इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

कचना घुरूवा - खण्‍ड काव्‍य

  • -  सुभद्रा राठौर -
    आदिवासी समाज के पूज्य नायक कचना पर केन्द्रित कचना धुरवा डॉ. रामकुमार बेहार की नवीनतम कृति है। बेहार जी मूलत: इतिहासकार हैं किन्तु हृदय उन्होंने साहित्यकार का पाया है, लाभ यह कि इतिहास में उद्घाटित वर्णित होते तथ्यों को अभिव्यक्ति का एक नया मंच मिल जाया करता है। इन दिनों निहायत अत्याधुनिक परिदृश्य में लोक शब्द अकस्मात लौटता दीख पड़ता है। चकाचौंध में धूमिल होते लोक की विश्व मानव के मध्य होती वापसी कम सुखद नहीं। हम अपनी परंपराओं को जीवित रख सकें, अपनी माटी की सोंधी महक को बनाए रख सकें, तभी हमारी अपनी अस्मिता भी शेष रहेगी।
    लोककथाएं हमारी धरोहर हैं। इनमें प्राय: इतिहास और कल्पना का सुन्दर सम्मिश्रण होता है। वाचिक परंपरा से पीढ़ी दर पीढ़ी निरन्तर हस्तांतरित होती गाथा में समाज और समय झांकते हैं। मानवीय मूल्य झलकते हैं। कचना धुरवा का आधार लोकगाथा है। बेहार जी ने छत्तीसगढ़ के विशेषकर आदिवासी अंचल के ज्ञात - अज्ञात चरित्रों पर इतिहास और साहित्य कृति हैं जिसमें उन्होंने गोंड़ राजा कचना के शौर्य - पराक्रम से भरे जीवन - वृत्त का उद्घाटन किया है। अपने अंचल के प्रति अगाध प्रेम और स्वाभिमान के भाव ने लेखक को सदैव आंचलिक विभूतियों के गौरव गान हेतु प्रेरित किया है।
    कचना धुरवा में उन्होंने कचना को नायक तथा धुरवा को नायिका माना है। कचना का शीर्षक भले ही ढोला - मारू, लोरिक - चंदा की भाँति प्रेमगाथा होने का भ्रम देता है किन्तु लेखक का ध्येय प्रेमकथा बांचने का नहीं है, वे तो कचना की वीरता को ही स्थापित करना चाहते हैं। इसीलिए कृति का पूर्वार्द्ध अपने उत्तरार्द्ध से ज्यादा स्थान घेरता है। रचना का कथानक सीमित है। कचना वस्तुत: राजपुत्र है, जिसे उसकी विधवा माता गागिन ने विपरीत स्थितियों में पाला है। युवा होने पर वह साहस के साथ अपने पिता की हत्या का प्रतिशोध लेता है और राज - पाट हासिल करता है। आदिवासी समाज उसके अप्रतिम शौर्य के समक्ष नतमस्तक हैं किन्तु अकस्मात् कचना की हत्या उसकी प्रयसी धुरवा के पिता द्वारा छलपूर्वक करवा दी जाती है। कचना भले ही अल्पजीवी रहा किन्तु आदिवासियों के मध्य गाथाओं और मंदिरों के रूप में वह आज भी जीवित है। लेखक का प्रयास प्रशंसनीय है। समीक्षा की दृष्टि से यह कृति भले ही कुछ स्थलों पर क्षीण लगे, मसलन छंदबद्ध शैली का आभास देते पदों में तुकांत तथा लये का अभाव कहीं - कहीं खटकता है, आपको कथा का एक प्रवाह एक ही बैठक में सारी कृति पढ़ जाने का आकर्षण अवश्य देगा। यही लेखकीय सफलता भी है और मन्तव्य भी। अनगढ़, नैसर्गिक सौन्दर्य लोक का वैशिष्टय है। लोकगाथा कचना धुरवा में भी उसकी व्याप्ति है। पाठक साधन से ज्यादा साध्य पर दृष्टि रखें तो उन्हें सब सहज लगेगा। डॉ. बेहार इसी भाँति इतिहास के अनछुए अनावृत्त पृष्ट पलटते रहें, साहित्यिक बिरादरी, आम पाठक को अंचल से जोड़ते रहें। यही शुभकामना है।
    प्राध्यापक, शासकीय जे. योगानन्दम महाविद्यालय, रायपुर(छग.

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें