इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

बुधवार, 4 सितंबर 2013

रवि किरण

रवि किरण
संतोष कुमार सोनकर ' मंडल'
घोर अंधियारा
को चीरकर
उर्वी पर पड़ी होगी
निशांत की बेला में
लोहित की ललामता
रवि किरण
उषा के सुनहले
तीर से त्रस्त
हुई होगी
अन्तर्निहित काल रात्रि
खुशी - खुशी आंगन में
पांव पसार उठी
हुई होगी
जय लक्ष्मी
दृगम्बु पोंछ दूर
हुई होगी
पीड़ा
खिली सुमन पर गुंजित
हुई होगी
भौंरा
तरू में बैठ कुंजित
हुई होगी
सारे विहंग वृंद
ह्रदय से लगा मन
हुई होगी
विनोदित
तन खुशी से
झूम उठी
हुई होगी
जन
सुलगती जिन्दगी
एटम बम की तरह
सुलगती जिन्दगी
न जाने कब फट जाए
दिल में संजोये सपने
धराशाही हो जाए
प्रवर रौशनी की
चकाचौंध में छिप जाए .
ख्वाबों में पिरोये हुए धागे
हिरकनी से उज्जवल
रौनकता में बेमिसाल
होकर भी टूट जाए .
हर पल संगीनों के
साये में हो और
तालियों की गड़गड़ाहट
सर्कसों में शोभायान
कोई आये जो चाकू की
नोक पर
उठा ले जाए .
ये तो भाईचारे की
तौहिन होगी
शिष्टïचा को भूलकर
बैर भाव को अंजाम दें
और भस्मासुर हो जाए .
क्या यही मानवता की
नेक पथ है
छोड़ एकाग्र मत
सद्भाव - सद्विचार और
हिंसा का तांडव
नाच नचाकर
स्वयं को भूल जाए .
चौबे बांधा ( राजिम)
जिला - रायपुर ( छ.ग.) 
 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें