इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

बुधवार, 4 सितंबर 2013

सूना - सूना

सूना - सूना
डा. जयजयराम आनंद
चारों ओर उदासी छाई
ओठों पर तालों के पहरे
घर आँगन अब सूना सूना।
    घर - बाहर की तैयारी ने
    माँगा तन - मन - धन का हिस्सा
    जिसे सुनाऊँ उसे लगेगा
    सचमुच तोता - मैना की किस्सा
कोर कसर रह जाय न कोई
पूरी हो अवशेष हसरतें
जोड़ रखा सब दूना - दूना।
    जहाँ कहीं भी गया निमंत्रण
    कोई छूछे हाथ न आया
    दूर पास के सब रिश्तों वे
    अपना - अपना रंग जमाया
मिटें लकीरे सब अनचाही
एक भाव था सबके मन में
रिश्ता लगे न जूना - जूना।
शहनाई की अनुगूँजों में
    हंसी - खुशी की अनगिन कड़ियाँ
    पंख लगा सब उड़े पखेरू
    सन्नाटा बुनती सब घड़ियॉ
सबने मिलजुल खुशियाँ बाँटी
सपने हुए अधूरे पूरे
सूनापन - दुख उना - उना।

    जूनी नाव 

जूनी नाव बुनें सन्नाटा
    आती याद जवानी

नई नवेली दुल्हन सी थी
सुख सपनों की रानी
लहरों से नाचा करती थी
मीरा सी दीवानी
    भूले नहीं भूलते उसको
    देश विदेशी सैलानी।

जीवन रेखा थी बहुतों की
किया न कभी बहाना
गंगा - जमुना के संगम में
सहजा ठौर ठिकाना
    प्रलय - बाढ़ झंझावतों में
    मनु की बुनी कहानी।

जीवन जर्जर माँ बापू से
मुंह मोड़े सुत दारा
वैसे ही नाविक ने छोड़ा
समझ उसे नकारा
    रह रहा हूक उठे अंतस में
    जग करता मनमानी।
आनंद प्रकाशन, प्रेम निकेतन, ई 7/70, अशोका सोसाइटी, अरेरा कालोनी, भोपाल

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