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बुधवार, 11 सितंबर 2013

मैनेजर लीला

नूतन प्रसाद
हमारे गांव वाले कम श्रद्धालू नहीं हैं.उस साल जब अच्छी फसल हुई तो ईश्वर ने कृपा की,ऐसा सोच  रामलीला मंडली को बुलवाया.मंडली वालों ने आकर ऐसा जीवंत खेल खेला कि पूरा गांव राम मय  हो गया.अंतिम दिन ग्रामीणों में च ढ़ौत्री च ढ़ाने की होड़ लग गयी.बहुतों ने विभोर हो एक जून का राशन रख, बाकी सवर्स्व भगवान के च रणों में अपिर्त कर दिया.इधर च ढ़ौत्री का काय र्क्रम समाÄ हुआ.उधर रामलीला के पात्रों की बैठक प्रारंभ हो गयी.य ह बैठक मैनेजर के  शोषण के विरूद्ध हो रही थी.राम और रावण दोनों दलों के लोग गंभीर मुद्रा में  बैठे थे कि राम ने मौन तोड़ा-जब हम मर मर कर कमाते है तो हमें भी बराबर हिस्सा मिलना चाहिए लेकिन मैनेजरहमें अधिकारों से वंचि त कर देता  हैं.य ही नहींं जो वेतन बंधा है उसे भी पूरा नहीं देता.
रावण ने साथ दिया - हां भै¸या राम,मैनेजर पूरा राक्षस है.अभी ही देखो न- भ·डारपुर वालों ने कितनी तगड़ी च ढ़ौत्री की उसे मैनेजर ने अपने पास रख लिया मानों सिफर् उसका ही पसीना गिरा है.हमें छूने तक नहीं दिया
सीता - मुझे डेढ़ सौ रूपये मासिक वेतन देने का आश्वासन देकर लाया है . तीन महीने यूं ही निकल गये.बहुत विनती की तो मात्र साठ रूपये ही मिले.
हनुमान - तुम्हें कुछ मिले तो ! मेरी स्थिति और भी गंभीर है.पत्नी की चि xी आयी है कि मुÛा बीमार है.उसके उपचार के लिए रूपये भेजो.मैनेजर को पत्र दिखाया तो उसने फेंक दिया.
कुम्भकणर् - रात - रात भर जागने के कारण मेरी आंखें खराब हो गयी.च श्मा खरीदने के लिए रूपये मांगे तो दुत्कार दिया.समझ नहीं आता यिा करूं ?
इसी प्रकार सभी पात्रों ने अपने - अपने दुखड़े रोये लेकिन उनकी करूण आवाज का श्रोता कोई नहीं था.सुग्रीव ने कहा- रोने से काम नहीं बनने वाला.अधिकार प्राÄि के लिए कुछ न कुछ उपाय  करना होगा.
जनक - हां, मैनेजर के पास अपनी मांग रखी जाये.देखे तो यिा कहता है.
मेघनाथ - उससे बोलें कि वह हमारा वेतन बढ़ाये और ठीक समय  पर दे.
विभीषण - अगर इंकार दिया तो...?
लक्ष्मण - च ढ़ौत्री छीन ले...
दोनों दल मैनेजर से लोहा लेने कमर कस कर तैयार हो गये.वे चि „ाने लगे- राम - रावण - जिन्दाबाद, और मैनेजर - मुदार्बाद.
इनकी आवाज ने मैनेजर के बहरे कानो को फाड़ दिए.उसने च ढ़ौत्री के रूपयों को सात तालों वाली पेटी में बंद किया.पात्रों के पास आया.मैनेजर के संबंध में इतना जानकारी दे देना अधिक है कि  वह राम और रावण को अपने को अपने कंधे पर बिठाकर कश्मीर से कन्याकुमारी तक दौड़ लगा सकता है.उसे देख शेर की तरह दहाड़ने वाले पात्र भींगी बि„ी बन गये.मैनेजर ने सबको घूरकर देखा और कहा- अरे, राम और रावण कब से भाई बन गये जो चि पक कर बैठे हैं.
किसी ने कुछ जवाब नहीं दिया तो उसने फिर से पूछा-गूंगे हो गये हो, जो उत्तर नहीं देे रहे हो.मैं पूछता हूं कपड़े मिल के हड़तालियों की तरह नारेबाजी यिों लगा रहे हो ?
रावण की कनखियों की इशारे ने हिम्मत दी तो राम ने कहा - रोजी- रोटी के लिए, अपने वाजिब हक के लिए...।
- यानि, इतने दिनों तक भूखें रहे.य दि ऐसा होता तो जीवित रहते ?
रावण ने स्पý किया -वास्तविकता य ह है कि आप हमे श्रम के मान से वेतन कम देते हैं.य ही नहीं जो निधार्रित है वह भी पूरा नहीं मिलता.
- आखिर यिा चाहते हो ?
वशिþ - वेतन बढ़े और समय  पर मिले.
- ओह् ! अब समझा विद्रोह करने पर उतारू हो .
विभीषण - नहीं, हम अपने अधिकारों की मांग कर रहे हैं
पात्रों की बात सुनकर मैनेजर ने अuहास किया.फिर बोला - घोर कलयुग आ गया.तभी तो जो सब प्रकार से संपÛ है उसकी भी नीय त डूब रही है.राम साक्षत् परम ब्रह्म परमेश्वर है.भरत विश्व का पोषक है.सुग्रीव पंपापुर का राजा है.रावण सोने की नगरी लंका का मालिक  है.जब ऐसे ऐसे कुबेर एक मंडली के  मैनेजर के सामने हाथ फैला रहे हैं  तो ऐ सीते, तू अपनी मां पृथ्वी से कह दे कि वह फट जाये ताकि  मैं उसमें समा जाऊं.
हनुमान ने कहा - आप तो लीला की बात बता रहे है  लेकिन हकीकत य ह है कि हम बहुत गरीब है...।
- चुप रह बंदर ,पूरा अशोक वाटिका खा गया पर भूख नहीं मिटी तो च ढ़ौत्री पर नजर गड़ा रहा है.
परसुराम - अगर पेट भर जाता तो परेशान यिों करते ?
- तू यिा मेरी  परेशानी समझेगा.कूद कूद कर गांव का तख्त तोड़ दिया उसके लिए सरपंच  हजार्ना मांग रहा है.अब बता - हजार्ना तेरा बाप भरेगा.
 दशरथ - असंसदीय  भाषा का प्रयोग यिों कर रहे हो .अपने पास नहीं रखना है तो मत रखिये.कहीं भी नौकरी कर लेगे.
- अरे जा, तू बुढ़ा गया है.राम च ौथी कक्ष अनुत्तीणर् है .रावण ने शाला का मुंह नहीं देखा.तुम जैसे अयोग्य  व्य Iियों को कौन मूखर् नौकरी देगा.
मैनेजर बड़बड़ाता हुआ च ला गया.
पात्र अगली काय र्वाही करने के लिए विचार विमशर् करने लगे लेकिन उचि त रास्ता नहीं दिखा.आखिर अपने अपने घर लौट जाने के लिए सोचा मगर एक के पास भी टिकिट के लिए पैसे नहीं थे.रामदल ने कहा - हो गई क्राक्न्त,मिल गया अधिकार .अब घर जाने के लिए रूपये कौन देगा ?
रावण दल ने कहा - तुम लोग दोगे.तुम्हारे उकसाने के कारण ही हमने मैनेजर जैसे सƒन व्य Iि से  व्य थर् में शत्रुता मोल ली.
- अपनी गलती दूसरों पर थोपोगे ही.राक्षस स्वभाव कहां जायेगा ?
- जुबान संभाल कर बातें करो अन्य था टांगे तोड़ कर रख देगे.
- टांगे तोड़ने वाले जरा सामने आकर तो देखो.
- लो आते हैं , यिा कर लोगे ?
दोनों पक्ष आमने सामने हुए..युद्ध प्रारंभ हुआ.एक दो लाशें गिर भी जाती कि मैनेजर आ गया.बोला - तुम लोगों का दुश्मन मैं हूं फिर मुझसे न लड़ कर आपस में यिों लड़ रहेे हो ?
दोनों पक्षों ने एक दूसरे पर आरोप लगाये और मैनेजर से कहा - आपके साथ विश्वासघात करने का फल भोग चुके. अब से आपके विरूद्ध एक शबद भी नहीं बोलेंगे.हम क्षमा चाहते हैं.
मैनेजर ने लताड़ा - कैसे क्षमा कर दूं.लड़ाई में मेरे बहुत से सामान नý हो गये.उनका हजार्ना कौन भरेगा ?
- हम भरेगें , हमारे वेतन से काट लेना.
- तो ठीक है,च लो मुढ़ीपार वहां आज से ही रामलीला दिखाना है ।
- जो आज्ञा....।
इतना कह सभी पात्र मुढ़ीपार जाने की तैयारी करने लगे.
भंडारपुर ( करेला )पोष्‍ट - ढारा, व्‍हाया - डोंगरगढ़, जिला - राजनांदगांव (छग)   

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