इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

गुरुवार, 12 सितंबर 2013

मोर आंखी के पुतरी तैंहा

डाँ पीसी लाल यादव 
न तोर बिन रेहे सकवँ ग, न कोनो ल कहे सकवँ ग ।
मोर आंखी के पुतरी तैंहा, न तोर बिन देखे सकवँ ग ।।

        होबे कखरो बर अलवा - जलवा,
        फेर मोर बर तो नीक अस ।
        होबे ककरो बर करू करेला,
        मोर बर तो कुंदरू मीठ अस ।।
न मैं लुकाय  सकवँ ग, न कहूं ल बताय  सकवँ ग ।
मोर आंखी के पुतरी तैंहा, न तोर बिन देखे सकवँ ग ।।

        मैं तो लगाय  हँवजिनगी ल,
        बैरी तोर मया के दाँव म ।
        आसा तिस्ना सााध पूरही,
        फूलही तोर मया के छाँव म ।।
न चुप रेहे सकवँ ग, न मुच  - मुच  हंसे सकवँ ग ।
मोर आंखी के पुतरी तैंहा, न तोर बिन देखे सकवँ ग ।।

        दिल के दरद ल नई जानय  तैंहा,
        मोर मयारू मीठ लबरा ।
        मया के मरम नई जानय  तैंहा,
        तोर चोला ह कठवा - पथरा ।।
न सुध बिसारे सकवँ ग,न बुध तियारे सकवँ ग ।
मोेर आंखी के पुतरी तैंहा, न तोर बिन देखे सकवँ ग ।।
गंडई पंडरिया
जिला -राजनांदगांव (छग.)

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