इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

मंगलवार, 10 सितंबर 2013

चिंगारियां

मोहम्‍मद बशीर मालेरकोटलवी
वह टकटकी बांधे, मुस्कुराती हुई नजरों से मेरी ओर खामोशी से देखता रहा और अपने खास अंदाज में इधर - उधर हिलता भी रहा। कोई जवाब न पाकर मेरा हौसला बढ़ा। मैं फिर बरसा - दरअसल, तुम लोगों को आराम की खाने की आदत पड़ गयी है। सौ - पचास मांग लिया और नशा कर लिया। बस मांगों और खाओ ... करके खाना बहुत मुश्किल है।
मेरी बात खत्म हुई तो वह कुछ संजीदा हो गया और आर्शीर्वाद देने के अंदाज में हाथ उठाकर बुलन्द आवाज में बोला - बस बोल लिए जितना बोलना था ...। थूक निगल कर और आँखें झपका कर वह तकरीबन चिल्ला उठा - सेठ, अगर मेरा काम इतना ही आसान समझता है तो आ बाहर निकल और भगवान के नाम पर दो रुपया मांग कर दिखा ....।
राजकीय पंजाब वक्फ बोर्ड, अधिकारी दिल्ली गेट,
समीप - एम पी स्कूल, मालेरकोटला, पंजाब - 148023

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