इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

रविवार, 15 सितंबर 2013

इसे छत्तीसगढ़ के प्रत्येक व्यक्ति के हाथ में पहुंचना चाहिए

कृति - कहा नहीं
कहानी संग्रह
लेखक - कुबेर
मूल्य - 100 रूपये
प्रकाशक - प्रयास प्रकाशन
बिलासपुर छ.ग.
- समीक्षक - मिलिंद साव -
आज हमारे प्रदेश का निर्माण हुए लगभग 11 वर्ष होने जा रहा है, फिर भी मुझे लगता है कि छत्तीसगढ़ी साहित्य को आम जनता में जो स्थान मिल जाना चाहिए था, वह अभी तक नहीं मिल पाया है। विशेषकर गद्य के क्षेत्र को। साहित्यकारों द्वारा लिखी गई कवितायें तो गीतों और कवि-सम्मेलनों के माध्यम से लोगों तक पहुँच जाती हैं, पर कहानियों, उपन्यासों के साथ ऐसा नहीं हो पाता। ऐसे में जब इस प्रकार के आयोजनों के माध्यम से कुबेरजी जैसे प्रतिभावान साहित्यकारों की रचनायें जनता के सामने लाई जाती है, तब निश्चित रूप से यह छत्तीसगढ़ी साहित्य की बड़ी सेवा होती है और इसके विकास में यह एक सशक्त कदम होता है।
जहाँ तक मेरी बात है, पुस्तकें पढ़ना मेरी पहली रूचि में शामिल है। इसीलिए जब मुझे कुबेरजी की पुस्तक 'भोलापुर के कहानी' मिली थी, मैंने इसे तुरंत पढ़ा और इसने मुझे काफी प्रभावित किया था। बाद में जब मुझे इनकी अगली पुस्तक 'कहा नहीं' मिली, तब इसे पढ़ने का लोभ संवरण मैं नहीं कर पाया। इस कहानी संग्रह से मैं इतना अभिभूत हुआ कि मैंने तुरंत कुबेरजी को फोन पर बधाई दी।
इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता है, भाषा की सहजता। इसकी भाषा बड़ी सहज, सरल और बोधगम्य है। छत्तीसगढ़ी भाषा के विषय में कुछ लोगों में यह भ्रम है कि यह बोलने में तो बड़ी सरल है, पर लिखने और पढ़ने में उतनी सरल नहीं है। बल्कि कष्टसाध्य है। यह पुस्तक इस भ्रम का पूरी तरह से निवारण करती है। इस कहानी संग्रह की किसी भी कहानी को पढ़ने में मुझे किसी भी प्रकार की कोई तकलीफ नहीं हुई। हो सकता है यह लेखक की कलम का जादू हो! पर, इस पुस्तक ने यह तो सिद्ध कर ही दिया है कि छत्तीसगढ़ी पढ़ने और लिखने में उतनी ही सरल है, जितनी कि बोलने में!
इस कहानी संग्रह की सभी कहानियाँ मुझे बड़ी ही पसंद आई। फिर भी उनमें से दो कहानियों की संक्षिप्त चर्चा आज मैं यहाँ करना चाहूँगा। एक तो है- कहा नहीं; जिससे इस पुस्तक के शीर्षक को नवाजा गया है। इस कहानी का क्षेत्र मस्तिष्क नहीं बल्कि हृदय है। इसीलिए यह हृदय को छू जाती है। इस कहानी ने संवेदना के सभी आयामों को स्पर्श किया है। कुछ लोगों को यह कहानी नायिकाप्रधान लग सकती है। पर, मुझे तो यह कहानी नायकप्रधान लगी। कहानी का नायक एक सद्चरित्र, नैतिक व्यक्ति है। पर, प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में कभी न कभी ऐसी घड़ी आती ही है, जब भावना के नाजुक क्षण में वह खड़ा नहीं रह पाता, बहने लगता है। नीति-अनीति, देह-आत्मा, प्यार-वासना में वह अंतर नहीं कर पाता। ऐसा ही कुछ इस कहानी के नायक बाबू के साथ होता है, जब वह अंिनंद्य सुंदरी नायिका चंपा के प्यार में पागल हो उठता है और एक क्षण के लिए प्यार और वासना में अंतर करना भूल जाता है। पर, दूसरे ही क्षण चंपा का रणचण्डी रूप उसे उसकी भूल का अहसास करा देता है और वह पश्चाताप की अग्नि में झुलसने लगता है। कहानी का अंत भी बड़ा मनोवैज्ञानिक है, जब चंपा, बाबू को यह अहसास दिलाती है कि प्यार अपवित्र नहीं होता, वासना अपवित्र होती है। वह अभी भी उसे प्यार करती है। लेखक ने एक बड़े ही नाजुक मसले पर कलम चला कर बड़े ही साहस का परिचय दिया है। अंचल की प्राचीन लोककथा- 'शिवनाथ-सतवंतिन' के तार इस कथा की मूलभावना से जोड़ने का जो प्रयास किया गया है, वह निश्चित ही प्रशंसनीय है। परन्तु, मेरे विचार से इस लोककथा का विस्तारित वर्णन कहानी को बड़ा लंबा कर देता है। इसे सीमित किया जा सकता था।
दूसरी कहानी जिसकी चर्चा मैं करने जा रहा हूँ, वह रोचक और प्रेरक दोनों ही है। यह छोटी सी कहानी है- Óदू रुपिया के चांउर और घीसू-माधव: जगन! इस कहानी में एक पढ़े-लिखे बेरोजगार आम युवक की व्यथा का चित्रण है जो कोई काम न मिलने पर रिक्शा का हैंडिल थाम लेता है। भाषा की सहजता और सामयिक परिवेश इस कहानी की विशेषता है।
सरकार द्वारा गरीब लोगों को दिया जा रहा दो रूपये किलो चावल आज तथाकथित बड़े लोगों की टिप्पणी का विषय बन चुका है। वे इसे गरीबों को अलाल बनाने का साधन निरूपित कर रहे हैं। पर, वास्तविकता क्या है, इसका खुलासा कहानी का नायक जगन रिक्शावाला सभी के सामने करता है। इसी प्रकार रिक्शावालों, फलवालों जैसे छोटे व्यवसाय करने वालों को उनके व्यवसाय, सामान आदि के नाम से पुकारना लोगों की आदत बन चुकी है। मानों, वे कोई जड़ वस्तु हों। जैसे- ऐ रिक्शा! ऐ केला! इत्यादि। इस अपमानजनक सम्बोधन से जगन पीड़ित है। और दूसरी पीड़ा है- शोषण की। बाजार में लोगों की यह आदत सी बन चुकी है कि वे जब तक सब्जी वाले से सब्जी के दाम दो रूपये कम न करा ले, रिक्शेवाले से किराया पाँच रूपये कम न करा ले, उनकी आत्मा को संतोष ही प्राप्त नहीं होता है। इस शोषण का खूबसूरत चित्रण इस कहानी में किया गया है। हास्य-व्यंग के पुट से यह कथा रोचक बन पड़ी है।
कुबेरजी की इस पुस्तक में छत्तीसगढ़ी के आम बोलचाल के शब्दों के प्रयोग ने पुस्तक में जान डाल दी है। अंत में यही कहना चाहूंगा कि कुबेरजी की यह पुस्तक निश्चित ही पठनयोग्य है। इसे छत्तीसगढ़ के प्रत्येक व्यक्ति के हाथों  और हमारे सभी पुस्तकालयों की शोभा जरूर बननी चाहिए।
पता : 19/13, विवेकानंद नगर
राजनांदगाँव (छत्तीसगढ़)


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