इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

बुधवार, 11 सितंबर 2013

राजनीति

भावसिंह हिरवानी
ग्राम धनोरा में पानी भरना वसूली हेतु पार्टी पहुंची हुई थी। जैसे ही सेक्सन इंचार्ज देवांगन साहब वहां पहुंचे, उनकी प्रतीक्षा में बैठे आठ- दस लोगों ने उन्हें घेर लिया। उनमें धनसिंग वकील भी था। जिसकी टी.वी.सेट का पिछले साल उन्होंने कुर्की करवा दिया था। वह शराब के नशे में धुत्त था और उसका चेहरा गुस्से से लाल हो रहा था।
उसने चिल्लाकर कहा - देवांगन साहब, आपके कारण मुझे पांच हजार रूपये का नुकसान हुआ। बताइये उसे कौन देगा ? कुर्की के कारण मेरी बेइज्जती हुई सो अलग। हमको मालूम था कि पिछले चुनाव की तरह इस बार भी चुनाव के पहले सरकार बकाया राशि का पचास प्रतिशत की छूट देगी। लेकिन आपने गत वर्ष ही कुर्की का आदेश लाकर मेरा टी.वी. सेट उठवा लिया और मुझे विवश होकर पूरा भरना दस हजार भरना पड़ा।
जवाब में देवांगन साहब भी तैश में आ गये - कुर्की आदेश भी शासन का था और छूट की घोषणा भी शासन द्वारा की गई। इसलिए आप अपना धौंस मुख्यमंत्री को देना। मैं बिलकुल नहीं सुनूंगा।
- ज्यादा होशियारी मत बघारिये और कान खोलकर सुन लीजिए इस बार चेतावनी देकर छोड़ रहे हैं। इस गांव के सारे लोग अब अगले चुनाव के वक्त ही पानी भरना पटायेंगे। बीच में परेशान किया तो नतीजा भुगतने के लिए तैयार रहना। वकील ने कहा तो वहां उपस्थित सारे लोग उसके समर्थन में चिल्लाते हुए वहां से चले गए।
देवांगन साहब अवाक अपने सिर पकड़ कर बैठ गये। उसी समय कार्यालय से आये डाक रनर ने उसे डाक थमा दिया। डाक में बकाया राशि का पचास प्रतिशत और चालू वर्ष की राशि का नब्बे प्रतिशत वसूली हेतु लक्ष्य दिया गया था। कम वसूली की स्थिति में निलंबित करने की भी धमकी दी गई थी। वे पढ़ते ही आग बबूला हो गये और डाक रनर के सामने ही उस डाक को फाड़ कर फेंक दिया - लोग भरना नहीं देगे तो क्या मैं डकैती डालूं ? साहब को कह देना जो करना है कर ले। उधर बकायादारों की छूट देकर सरकार उन्हें पुरस्कृत करती है तथा हर साल भरना पटाने वालों को हतोत्साहित करती है। और इधर कर्मचारियों पर डंडा पेलती है लड़ते - मरते रहोसाले आपस में। आखिर हम लोग करे तो करे क्या ?
देवांगन साहब की हालत देख वहां बैठे सरपंच ने जैसे जले मे नमक छिड़कते हुए कहा - यही तो राजनीति है साहब, चोर को कहते हैं कि चोरी करो, और साव को कहते हैं कि जागते रहो।   

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