इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

बुधवार, 4 सितंबर 2013

बूंद - बूंद

रमेश कुमार सोनी
एक बूंद
एक और बूंद
बूंद - बूंद पानी
गंगाजल,अमृततुल्य
सूखे कंठ, प्यासी धरती
पूर्ण संतृप्तता देती
नवजीवन संवारती
बूंद आस जगाती ।
बूंद - बूंद पानी
बारिश - बारिश
बाढ़ - कहर
सर्वत्र पानी
पानी ही पानी
जल$जला
संहारकर्त्ता बूंद ।
टप - टप - टप
टपकती बूंद
ध्रवीय हिमखण्डों से
हिमालय से ग्लोबल वार्मिंग
नदी, सागर बनकर
निगल जाने
भूमंडल
एक भयंकर चेतावनी
दूनिया की तबाही का
शेष बची है
सिर्फ - सिर्फ
बूंद - बूंद जिंदगी ॥
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एक बूंद
फिर एक बूंद
बूंद - बूंद खून
जीवन संवारती, खुशियाँ देती
रक्तदान,रक्त संबध
घर - संसार बनाती
रिश्ते निभाती
टप - टपा - टप - टप
अविरल बहता
खून
आखिरी कतरे तक
लड़ते रहता है
फौजी बनकर
सीमा की रक्षा करने ।
खूनी आंखें, खूनी खंजर
खूनी मंजर
गर्म होता खून
उबाल मारता
सड़कों, नालियों में
बहता खून
केशरिया,हरा,नीला,सफेद ।
कई रंगों के खून
सभी मिलकर
हो जाते हैं लाल, अचिन्हे
कौन सा बूंद ?
कहाँ से टपका ?
अनूठी, अनजानी
एकता बताती खून
कतरा - कतरा खून
व्यर्थ बहते हुए भी
अपना रंग दिखा जाता है ॥
जे.पी. रोड,किसान राईस मिल के पास
बसना ( छ.ग.)

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