इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

बुधवार, 11 सितंबर 2013

कालजयी गीतों के प्रणेता - डां. रतन जैन

वीरेन्द्र बहादुर सिंह
छत्तीसगढ़ की शस्य श्यामला भूमि में आदि कवि महर्षि बाल्मिकी से लेकर छायावाद के प्रवर्तक पं. मुकुटधर पाण्डेय एवं नई कविता के पुरोधा गजानन माधव मुक्तिबोध ने अपनी कविताओं से राष्टï्रीय स्तर की ख्याति अर्जित की है। परन्तु कुछ लोग ऐसे भी हुए हैं जिनकी रचनाएं प्रकाशन के अभाव में कालजयी होते हुए भी चर्चित नहीं हो पायीं। इसके बावजूद वे उम्र के अंतिम पड़ाव में भी सतत मौन साहित्य साधना में रत हैं। ऐसे ही एक गीतकार है ... डां. रतन जैन।
छायावादी एवं प्रगतिवादी गीत लिखने वाले डां. रतन जैन का जन्म 27 मई 1927 को राजनांदगांव जिले के छुईखदान नगर में हुआ। 1939 में नोआखाली आंदोलन से प्रेरित होकर कविताएं लिखने वाले डां. रतन जैन ने हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग द्वारा आयोजित साहित्य भूषण एवं साहित्य रत्न की परीक्षा उत्तीर्ण की है। उनकी प्रथम रचना समाधि दीप विशाल भारत पत्रिका में प्रकाशित हुई। बाद में उनकी लिखी कहानी लुटेरा जिंदगी पत्रिका में छपी। उनकी कविताएं अब तक छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश एवं महाराष्टï्र से निकलने वाले लगभग सभी समाचार पत्र एवं पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी है। वे आकाशवाणी के भी प्रिय गीतकार रहे। आकाशवाणी रायपुर की कवि गोष्ठिïयों में 1974 से 1992 तक उनकी गीत एवं कविताएं प्रसारित हुई है। इसके अलावा अंचल के अनेक मंचों पर उन्होंने देश के  प्रतिष्ठिïत कवियों के साथ काव्य पाठ किया है। छुईखदान जैसे छोटे से नगर में होने के कारण एवं प्रकाशन की अल्प सुविधा तथा कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण छत्तीसगढ़ अंचल के इस कवि का एक भी काव्य संकलन आज तक प्रकाशित नहीं हो पाया है। संभवत: यही कारण है कि साहित्य बिरादरी में आज तक  उनका समग्र मूल्यांकन नहीं हो पाया है। उनकी काव्य यात्रा अस्सी वर्ष की उम्र में अभी भी जारी है।
डां. रतन जैन कवि होने के साथ - साथ सफल पत्रकार भी रहे हैं। जीवन के प्रारंभिक दिनों में उन्होंने नागपुर से प्रकाशित साप्ताहिक आलोक में सह संपादक के रूप में अपनी सेवाएं दी। बाद में वे रायपुर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र नवभारत एवं युगधर्म के  लगातार 15 वर्षों तक संवाददाता रहे।
डां. रतन जैन हिन्दी के अनन्य सेवक है। बसंत पंचमी सनï् 1948 को छुईखदान में गठित हिन्दी साहित्य समिति के वे संस्थापक सदस्यों में से एक है। सनï् 1961 में समिति का पुर्नगठन होने पर उन्हें सर्वसम्मति से इस समिति का अध्यक्ष चुना गया। अपने सात वर्ष के अध्यक्षीय कार्यकाल में उन्होंने समिति को नई दिशा एवं गति प्रदान की आठ फरवरी 1973 को आयोजित हिन्दी साहित्य समिति छुईखदान की रजत जयंती समारोह एवं इस अवसर पर प्रकाशित स्मारिका के कलेवर को संवारने में उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया। वर्तमान में वे समिति के संरक्षक है।
डां. रतन जैन के साहित्यिक योगदान के छुईखदान की सेवाभावी संस्था प्रेरणा ने 26 जनवरी 1996  को सम्मानित किया। दो वर्ष बाद हिन्दी साहित्य समिति छुईखदान की स्वर्ण जयंती समारोह बसंत पंचमी 1998 में उनका सम्मान किया गया। जीवन के पचहत्तर वर्ष पूर्ण करने पर हिन्दी साहित्य समिति छुईखदान ने उनका अमृत महोत्सव का आयोजन किया एवं उन्हें सम्मानित कर उनके यशस्वी योगदान को याद किया। मात्र 23 वर्ष की उम्र से शुरू हुई उनकी काव्य साधना आज उम्र के 80 वें पड़ाव में भी निर्बाध रूप से जारी है।
डां. रतन जैन की कविताओं में व्यवस्था के प्रति आक्रोश एवं सर्वहारा वर्ग के प्रति सहानुभूति स्पष्टï रूप से दिखाई पड़ती है। उनकी इन पंक्तियों में जीवन संघर्ष का सटीक चित्रण हैं-
 जीवन के पृष्ठों को मत खोलो, अक्षर - अक्षर चोट चिन्ह है।
शब्द - शब्द पीड़ा की रेखा, पंक्ति - पंक्ति है घाव व्यथा के,
छंद - छंद मेरे अभाव की, गाथाएं स्वच्छंद कह रहे,
अंधकार में भाव चरण मृदु बेबस, अनगिन शूल सह रहे।
उम्र साधना की वेदी पर, कविते तुम जी भर के रो लो,
जीवन के पृष्ठïों को मत खोलो ....।
देश की मौजूदा हालत पर कवि की लेखनी कुछ इस तरह बेबाक होकर चली है -
नाविक बदले, धार न बदली, जीर्णशीर्ण जलपोत वही है,
वही शक्ति अभिव्यक्ति पुरानी, शोषण के सब श्रोत वही है।
दुल्हर धर हथेली देती, किन्तु भ्रष्टï आचरण खड़े हैं,
मंदिर कलश पुराने केवल, मूर्ति के पत्थर बदले हैं।
गीत वही है छंद वही है, केवल युग के स्वर बदले हैं,
परिवर्तन के संग्रह में बस, पृष्ठïों के अक्षर बदले हैं।
अपनी उत्पात शीर्षक कविता में कवि ने भयानक रस की भयावहता का चित्रण इन शब्दों में किया है -
लूटपाट हत्याओं की यह आयी कैसी अशुभ घड़ी है,
चौराहे पर बिना कफन की, नंगी विकृत लाश पड़ी है।
मरघट के सन्नाटे जैसा, सारा चमन उदास हो गया,
भाई से भाई का रिश्ता, अर्थहीन परिहास हो गया।
डां. रतन जैन की कविताओं में उपमा, अलंकार का सर्वाधिक प्रयोग दिखाई पड़ता है -
सुबह का सूरज सोया - सोया, सांझ सुहानी सरमायी सी,
रात वियोगिन खोयी - खोयी, दीपशिखा सी अलसाई सी।
उनकी कविताओं में छायावाद का प्रभाव स्पष्टï रूप से दिखाई पड़ता है -
नीली अलसी का राग नगया, अरहर को मिला सुहाग नया।
आंगन में घुंघरू बोल उठा,  मन मीत चने का डोल उठा॥
कवि का लेखनीय पिछले छह दशक से साधनरत है। हर स्थिति एवं घटनाक्रम पर कवि ने अपनी लेखनीय के माध्यम से अपने विचारों को मुखर होकर अभिव्यक्त किया है।
कवि बचपन की ओर लौटना चाहता है -
एक बार फिर से आ जावो प्यारा बचपन,
सुख का अनुभव कर लेगा यह बोझिल जीवन।
मां की दृष्टिï पूर्णिमा जैसे ताजमहल है,
लोरी जिसकी अमृत जैसी गंगाजल है।
मां की मुस्कानों में हंसता जग का आंगन,
एक बार फिर आ जा ....।
कवि दुनियावालों से अपनी गीतों को गाने का अव्हान कुछ इस तरह करता है ताकि उनके गीत अमर हो जायें -
मेरे गीतों को स्वर दे दो,
मैं मरूं या छला जाऊं, दुनिया से दूर चला जाऊं,
लिखना ही मेरा कर्म बना, शब्दों की रचना धर्म बना।
जगवालों इन्हें अमरता का कोई भी सरल डगर दे दो,
मेरे गीतों को स्वर दे दो ...।
ऋतुराज बसंत का वर्णन कवि ने अत्यंत ही सार्थक शब्दों में इस प्रकार किया है -
मौसम की पालकी में आया बसंत है।
मदहोशी मस्ती की सीमा अनंत है॥
मौर मुकुट पहन लिया अमराई ने सरे आम,
कवियों ने गटक लिया छंदों का भरा जाम।
कोकिला बेसुध है ऋतुपति के प्यार में,
वसुधा उल्लासित है, सुरभित श्रृंगार में।
केशर की क्यारी में काश्मीर कंत है,
मौसम की पालकी में आया बसंत है।
डां. रतन जैन हिन्दी के अन्यय सेवी है। उन्होंने अपनी पंक्तियों में हिन्दी को हिन्दुस्तान कहा है -
हिन्दी भव्य विशाल सरल है, हिन्दी मधुर महान है।
हिन्दी है ध्वनि प्रखर हिन्दी की, हिन्दी हिन्दुस्तान है॥
कवि गीतों को ही अपनी जिन्दगी का मीत मानता है और अगला जन्म भी भारत में ही लेना चाहता है -
गीत मेरी जिन्दगी का मीत हो गया।
वर्तमान ठंूठ सा अतीत हो गया॥
चाहता हूं मौत पर बस गीत कफन हो,
अगला जनम हो तो यही मेरा वतन हो।
दर्द मेरे द्वार का संगीत हो गया,
गीत मेरी जिन्दगी का ....।

डां. रतन जैन को फूलों से नहीं बल्कि कांटों से प्यार है -
फूलों से तो चाव नहीं है, पर कांटों से प्यार मुझे,
कांटों में ही पला - बढ़ा हूं, देते हर्ष अपार मुझे।
संघर्षों से तपकर निकला, वह कहलाता है कुन्दन,
मधुबन की क्यों लिप्सा पालें, शूल माथ का जब चंदन।
दुनिया वालों ने दिखलाया, सपने झूठ हजार मुझे,
फूलों से तो चाव नहीं है ....।
कवि कर्मयागी है और केवल अपना कर्म करना जानता है। उन्होंने फल की आशा कभी नहीं की। यही भाव उनकी पंक्तियों में इस प्रकार आया है -
हाय - हाय में ढलता है दिन,
कैसी कटती रात न पूछो, मेरे मन की बात न पूछो।
मेरे गीत कुंवारें ही हैं, मैंने बहुत संवारे भी है॥
कौन निराशा में डूबा है, कौन हुआ प्रख्यात न पूछो,
मेरे मन की बात न पूछो।
जीवन की सांध्य बेला में कवि ने अपनी भावनाओं का इजहार कुछ तरह किया है -
जीवन की ढलती संध्या में ये मेरा अंतिम पड़ाव है,
बूढ़ा बरगद, पावन पीपल, अमराई से भरा गांव है।
सांझ की बेला धारा गहरी, तूफानों के बीच नाव है,
जीवन की ढलती संध्या में ...।
माटी सोंधी मेरे गांव की, मुझको लगती बड़ी सुहानी,
जिसका कण - कण पावन उज्जवल, पुण्य परम वंदित बलिदानी।
जन्मभूमि की शैय्या में ही सो जाने की प्रबल चाव है,
जीवन की ढलती संध्या में .....।
अपनी कविताओं एवं गीतों में जीवन के दुख - सुख, हर्ष - विषाद, सौंदर्य बोध और करूणा तथा जीवन दर्शन को स्थान देने वाले एवं हर प्रसंग, पर्व त्यौहार, मौसम एवं जीवन  प्रसंग  पर अपनी लेखनी सलाकर हिन्दी साहित्य को समृद्ध करने वाले डां. रतन जैन छुईखदान ही नहीं वरन छत्तीसगढ़ अंचल के प्रतिनिधि कवि हैं। उनकी रचनाएं अगर पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित हो जाये तो साहित्य के भंडार में एक और नगीना शामिल हो जायेगा मगर  आवश्यकता इस अनमोल नगीना को पूरी ईमानदारी के साथ पहचानने की है ....।
राजनांदगांव

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