इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

बुधवार, 4 सितंबर 2013

साले साहब का सम्‍मान

गिरीश बख्‍शी

भैयाजी भी कभी छुटभैया थे, पर अब उनका प्रमोशन हो गया है.माननीय  भैया जी हो गये हैं.कभी मंत्रियों से मंत्रणा करने राजधानी जाते हैं तो कभी टिकिट कमेटी में उन्हें सक्म्मलित कर हाईकमान दि„ी बुलाता है.भैयाजी को फुरसत कहां ?इन दिनों वे निगम चुनाव को लेकर व्य स्त है.टिकिट याच कों की सबेरे से लाइन लग जाती है.उनका सोच ना है - विधानसभा, लोकसभा चुनावी टिकिट में इतनी कि„त नहीं होती जितनी... यिा बताएं लगता है - वे मछली बाजार में आ गये हैं और सड़ी - गली मछली भी उन्हें एक से एक तकर् देकर अपनी - अपनी खूबियां समझा रही है.आज वे दोपहर एक बजे करीब नाक में रूमाल दबाकर तो नहीं ,हां ! कान में कपास ठूंसकर पाटीर् कायार्लय  से उठकर एकाएक घर आ गये.
असमय  उन्हें घर आते देख पत्नी चिंतित हो उठी. वे बड़े परेशान - हलाकान नजर आ रहे थे.आते ही बोले - जोरों की भूख लगी है.सुनो, जो कुछ बना है जल्दी खिला दो.मैं खाना खाकर आराम करूंगा.हां, फोन आये तो आदमी पहचान कर जवाब देना.मंत्री - अंत्री का फोन आये तो मुझे उठा लेना.
भैयाजी की चुस्त - दुरूस्त टंच  पत्नी बरबस हंस उठी.
- तुम हंसी यिों ? भैया जी चि ढ़ उठे.
पत्नी ने गरम - गरम खर रोटी उनके दीमाग को शांत करने के लिए दी.फिर बोली - तुम पहले ही ठीक थे जी,अब तुम्हारे बड़े हो जाने पर मुझे भी बड़ा झूठ बोलना पड़ता है.
भैयाजी मुसकरा उठे - रोटी बढ़िया खर और आलू ,भठा, मेथी,भाजी, सेमी और बड़ी की सबजी वाह ! यिा कहना है ? ऐसई खर - खर रोटी देती जाओ, और घर की कोई अच्छी बात सुनाओ.खूब मजा आ रहा है. आज तो टिकिट के मारे सिर भÛा गया था.
अपनी पाक - कुशलता से पत्नी पुलकित हो उठी - अभी मनोहर आया था.हषिर्त मन बोली - वो कह रहा था... । तभी फोन की घंटी बज उठी. पत्नी दौड़ी.भैयाजी प्रेम से डांट उठे - ब‚ों जैसे इस कदर दौड़ती यिों हो. हपट - अपट कर कहीं गिर पड़ी तो ऐसी सबजी कौन बनायेगी ? पत्नी ने मुग्धभाव से देखा अपने पति को - मनोहर का फोन है जी, यिा कहूं ?
- ओह, सालेराम. बुला लो उसे. चार बजे मुझे फिर जाना है. फिर फुरसत नहीं मिलेगी.
मनोहर मिडिल स्कूल का मास्टर पर हेडमास्टर उसके सामने पंगू हो जाता. मनोहर मास्टरी करता है अपने जीजा जी के,याने भैया के दम - खम पर. तो वह मजीर् का मालिक है. मजीर् से स्कूल आता जाता है टाइम टेबल से नहीं. अपनी मजीर् से पढ़ाता है. असिर वह तीन साढ़े तीन बजे घर आ जाता है.मिडिल स्कूल के अबोध ब‚े उससे बड़े खुश रहते हैं यिोंकि वे पढ़ाते कम हैं छुuी ज्यादा देते हैं और होमवकर् कभी देते ही नहीं. दूसरे ईष्यार्लु मास्टर जिन बेचारों पर किसी नेता की छत्रछाया नहीं है जब हेडमास्टर से मनोहर की शिकाय त करते तो हेड मास्टर बड़े सम्हल - सम्हल कर उत्तर देते - आज तक सिवाय  आपके, किसी एक भी छात्र ने उनकी शिकाय त नहीं की. मैंने पूछा है उनसे. वे कहते हैं - मनोहर सर तो बड़े अच्छे सर है. बुलाऊं मैं लिास केप्टन को. आप खुद पूछ लेना.
फिर तो शिकाय त करने वाला गुरूजी का एक बारगी कांप जाता.उसे एकदम से अबूझमाढ़ नजर आने लगता. मनोहर कही नाराज होक र उनका ट¬ांसफर... ? वह कह उठता - नहीं ! नहीं !! सर, मैं तो फिर वह खुशामदी हंसी हंस उठता.
वही मनोहर अपनी मनोहरी मुस्कान के साथ आ गया. भैयाजी ने बड़े अलमस्त भाव से उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा - आओ.. आओ.. आज तुम्हारी जीजी ने ऐसा शानदार भोजन कराया कि मन प्रसÛ हो गया. हम बड़े खुश हैं . बोलो, यिा चाहिए तुम्हें..... ?,
समय  पारखी मनोहर ने एक नाटकीय ता से सिर खुजाते हुए कहा - जीजाजी, च ौदह साल हो गये मुझे शिक्षक हुए पर मुझे अभी तक कोई पुरस्कार - उरस्कार प्राÄ नहीं हुआ.
भैयाजी आश्च य र् से अभिभूत हो गये - अरे, तुम्हें च ौदह साल हो गये ? मतलब यू आर सीनिय र टीच र नाऊ ? य ह तो अन्याय  है कि हमारे रहते हमारे सालेराम कोई ईनाम न मिले. तुम्हारे हेडमास्टर के य हां फोन है यिा ?
- जी, जीजा जी । मनोहर की आंखें च मक उठी
- लगाओ, उन्हें बुलाओ .
च तुर मनोहर ने नम्बर लगा कर जीजाजी को फोन थमा दिया.
- हां कौन, हेडमास्टर साहब. हम भैया बोल रहे हैं. अच्छा - अच्छा. बस - बस अभी स्कूल से घर आये हैं . कोई बात नहीं. आप लोगों की दोपहर में लंच  की छुuी रहती है. आप जरा घर आइये.. नहीं, हेडमास्टर साहब. घबराने की कोई बात नहीं. जरा पसर्नल बात है. जरा जल्दी आइए !
सीधे सरल स्वभाव के साहू जी प्रधानपाठक खाने के बीच  में ही मारे डर के उठ खड़े हुए. लूना पर तेजी से आ गये. मनोहर की स्कूटर भैयाजी के बंगले के सामने खड़ी देख उनकी बी.पी. बढ़ गई.कांपते हाथों से काल बेल दबाई. वे अपने सहाय क वमार्जी को भी साथ ले आये थे. मुसकुराते हुए मनोहर ही आकर उन्हें भीतर की बैठक में ले गया. भैयाजी ने उन्हें सामने कुसीर् पर बैठने का इशारा करते हुए कहा - सुना है, आप लोगों के गांव में गुरूओं का सम्मान होने जा रहा है ?
- जी, जी हाँ, भैयाजी । प्रधानपाठक ने हाथ जोड़कर कहा - गांव वालों का आयोजन है.
- पर अभी कैसे ! कुछ च कित से हुए भैयाजी.
हेडमास्टर साहूजी के घबराहटी हाव - भाव देख सहमे - झिझके सहाय क वमार्जी ने सम्हलकर बताया - वो ऐसा सर, कि शिक्षक दिवस के दिन ही गांव में गमीर् की छुuी हो गई थी. इसीलिए दीवाली के बाद... ।
- अच्छा - अच्छा.. पान का एक बड़ा सा बीड़ा मुंह में ठूंस कर भैयाजी ने कहा - तो हमारे सालेराम.. ओह ! मतलब मनोहर सर का भी सम्मान होगा न ?
- जी.. जी.. । सच मुच  हकला गये साहू जी अब तो. सहाय क वमार्जी ने फिर सम्हाला - वो ऐसा है सर कि गांव वालों ने शिक्षकों के सम्मान का जो क्राय टेरिया निक्श्च त किया है उसमें... ।
एकाएक तमक गये भैयाजी, बड़े जोर से तमक गये - उसमें मनोहर नहीं आता य ही न ? तो मनोहर का सम्मान किया जा सके ऐसा क्राय टेरिया बनाइए न आप लोग. हम लोग कैसे करते हैं जानते हो - जिसे टिकिट देना निक्श्च त कर लेते हैं उसके अनुसार दिखाने के लिए वैसा क्राय टेरिया बना देते हैं. लगता है, जाइए. आप लोग वैसा कीजिए. और हां, गांव के सरपंच , यिा नाम है उसका... अंकालूराम. उससे कहिए हम खुद आयेंगे उस दिन. शिक्षकों को साल हमारी तरफ से रहेगा
बड़ी श्रद्धा से झुककर दोनों ने भैयाजी को प्रणाम किया. बाहर आकर जैसे प्रधान पाठक में जान आयी. उन्होंने पसीना पोंछा. सहाय क वमार्जी ने उन्हें आश्वस्त किया कि आप चिंता न करें. मैं सब सम्हाल लूंगा.
निक्श्च त दिन, निश्चि त समय  पर शिक्षक - सम्मान समारोह आयोजित हुआ. मुख्य  अतिथि भैयाजी हुए.अध्य क्षता सरपंच  अंकालू राम ने की. सम्मानित होने वाले चार शिक्षकों में से पहला ईनाम मनोहर सर का ही था.शिक्षक सम्मान समारोह का संचालन करते हुए वतिव्य - कला के धनी प्रधान पाठक के स‚े सहाय क वमार्जी ने, मनोहर सर के माला,शाल, श्रीफल द्वारा मुख्य  अतिथि के कर कमलों से सम्मानित होने के पूवर् उनकी प्रशक्स्त में बड़े आक षर्क लहजे में कहा - मनोहर सर, हमारे स्कूल, हमारे गांव, हमारे जिले के ही नहीं वरन हमारे पूरे राज्य  के एक त्यागी पुरूष है. भौतिकता के आकषर्ण को छोड़ सहजता और सरलता को अपनाने वाले महान आत्मा मनोहर सर. भाईयों, इसमें जरा भी अतिश्योIि नहीं.य दि हमारे मनोहर सर चाहते तो यिा नहीं बन सकते थे.नायाब तहसीलदार,सेलटेसि इंस्पेटिर, एसिाइज, फुड और जाने यिा - यिा ऊपरी कमाई के एक से एक इंस्पेटिर, भौतिकता से संपÛ उनका बंगला जगमगाता रहता. उनका पारिवारिक बैकग्राउ·ड ऐसा कि उन पर अनेक बड़े - बड़े नेता - मंत्रियों की पूरी कृपा Òक्ष्ट हमेशा रही, पर वाह रे ! शिक्षा प्रेमी, शिक्षक जीवन के अनुरागी, त्यागी और सेवा की जीवन्त मूतिर् इन्होंने सब ठुकरा दिया, सब कुछ ठुकरा दिया. और तामझाम विहीन शिक्षा के शांत एकान्त मंदिर में अपना सवर्स्व जीवन अपिर्त करने का संकल्प किया. तो आज ऐसे त्यागी, तपस्वी,समपिर्त शिक्षक को सम्मानित कर हम सभी स्वयं सम्मानित हो रहे हैं. गौरान्वित हो रहे हैं.
पूरा स्कूल प्रागंण तो फिर देर तक तालियों से गूंजता रहा.गदगद भैयाजी ने बड़े प्रशंसात्मक भाव से उस दिन के डरे - सहमे सहाय क शिक्षक वमार् गुरूजी को देखा. वमार्जी ने आशाभरी निगाहों से उन्हें प्रणाम किया.

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