इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

मंगलवार, 10 सितंबर 2013

वे इधर से उधर हो गये

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रमेश चन्द्र शर्मा चन्द
वे इधर से उधर हो गये
जिन्दगी पर कहर हो गये।
भीग कितनों के अंचल गये
खुद से जब बेखबर हो गये।
बड़ा भूकम्प से भय नहीं
लोग कितने निडर हो गये।
क्या पता किससे जाकर जड़े
रस के लोभी भ्रमर हो गये।
वे पलट कर न देखे इधर
जब से मौतबा हो गये।
चाहते और कुछ अब नहीं
वे मेरे हम सफर हो गये।
कौन सुनता किसी की यहाँ
लोग पत्थर जिगर हो गये
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जब किसी किस्मत किसी की रुठ जाती है।
हाथ में आयी खुशी भी छूट जाती है।।
आदमी कुछ भी हो लेकिन आदमी ही है।
चोट क्या क्या लगती है आस्था टूट जाती है।।
सारा चमन खुशबू लुटाता बसंत में।
यह कहावत भी कभी हो झूठ जाती है।।
डाकुओं से भय नहीं भय राजनीति से।
अपराध करके भी सद्य छूट जाती है।।
कौन अपनी पव को चाहेगा डुबोना।
आंधी में पतवार कर से छूट जाती है।।
पाप कब छिपते छिपाने से करो कुछ भी।
पाप की मटकी सड़क पर फूट जाती है।।
डी 4, उदय हाउसिंग सोसाइटी,
वैजलपुर, अहमदाबाद -

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