इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

गुरुवार, 12 सितंबर 2013

मनखे

गणेश यदु
जग म जम्मों जीव ले, मनखे बुधमान हे।
इही बात के मनखे ल, गजबेहेच्च गुमान हे॥

एकरे सेती मनखे ह, मनखे संग भेद करथे।
फेर मिल जुल के रहे बिना, ए समाज समसान हे॥

एला जानत हें, समझत हें, जान के अनजान हें।
कोन अल्ला ए, कोन यीशु अउ कोन भगवान ए॥

तभो ले आंखी म बाँधें हें, सुवारथ के टोपा।
इही पाय के मनखे ह, जबरन हलाकान हे॥

जेन दिन मनखे के आँखी ले ए टोपा उतर जाही।
मनखे ह मनखे बर सहीं म मनखे बन जाही॥

इही दिन के अगोरा हे, ए दुनिया म यदु।
मनखे ह मनखेपन के मरजाद ल पा जाही॥
संबलपुर, जिला - कांकेर

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें