़ी उद्घोषणा अस्वीकार कर दे तो दबाव डाला जाये कि अपना स्टेशन छत्तीसगढ़ से कहीं और ले जाये.
2. छ.ग. के  केन्द्रीय , राज्य  स्तर के सभी कायार्लयों एवं निजी कायार्लयों, ग्रामीण बैंकों के कागज पत्रों पर हिन्दी के साथ छत्तीसगढ़ी भाषा का प्रयोग शुरू किया जाये. अंग्रेजी को हटवाया जाये.
किसी बोली अथवा भाषा का 8 वीं अनुसूची में स्थान पा जाना अलग बात है और लिखित व्य वहार में छत्तीसगढ़ी भाषा का प्रयोग होना भिÛ विषय  है. डा. पालेश्वर शमार् पूछते हैं कि छत्तीसगढ़ी भाषा को समृद्ध बनाने के लिए हमने कितना श्रम छत्तीसगढ़ी भाषा पर किया है ? इसका हिन्दी के साथ यिा अनुपात है ? हिन्दी से अलग कम से कम पचास प्रतिशत छत्तीसगढ़ी भाषा की पहचान लेखन में बनाना पड़ेगा. तब इसे हम शीघ्रता से भाषा के साथ राजभाषा की ओर अग्रसर कर पायेंगे.
छत्तीसगढ़ी अभिव्य िित का स्तर हृदय स्पशीर् है. छत्तीसगढ़ी भाषा का मामिर्क लेखन है. वजनदार कथन है. श्यामलाल च तुवेर्दी की कविता का बेटी के बिदा का अंतिम अंश इस प्रकार है -
एक तो बेटी झन होतिस.
होतिस ते बिदा झन करतिस.
पर जातिस बिदा करे बर.
अँधरी भैरी कस कर देतिस.
इसकी समीक्ष्ाा में हरि ठाकुर लिखते हैं कि हिन्दी में भी वियोग श्रृंगार का ऐसा वणर्न नहीं है, जितना इस छत्तीसगढ़ी भाषा में है. इसका कारण हमें लगता है - छत्तीसगढ़िया व्य Iि गजब का मयारू होता है. छत्तीसगढ़ी भाषा में अनेकानेक लोग लिख रहे हैं. भाषा शिक्ष्ाक एवं अन्य  विषय  शिक्ष्ाक ये कहने नहीं हिच किचाते हैं कि हम किसी भाषा या विषय  को हिन्दी में पढ़ाते हैं तो जो विद्याथीर् छत्तीसगढ़ी भाषी होता है उसका बोधग्रहण क्ष्ामता कम मात्रा में होती है. जबकि छत्तीसगढ़ी में शिक्ष्ाक काय र् करने पर विद्याथीर् की बोधक्ष्ामता शतप्रतिशत होती है. तब यिों न छत्तीसगढ़ी का व्य वहार में, प्राथमिक शिक्ष्ाण देकर प्रारंभ किया जाये एवं छत्तीसगढ़ी को एक विषय  के रूप में प्राथमिक पाठशालाओं में रखा जाये. इससे छत्तीसगढ़ी लेखन व्य वहार में जल्द से जल्द तबदील हो जायेगी. यिोंकि डा. मेहरोत्रा कहते हैं - छत्तीसगढ़ी में, छत्तीसगढ़ी पुस्तकें, शबदकोश, तकनीकी शबदावली, विज्ञान एवं वाणिज्य  के ग्रंथों का अभाव जो है छत्तीसगढ़ी में मानक शबद का अभाव है. जो है वह अधूरा है. त्रिभाषा फामर्ूला अंग्रेजी को ही फलीभूत करता है. इस फामर्ले में अंग्रेजी के स्थान पर भारतीय  बोली को स्थान मिलना चाहिए. तब किसी बोली (भाषा) अपनी पुस्तकें शबदकोश अपनी तकनीकी शबदावली, वाणिज्य  ग्रंथ, मानकशबद कोशों का स्वभावत: विकास होगा. और छत्तीसगढ़ी भाषा को राज भाषा बनाने / बनने में दीघर् समय  नहीं लगेगा.
छत्तीसगढ़ी भाषा में महान ध्वन्यात्मक शIि है. वह इस प्रकार है -
अधरतिया जोर से बादर गरजिस गरार् धूँका एके संग झांड़ पड़ूखा, झाँव - झाँव करय . खार खाँय  - खाँय  करय . च रच र - च रच र सूँ - सूँ छरर् - छरर् धूकां धू पर पानी के बूंदी झाँय  - झाँय  झोपार च लय . गंड़वा बाजा बाजत हे गुद गुदराय  गुद गुदरूम टिंही - टिंही पें पें टिमिक टिमिक टिमिक.
जिस भाषा में इतनी जोरदार ध्वन्यात्मक शIि हो वह राजभाषा की गूँज कैसे होगी, सरलता से समझा जा सकता है.
डां. नरेन्द्रदेव वमार् का छत्तीसगढ़ी वगर् बोली को न लिखकर भाषा लिखना अपराध नहीं लगता. भौगोलिक दृýि से भी छत्तीसगढ़ी का व्याकत्व उनकी इस धारणा को पुý करता है. इसके अतिरिI छत्तीसगढ़ी के साहित्य कार भी तीव्रगति से उभरते आ रहे हैं. भाषा वैज्ञानिक भेदों की मात्रा छत्तीसगढ़ी को एक पृथक भाषा का स्तर प्रदान करे या न करे लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि अवधि एक पृथक भाषा है, छत्तीसगढ़ी भी अवश्य  है. (र.च . मेहरोत्रा)
य दि छत्तीसगढ़ी को भाषा एवं राजभाषा का दजार् दिलवाना है वह भी शीघ्रताशीघ्र तो हमें डा. पालेश्वर प्रसाद शमार् के शोधग्रंथ - छत्तीसगढ़ के कृषक जीवन में शबदावली को जो 56 पृþों का है छत्तीसगढ़ के घर - घर पहुँचाना होगा ताकि छत्तीसगढ़िया मानक भाषा को जान सके, समझ सके.
भाषा शिक्ष्ाा की ही समस्या नहीं वह शासन - प्रशासन की भी अमल की समस्या है. भाषा का समाज विज्ञान और उसके क्रम में आना मुख्य  है. आयोY ने संस्कृत में, मुगलों ने फारसियों में, अंग्रेजों ने अंग्रेजी में और स्वतंत्र भारत में विधानसभा परिषद एवं संसद ने अंग्रेजी में राज किया और कर रहे हैं. अथार्त सत्ता की भाषा सदैव अवाम की भाषा से अलग रही है, होती है. कौमी देशीय  एकता को रोकने का नष्ट करने का सबसे अच्छा हथियार उसकी भाषा नý करना है. यू. एन. ओ. रिपोटर् बताती है विश्व में हर तीन मिनट पर एक बोली मरती है.
छत्तीसगढ़ी प्रशासन में कोई छत्तीसगढ़ियालाल नहीं है जो बिस्याकर् जैसा अध्यादेश जारी कर भाषा अमल काय म कर सके -
1815 में जमर्नी आजाद हुआ बिस्याकर् के हाथ में देश आते ही उन्होंने दूसरे ही दिन एक अध्यादेश जारी किया - कल से इस देश का सारा कारोबार जमर्न  भाषा में च लेगा. जो य ह भाषा नहीं जानते एक साल के अंदर सीख ले वनार् कुसिर्यां खाली कर दे. आज जमर्न मजबूत क्स्थति में है.
छत्तीसगढ़ प्रशासन में छत्तीसगढ़ी को विधेय क लाकर राजभाषा का दजार् देकर ढ़ोल पीटना मखिी मारने के अलावा यिा है ? यिा बिस्याकर् जैसा कठोर अध्यादेश जारी हुआ ?

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें