इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

सोमवार, 16 सितंबर 2013

क्रमश : हिन्दी का आख्यायिका साहित्य


भूल सुधार
'' विचार वीथी  ''  के मई अंक में पृष्ट क्रमांक - 6 में डॉ. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का जन्म स्‍थान '' राजनांदगांव ''  छप गया है जबकि उनका जन्म छत्‍तीसगढ़ के  राजनांदगांव जिले के ''  खैरागढ़राज '' में हुआ था  इसे सुधार कर पढ़ने का कष्ट करें। प्रस्तुत है गतांक से आगे ....।
                                                                                                                             सम्पादक

डॉ.पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी
हिन्दी के आधुनिक आख्यायिका लेखकों में तीन लेखकों ने विशेष प्रसिद्धि पाई - एक जैनेन्द्र कुमार, दूसरे बेचन शर्मा उग्र ओर तीसरे प्रसाद जी। प्रसाद जी काव्य के क्षेत्र में जितने प्रसिद्ध हैं, उतने ही आख्यायिका के क्षेत्र में भी। दोनों में भावों की नवीनता के साथ शैली की नवीनता है। उग्र जी ने कुछ समय तक अपनी शैली की उग्रता से हिन्दी साहित्य में एक धूम-सी मचा दी। वे लोकप्रिय भी खूब हुए। कथा का विषय चाहे जो हो, कथाकार यदि निपुण है तो वह सभी विषयों में एक हृदयग्राहिकता ला देता है। हम लोगों के नगर में भी दो-एक ऐसे व्यक्ति हैं जिनकी कहानियों को सुनने के लिए उन्हें घेरे रहते हैं। मैंने भी ऐसे लोगों की कहानियाँ सुनी है। साधारण जीवन की साधारण बातों को भी वे ऐसे अच्छे ढंग से बतलाते हैं कि श्रोताओं को उन्हें सुनकर एक उल्लास होता है। बात सब यथार्थ जगत की रहती हैं। उग्र जी की कहानियों में भी कला की यही विशेषता है। वे ऐहिक जगत ही यथार्थ बातों का वर्णन करते हैं। उनके वर्णन में स्पष्टता है। वे जो चाहते हैं, निस्संकोच कह देते हैं। उन्होंने संसार को जैसा देखा है, समझा है, उसको उसी रूप में कहने में उन्हें कोई झिझक नहीं है। उनमें भावुकता की कृत्रिमता नहीं है। वे मनुष्य की वासनाओं को प्रेम का आवरण देकर उज्जवल नहीं बनाते। जो वासना है, वह वासना ही है। उसकी उग्रता भी जीवन में प्रगट होती है। मनुष्य यदि अपने अंतस्तल की सच्ची परीक्षा करने बैठे तो वहाँ वह वासनाओं की संचित पंक-राशि ही देखेगा। उच्च या नीच, उत्कृष्ट या निकृष्ट सभी भावों के भीतर एक गुप्त लोलुपता बनी रहती है। हम लोगों का गर्व, माहात्मय, वैभव, सभी के भीतर वह लोलुपता विद्यमान रहती है। उग्र जी ने विषयों की महत्ता या हीनता की ओर ध्यान न देकर जीवन की कोई भी बात लेकर उसको रसमय बनाने का प्रयत्न किया है और इसमें संदेह नहीं कि उनके वर्णन में कथा का रस अच्छी तरह विद्यमान है। उसी के साथ उग्र जी के व्यंग्य, तिरस्कार, विषाद, आक्षेप और उपहास ने उनकी सभी रचनाओं में एक ऐसा प्रभाव उत्पन्न कर दिया है कि पाठक उनकी ओर आप से आप आकृष्ट हो जाते हैं। उग्र जी में कवि की भावुकता नहीं है और न दार्शनिक की गंभीर समीक्षा है; उनमें गुरू का उपदेश नहीं है और न नेता का सन्मार्ग प्रदर्शन है। उन्होंने एक दर्शक की तरह उस संसार का वर्णन किया है, जिससे वे अच्छी तरह परिचित हैं और जिसकी सभी लीलाओं में उन्होंने मनुष्यों की दुर्बलता, अक्षमता नीचता देखी है। जीवन की सभी लीलाओं को देखकर कभी उनको विरक्ति होती है और कभी आश्चर्य, कभी उन्हें विषाद होता है और कभी ग्लानि, कभी वे तिरस्कार करते हैं और कभी उनका उपहास करते हैं। पर वे निरपेक्ष समीक्षक की तरह उन लीलाओं में तटस्थ नहीं रहते। वे सभी स्थितियों में प्रविष्ट होकर जीवन के एक रस का भी अनुभव करते हैं। उनकी यह रसानुभूति उनके सभी आक्षेपों, तिरस्कारों और उपहासों के भीतर विद्यमान है।
प्रसाद जी हिन्दी के प्रसिद्ध आख्यायिका लेखक हैं। उनके सभी पात्र असाधारण हैं, क्योंकि असाधारण भावों से ही वे युक्त हैं। उनका बूढ़ा साईं साधारण बैरागी नहीं है, उसमें माया नहीं है, मोह नहीं है और न ही क्षुधा और तृष्णा। उसकी इच्छा असाधारण है, उसे तृप्ति तभी होती है जब दस वर्ष का एक बालक उसे रोटी देता है। वह बालकों से अपना गूदड़ छिनवाने में और फिर उनसे गूदड़ छीनने में ही आनंद लाभ करता है। इसी प्रकार उनका बंजारा उतना ही भावुक नवयुवक है जितनी भावमयी उसकी प्रियतमा मौनी। बंजारा अपना लादने का व्यवसाय मौनी के लिए ही छोड़ देना चाहता है और मौनी भी लादने के लिए बोझ इक_ा करना छोड़ देती है। दोनों प्रेमी-प्रेमिकाओं में प्रेम होने पर भी अनन्त वियोगी हैं। मौनी आशा में अनमनी बैठी रह जाती है और नन्दू हताश होकर घर लौट आता है। उनके इस वियोग का एकमात्र कारण यह है कि नन्दू भावुक है और मौनी भावमयी।
हिन्दी के एक दूसरे लब्धप्रतिष्ठ लेखक जैनेन्द्र जी की सभी कहानियों में विलक्षण भावुकता है। उसके सभी पात्र भाव जगत के हैं। लौकिक व्यापारों से उनका कोई प्रयोजन ही नहीं है। लौकिक बंधनों से वे सभी मुक्त हैं। उच्छृँखलता ही उनके लिए नियम हैं स्वच्छन्दता ही उनकी नीति है। उनके सभी कार्यों में एक विचित्रता है, एक अपूर्वता है। उनमें अल्हड़पन है, हठ है और प्रेमोन्माद है। भाव के आवेश में आकर वे सभी कुछ का कुछ कर बैठते हैं। ओले उन्हें नहीं रोक सकते, इन्सान उन्हें नहीं रोक सकता। बादल गरजे, अथवा बिजली चमके, उनकी नायिका काली दुनिया में ही जायेगी। ऊपर आसमान होगा और नीचे धरती और वह निश्चिन्त होकर अपने प्रियतम के पास चली जाएगी। उनके सभी पात्र मानों यही कहते हैं कि हम तो वही करेंगे जो हम चाहेंगे। परिणाम की उन्हें चिंता नहीं, लोकनिन्दा की उन्हें आशंका नहीं। यह उन्हीं की कहानियों में संभव है कि रेल कम्पार्टमेंट में भेट हो जाने पर एक अपरिचित व्यक्ति से एक युवती का इतना घनिष्ठ संबंध हो जाय कि वह घर में जहर खाकर और फिर बाद में उसी युवक से फोटो खिंचवाकर उसी के सामने मर जाय।
एक पाश्चात्य लेखक ने एक विज्ञान विशारद् अध्यापक की कथा लिखी है। उसने वृद्धावस्था में एक सुंदरी से विवाह किया। उसी के घर में उसका एक प्रिय छात्र आया करता था। उस प्रिय छात्र से उसकी स्त्री का प्रेम-संबंध हो गया। कुछ दिनों के बाद अपने उस छात्र के व्यवहार से कुछ रूष्ट होकर अध्यापक ने उसे अपने घर से अलग कर दिया। परन्तु उस छात्र के चले जाने पर उस स्त्री की अवस्था दयनीय हो गई। तब उसने उस छात्र को फिर अपने घर में आश्रय दिया। इसके बाद उस स्त्री को एक पुत्र उत्पन्न हुआ। तब अपने को उस पुत्र का पितामह मानकर एक उल्लास का अनुभव किया।
इसी प्रकार जैनेन्द्र जी के ' मास्टर साहब ' अपनी दुश्चरित्र स्त्री की सभी प्रेम-लीलाओं को चुपचाप सहन कर लिया और जब वह स्त्री अपने नवयुवक नौकर के साथ घर से भाग कर चली गई तब उन्होंने यह समझकर संतोष कर लिया कि वह भाग कर नहीं गई है। इसके बाद अपने तरूण प्रेमी से परितृप्त होकर और तरह-तरह के कष्ट सह कर जब वह स्त्री फिर मास्टर साहब के घर में लौट आई तब उन्होंने सानंद उसको लक्ष्मी कहकर उसका स्वागत किया।
यह सच है कि भगवान क्राइस्ट की तरह किसी भी दुष्ट-चरित्र पुरूष और स्त्री को कठोर दण्ड देने के समय हम सभी लोगों को यह सोच लेना चाहिए कि जिसने कभी कोई दुराचार नहीं किया है वह उस कठोर दण्ड की व्यवस्था करे और तब ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं निकला जिसने किसी न किसी स्थिति में पड़कर कोई न कोई पाप नहीं किया है। तब हम सभी में दुराचारियों के प्रति एक सहानुभूति का भाव उत्पन्न हो जाता है। पर पाप या दुराचार स्वयमेव पुण्य या सदाचार तो नहीं हो सकता। नीति का कोई भी तो विचार जीवन में काम करता ही है। यदि कोई स्त्री अपनी युवावस्था में किसी से प्रेम करने लगे तो यह उसकी दुर्बलता अवश्य है, पर समझाने पर भी, दण्डित होने पर भी, विवाहित होने पर भी यदि वह कुपथगामिनी बनी रहे तो उसकी उस दुर्बलता में भी एक दृढ़ता आ जाती है, उसके कारण उसके चरित्र का उत्कर्ष नही होता, उसका पतन ही हो जाता है। यही कारण है कि वह एक को छोड़कर दूसरे की अनुचरी बन जाती है और दूसरे से परित्यक्त हो जाने पर वह तीसरे की भी सहचरी हो सकती है। उसकी इस स्थिति में एकमात्र आर्थिक व्यवस्था ही काम नहीं करती। उसमें तो वासना प्रेरित करती है, वह अध:पतन की ओर ले जाती है। यही कारण है कि त्याग-पथ की नायिका पाठकों के लिए सहानुभूति अथवा क्षमा की पात्र नहीं होती। जगत को कठोर कह देने से, माँ को कठोर मान लेने से, मति को मूर्ख और हृदयहीन बना देने से उसके चरित्र में उज्ज्वलता नहीं आती। वह शरद् बाबू की पतिता नायिका नहीं है जिसका अंतस्तल सदैव पवित्र रहता है और जो निरपराध होकर भी दण्डित हो जाती है। समाज के विरूद्ध भी वह किसी प्रकार का दोषारोपण नहीं कर सकती। उसने समाज के प्रति विद्रोह करने का कभी साहस भी नहीं किया। उसने जो कुछ भी किया स्वयं अपनी इच्छा से प्रेरित होकर ही किया। अतएव किस न्यायबुद्धि से प्रेरित होकर न्यायाधीश ने अपना पद छोड़ दिया यह तो लेखक ही जानें, पर इसमें संदेह नहीं कि उसके आचरण के प्रति मनुष्यों की सहानुभूति नहीं होती है। उसमें मेडम बोमेरी की तरह वह वासना की उग्रता भी नहीं है जो उसको विपथ की ओर सहसा खींच ले जाती है।
जैनेन्द्र जी ने मनुष्यों के भावजगत को लेकर अपने कथा-साहित्य की सृष्टि की है। अनन्त समुद्र की तरह वह भावसागर भी असीम है। उसका कोई अन्त नहीं है। उसमें जो प्रचण्ड लहरें उठती हैं वे लक्ष्यहीन हैं और बाधाहीन हैं। यह कोई नहीं कह सकता कि कब उनकी गति किधर जाय। किसी भी कारण से क्षुब्ध होकर वे किसी भी समय पंचण्ड होकर किसी ओर बह सकती है। मेरे लिए कथा-साहत्य में जैनेन्द्र जी का वही स्थान है जो काव्य साहित्य में महादेवी वर्मा का है।
साधारण मनुष्य के साधारण जीवन में जो साधारण बातें होती रहती हैं उनकी ओर उनकी दृष्टि ही नहीं जाती। वे मनुष्य के अत्यंत रहस्यमय हृदयजगत में प्रविष्ट होर भावों की जो लहलाएँ देखते हैं उससे उसे स्वयं विश्मय होता है। वहाँ जीवन की वेदनाएँ मेघों की श्याम घटाओं की तरह उनके चित्त को अन्यथा तृप्त कर देती है। वे कुछ देखते हैं, कुछ समझते हैं और कुछ कहते हंै। उनके भावों में जो सौन्दर्यमय स्पष्टता है उसका कारण यह है कि जीवन की यथार्थता को उनकी कल्पना ने श्यामघटा से आच्छन्न कर लिया है।
साधारण लोगों के लिए जीवन पहेली नहीं है, वह छायामय नहीं है, उसमें सत्य की कठोरता है, उसमें शुष्कता है, कष्ट है, प्रयास है, चिंता है और व्यग्रता है। हम यदि अपने को धोखा देना न चाहें तो सत्य के उज्ज्वल प्रकाश में हमारे लिए जीवन का यथार्थ रूप प्रगट हो जायेगा।               समाप्त .....

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