इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

बुधवार, 4 सितंबर 2013

भोजन

- यशवंत मेश्राम -
हम गुलाम है या स्वतंत्र
डैने फैलाए आए हैं गरुड़
गरुड़ साँप नहीं खाता अब
इसका भोजन
स्वतंत्र भारत में है
बांमन चिरइ, मैना और सुग्गा
और पास में है
फाइबर मग्घा।
सोने की चिड़िया,
दुर्भाग्य है
यहाँ
नागनाथों - साँपनाथों को
गरुड़ ने क्यों
खाना छोड़ दिया
आश्चर्य है ?
शंकरपुर,वार्ड नं. 7
नये शिव मंदिर के पास
शारदा चौक, राजनांदगांव  (छ.ग.)

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