इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

गुरुवार, 12 सितंबर 2013

क्यों हो जाता है उत्तर जटिल ... ?

डां. बख्शी एवं श्री नायक को आदरांजलि
साहित्य की नगरी राजनांदगांव की साहित्यिक यात्रा डां. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, गजानंद माधव मुक्तिबोध, डां. बल्देव प्रसाद मिश्र, तक पहुंच कर क्यों ठहर जाती है ? क्या इन तीन साहित्य मनीषियों के बाद एक भी ऐसा साहित्यकार पैदा नहीं हुआ जो इस यात्रा को आगे बढ़ा सके ? जब यह साहित्य की नगरी कहलाती है और स्वर्गीय कुंजबिहारी चौबे,डां. मेघनाथ कनौजे, डां. नन्दूलाल चोटिया, रमेश याज्ञिक, कृष्णकुमार नायक और लक्ष्मण कवष का नाम तो लिया जाता है इसके बावजूद ऐसी क्या बात है कि इन्हें  तीन के बाद वह स्थान क्यों नहीं दिया जाता ? जिसके हकदार है। यह प्रश्न मुझे कई दिनों से साल रहा था। अंतत: एक दिन मैंने चित्रकार कृष्णा श्रीवास्तव गुरूजी के समक्ष अपनी जिज्ञासाïï व्यक्त कर ही दिया। मेरी जिज्ञासा को तौलते हुए गुरूजी ने कहा - सर्वेद, तुम्हारा प्रश्न निरर्थक नहीं पर इसका उत्तर जटिल है ...।
आज तक मैंने प्रश्न की जटिलता सुनी थी पर यहां तो गुरूजी ने उत्तर को ही जटिल करार दिया। मैं प्रतीक्षा में था कि वे कुछ आगे और बोलेगे पर वे चुप्पी साधे रहे... नितांत चुप्पी। फिर मैंने ही उकेरा तब गुरूजी की चुप्पी टूटी। बोले - यहां बहुत सारे लोगों ने साहित्य के क्षेत्र में अपना जीवन होम किया मगर दुर्भाग्य कि रास्ता तीन साहित्यकारों तक ही पहुंचकर खत्म हो जाता है। मुझे तो लगता है, रास्ता तो है मगर तीन के बाद किसी चौथे तक जाने का रास्ता धुंधला हो जाता है ...?
बात आई, गई और हो गई।
एक  दिन मैंने चर्चा के दौरान गुरूजी को बताया कि च्मई 2008ज् में विचार वीथि पत्रिका च् दूसरे वर्ष ज् में प्रवेश कर रही है। गुरूजी ने सलाह दी - इस अंक का साइज बढ़ा दो। उनकी सलाह मुझे जंच गयी। मैंने अपनी बात रखी - मई माह में साहित्य वाचस्पति डां. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी की जयंती है इस अंक को उन्हीं को समर्पित करना चाहता हूं, साथ ही चाहता हूं कि इस अंक को किसी ऐसे साहित्यकार को भी समर्पित कर दूं जिसने अपना जीवन साहित्य के क्षेत्र में होम कर दिया और नेपथ्य में चला गया। नगर के अनेक साहित्यकारों से रायशुमारी बात निर्णय हुआ कि इस अंक को डां. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी के साथ स्वर्गीय कृष्णकुमार नायक को भी समर्पित कर दिया जाए।
और मैं भिड़ गया स्वर्गीय कृष्णकुमार नायक के रचना संसार, उनके व्यक्तित्व की खोज में। सर्वप्रथम मैंने एक पत्र बनाया। उस पत्र को उन लोगों को दिया जो श्री नायक के साथ साहित्यिक विचार आदान - प्रदान करते थे। मैंने उनसे उनकी रचना के साथ संस्मरण की भी मांग की। मेरे आग्रह को किसी ने नहीं अस्वीकारा मगर समस्या यह थी कि श्री नायक को इस असार - संसार से विदा लिए एक लम्बा समय व्यतीत हो चुका था। उनकी रचनाएं स्मृति से लगभग लुप्त हो चुकी थी। मैंने श्री नायक के परिवार वालों से संपर्क किया परन्तु वहां भी उनकी एक भी रचना नहीं मिली। अब मेरे समक्ष विकट प्रश्न खड़ा हो गया कि क्या बिना उनकी रचना के मात्र उनका संस्मरण ही प्रकाशित कर देने से पाठकवर्ग संतुष्टï हो जाएंगे ? मैंने अपनी समस्या काका चंद्रकांत ठाकुर के समक्ष रखी। मुझे मालूम था कि श्री नायक  लम्बे समय तक समाचार पत्र च् छत्तीसगढ़ झलक ज् से जुड़े रहे। श्री ठाकुर बोले - सर्वेद, उनकी कुछ रचनाएं मेरी डायरी में हो सकती है। मना करने के बावजूद कुछ रचनाएं उन्होंने मेरी च् डायरीज् में लिख दी थी।
मुझे स्मरण आया, जब मैं अपने गृहग्राम च् भंडारपुर ज् में था तब मुझे साहित्यिक परिशिष्टï सहेज कर रखने का शौक था। संभवत: ऐसी कुछ पत्र - पत्रिकाएं पटाव में रखी उस पेटी में होगी जिसमें श्री नायक की रचनाएं छपी होगी। पता नहीं मुझे ऐसा क्यों लगने लगा कि मैंने कहीं न कहीं श्री नायक की रचनाएं पढ़ी है और उसे सहेजकर भी रखी है। मैं अपने गांव जा पहुंचा और च् पटाव ज् में रखी उस च् पेटी ज् को खंघालने लगा जिसमें मैंने बहुत सी पत्र - पत्रिकाओं का साहित्यिक परिशिष्टï सहेज कर रखा था। मेरा विश्वास और मेहनत निरर्थक नहीं गया। उस पेटी से मुझे श्री नायक की च् चार रचनाएं ज् प्राप्त हुई।
मैं राजनांदगांव पहुंचते ही काका चंद्रकांत के पास पहुंचा। उनको बताया कि मुझे श्री नायक की चार रचनाएं मिल चुकी हैं तो काकाजी खुश हो गये। बोले - मैंने भी च्डायरी ज् खोज निकाली है। उसमें नायक की तीन रचनाएं है।
मैं चाह रहा था मुखपृष्ठï पर डां. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी के साथ कृष्णकुमार नायक की भी तस्वीर लगे। गुरूजी तो आवरण मेरी मंशा के अनुरूप बनाने तैयार थे पर नायक की तस्वीर न उनके परिवार वालों के पास थी और न ही अन्य श्रोतों से मिलने की संभावना नजर आ रही थी पर खोज जारी थी। मैंने बहुत पहले आचार्य सरोज द्विवेदी द्वारा सम्पादित पत्रिका च् राजनांदगांव 77 ज् की मांग श्री द्विवेदी जी से की थी। इसी बीच श्री द्विवेदी ने च्राजनांदगांव 77 ज् नामक पत्रिका उपलब्ध कराई। मैंने पन्ने पलटने शुरू किए और उस पत्रिका में श्री नायक की न सिर्फ दो रचनाएं मिली अपितु तस्वीर भी मिल गई। मेरे लिए तो वह हीरे से भी बेसकीमती थी। अब जाकर मुझे समझ आया कि गुरूजी ने क्यों उत्तर को जटिल कहा था।
उक्त संपादकीय लिखने के पीछे मेरी मंशा किसी साहित्यकार के मान - सम्मान को ठेस पहुंचाने की कदापि नहीं। यह अंक साहित्य वाचस्पति डां. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी एवं कवि, $ग$जलकार कृष्णकुमार नायक को आदरांजलि स्वरूप समर्पित है। यह अंक कैसा लगा  आपके विचार की प्रतीक्षा रहेगी ...।                                        संपादक

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