इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

पत्थरों से सर टकराने

-  जितेन्द्र ' सुकुमार'   -
पत्थरों से सर टकराने का अंजाम मिला।
बेवजह मुस्कराने का अंजाम मिला।

लोग दुश्मन को गले लगाते हैं खुशी से,
मुझे दोस्तों को गले लगाने का अंजाम मिला।

वो बेनज़ीर है इसमें मेरा क्या कसूर,
हमें नज़र से नज़र मिलाने का अंजाम मिला।

छुपाने वाले छुपाते रहे दास्ता ए हकीकत,
हमें हमराज बनाने का अंजाम मिला।

क्या माना हमने गैरों को अपना,
हमें रिश्तें निभाने का अंजाम मिला।

अच्छा था उजड़ा ही रहा हयात सुकुमार,
यहाँ जि़ंदगी को सजाने का अंजाम मिला।
चौबेबांध राजिम, जिला - रायपुर छ.ग.

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